ई-कचरे का डंपिंग ग्राउंड बना दिल्ली-एनसीआर
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दिल्ली-एनसीआर ई-कचरे का डंपिंग ग्राउंड बनता जा रहा है। फिलहाल, पच्चीस फीसदी की दर से ई-कचरे की मात्रा बढ़ रही है। इससे कैंसर के साथ लीवर व किडनी से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं।
यह खुलासा एसोसिएट चैंबर ऑफ कामर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एसोचैम) की रिपोर्ट में हुआ है। बृहस्पतिवार को नई दिल्ली में एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने रिपोर्ट जारी की।
दूसरे शहरों से भी आ रहा है ई-कचरा
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर में स्थानीय के साथ बड़ी मात्रा में मुंबई, बंगलूरू व कोलकाता से ई-कचरा पहुंच रहा है।
इससे वर्ष 2017 तक ई-कचरे की मात्रा 95 हजार मीट्रिक टन सालाना होगी। अभी इसकी मात्रा 55,000 मीट्रिक टन है। इस लिहाज से सालाना बढ़ोतरी 25 फीसदी है।
वहीं, औपचारिक-अनौपचारिक रिसाइक्लिंग यूनिट में करीब 2.5 लाख कामगार लगे हैं। इसमें 10-14 साल के बच्चों की संख्या 45,000 तक है।
आबोहवा के साथ बच्चों की सेहत बिगाड़ रहा ई-वेस्ट
खास बात यह कि बगैर जरूरी इंतजाम व एहतियात के बच्चे ई-वेस्ट निपटान की अलग-अलग गतिविधियों में काम कर रहे हैं। इससे न सिर्फ बच्चों की सेहत के साथ खिलवाड़ हो रहा है, बल्कि आबोहवा भी खराब हो रही है।
डीएस रावत के मुताबिक, ई-वेस्ट का मसला सीधे आर्थिक विकास से जुड़ा है। जिस हिसाब से देश की लोगों की क्रय शक्ति बढ़ रही है। इलेक्ट्रानिक वस्तुओं का इस्तेमाल और ई-वेस्ट की मात्रा उसी अनुपात में बढ़ रही है।
फिलहाल, इसके निपटान का कारगर तरीका ढूंढना होगा। जरूरी यह भी कि दूसरे राज्यों से आने वाले ई-कचरे पर भी रोक लगे। 70 फीसदी ई-कचरा सरकारी, लोक व निजी उद्यमों से निकलता है। जबकि 15 फीसदी हिस्सेदारी घरेलू सामानों की रहती है।
ई-कचरे की राष्ट्रीय तस्वीर
कुल मात्रा: सालाना 13 लाख मीट्रिक टन
मुंबई: 96,000 मीट्रिक टन
दिल्ली-एनसीआर: 55,000 मीट्रिक टन
बंगलुरु: 52000 मीट्रिक टन
चेन्नई: 47000 मीट्रिक टन
कोलकाता: 35000 मीट्रिक टन
अहमदाबाद: 26000 मीट्रिक टन
हैदराबाद: 25000 मीट्रिक टन
पुणे: 19000 मीट्रिक टन
ई-कचरे में शामिल सामान
कंप्यूटर: 68 फीसदी
मोबाइल: 12 फीसदी
बिजली उपकरण: 8 फीसदी
मेडिकल उपकरण: 7 फीसदी
अन्य: पांच फीसदी
यह होता है नुकसान
- ई-कचरे से लेड, कैडमियम, मरकरी, क्रोमियम समेत एक हजार से ज्यादा जहरीले पदार्थ निकलते हैं जिससे जमीन और भूजल दूषित होता है।
- इसके प्रभाव में आने से सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, उल्टी, उबकाई और आंख में जलन होती है।
- लीवर, किडनी व मानसिक बीमारियां होने का खतरा रहता है।
यहां होता है कचरा रिसाइकिल
इलेक्ट्रिकल स्क्रैप: मायापुरी, पुरानी सीमापुरी
कंप्यूटर: तुर्कमान गेट, शास्त्री पार्क, लाजपत नगर, कीर्ति नगर, कड़कड़डूमा
लेड: मुस्तफाबाद
सर्किट बोर्ड: मंडोली