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दिल्ली का किला बचाने में जुटी आप, पार्टी ने खुद को किया दिल्ली तक सीमित
Thu, 25 Jul 2019 08:15 PM IST
शाहरुख खान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: शाहरुख खान
Updated Thu, 25 Jul 2019 08:15 PM IST
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फाइल फोटो
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लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद आम आदमी पार्टी (आप) ने खुद को दिल्ली पर केंद्रित कर दिया है। पार्टी संयोजक व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पूरी कोशिश दिल्ली में अपने खोए जनाधार को वापस लाने की है।
एक के बाद एक सरकारी योजनाओं की घोषणा कर केजरीवाल दिल्लीवालों को यकीन दिला रहे हैं कि दिल्ली में दोबारा उनकी सरकार बनना दिल्ली के लिए फायदेमंद रहेगा।
असल में लोकसभा चुनाव के नक्शेकदम पर अगर आगामी विधानसभा में भी दिल्ली वोट करती है तो सत्ता पर काबिज आप का खाता खुलना संभव नहीं है, जबकि कांग्रेस के पास सिर्फ पांच विधायक होंगे।
भाजपा की सियासी स्थिति हूबहू 2015 विधानसभा चुनाव की आप जैसी रहेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर मेहरबान दिल्लीवासी भाजपा की झोली में दिल्ली के 70 में से 65 विधायक डाल देंगे।
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एक के बाद एक सरकारी योजनाओं की घोषणा कर केजरीवाल दिल्लीवालों को यकीन दिला रहे हैं कि दिल्ली में दोबारा उनकी सरकार बनना दिल्ली के लिए फायदेमंद रहेगा।
असल में लोकसभा चुनाव के नक्शेकदम पर अगर आगामी विधानसभा में भी दिल्ली वोट करती है तो सत्ता पर काबिज आप का खाता खुलना संभव नहीं है, जबकि कांग्रेस के पास सिर्फ पांच विधायक होंगे।
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भाजपा की सियासी स्थिति हूबहू 2015 विधानसभा चुनाव की आप जैसी रहेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर मेहरबान दिल्लीवासी भाजपा की झोली में दिल्ली के 70 में से 65 विधायक डाल देंगे।
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जानकार बताते हैं कि लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी लहर के अलावा आप की अपनी सियासी रणनीतियां भी बेपटरी रहीं। आप की कांग्रेस के साथ समझौता करने की कोशिश आखिर तक चलती रही, लेकिन हरियाणा का पेंच फंस जाने से समझौता नहीं हो सका था।
कांग्रेस हरियाणा में समझौता करने को तैयार नहीं थी, जबकि आप बगैर हरियाणा के दिल्ली में साथ आने को राजी हुई। इससे मतदाताओं में भ्रम की स्थिति बन गई और झुग्गी-बस्ती, अनधिकृत कॉलोनियों जैसे पार्टी के मजबूत जनाधार वाले इलाके भी उसकी पहुंच से दूर हो गए।
इससे सबके लेते हुए लोकसभा चुनाव के बाद ही आप ने साफ कर दिया है कि वह विधानसभा चुनाव में किसी से समझौते की बात भी नहीं करेगी। वहीं, दिल्ली के अलावा दूसरे राज्य उसकी प्राथमिकता में नहीं होंगे।
पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि फिलहाल आप के सामने दिल्ली का अपना किला बचाए रखने की बड़ी चुनौती है। इसके लिए केजरीवाल समेत पूरी पार्टी को पूरा ध्यान दिल्ली पर देना है।
कांग्रेस हरियाणा में समझौता करने को तैयार नहीं थी, जबकि आप बगैर हरियाणा के दिल्ली में साथ आने को राजी हुई। इससे मतदाताओं में भ्रम की स्थिति बन गई और झुग्गी-बस्ती, अनधिकृत कॉलोनियों जैसे पार्टी के मजबूत जनाधार वाले इलाके भी उसकी पहुंच से दूर हो गए।
इससे सबके लेते हुए लोकसभा चुनाव के बाद ही आप ने साफ कर दिया है कि वह विधानसभा चुनाव में किसी से समझौते की बात भी नहीं करेगी। वहीं, दिल्ली के अलावा दूसरे राज्य उसकी प्राथमिकता में नहीं होंगे।
पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि फिलहाल आप के सामने दिल्ली का अपना किला बचाए रखने की बड़ी चुनौती है। इसके लिए केजरीवाल समेत पूरी पार्टी को पूरा ध्यान दिल्ली पर देना है।
साथ ही दिल्ली सरकार की बड़ी आबादी पर असर डालने वाली योजनाएं इसमें मददगार हो सकती हैं। इसके अलावा आप नेतृत्व को आरोप-प्रत्यारोप की सियासत से भी दूर रहना है।
एक पदाधिकारी ने बताया कि फिलहाल पूरी पार्टी का ध्यान इसी रणनीति पर है। आप अपने फ्रंटल संगठनों को मजबूत करने के साथ बूथ स्तर की टीम को एक बार फिर सक्रिय कर रही है।
अगर फरवरी 2020 में चुनाव होता है तो बूथ स्तर के कार्यकर्ता अभी दिल्ली सरकार की उपलब्धियों को लोगों तक ले जाएंगे। पार्टी इस संभावना पर भी काम कर रही है कि दिल्ली का चुनाव हरियाणा व महाराष्ट्र चुनाव के साथ अक्तूबर 2019 में भी हो सकता है।
एक पदाधिकारी ने बताया कि फिलहाल पूरी पार्टी का ध्यान इसी रणनीति पर है। आप अपने फ्रंटल संगठनों को मजबूत करने के साथ बूथ स्तर की टीम को एक बार फिर सक्रिय कर रही है।
अगर फरवरी 2020 में चुनाव होता है तो बूथ स्तर के कार्यकर्ता अभी दिल्ली सरकार की उपलब्धियों को लोगों तक ले जाएंगे। पार्टी इस संभावना पर भी काम कर रही है कि दिल्ली का चुनाव हरियाणा व महाराष्ट्र चुनाव के साथ अक्तूबर 2019 में भी हो सकता है।