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Delhi NCR News: 59 निगरानी केंद्र, फिर भी दिल्ली के हर इलाके की हवा की सही तस्वीर नहीं
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स्टेशन की लोकेशन, स्थानीय गतिविधियां और मौसम बदलते हैं प्रदूषण का स्तर, ऊंचाई पर भी पीएम2.5 की सांद्रता में अंतर
संतोष कुमार
नई दिल्ली। दिल्ली में वायु प्रदूषण मापने के लिए देश का सबसे बड़ा निगरानी नेटवर्क है। शहर में 59 केंद्रों से मिलने वाले आंकड़ों के आधार पर वायु गुणवत्ता का आकलन किया जाता है। इसके बावजूद इन आंकड़ों से हर इलाके की हवा की वास्तविक स्थिति का सटीक पता नहीं चलता। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसकी प्रमुख वजह निगरानी केंद्रों की लोकेशन और उनके आसपास की भौगोलिक परिस्थितियां हैं। हरित क्षेत्र, व्यस्त सड़कें, औद्योगिक इकाइयां, निर्माण स्थल और घनी आबादी प्रदूषण के स्तर को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करते हैं।
दिल्ली के कई निगरानी केंद्र हरित क्षेत्रों के आसपास स्थित हैं। मंदिर मार्ग, श्री अरविंदो मार्ग, लोधी रोड, सीरी फोर्ट और पूसा इसके उदाहरण हैं। दूसरी ओर, वजीरपुर, बवाना, जहांगीरपुरी, नरेला, ओखला, पटपड़गंज और झिलमिल जैसे इलाकों में औद्योगिक गतिविधियां प्रदूषण को प्रभावित करती हैं। चांदनी चौक जैसे व्यावसायिक क्षेत्रों में भीड़ और यातायात की स्थिति अलग है, जबकि आनंद विहार और आईटीओ में वाहनों से निकलने वाले धुएं का असर अधिक हो सकता है।
इसके अलावा हवा की दिशा, गति, तापमान और स्थानीय मौसम भी प्रदूषकों के फैलाव को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि एक ही समय में दिल्ली के अलग-अलग निगरानी केंद्रों पर वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) में बड़ा अंतर दिखाई दे सकता है।
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ऊंचाई के साथ भी बदलती है प्रदूषण की तस्वीर
प्रदूषण का स्तर केवल स्थान के आधार पर ही नहीं, बल्कि ऊंचाई के साथ भी बदल सकता है। फरवरी 2026 में प्रकाशित आईआईटी दिल्ली के एक शोध के अनुसार, मार्च 2021 में किए गए ड्रोन आधारित मापन के दौरान जमीन से 100 मीटर की ऊंचाई पर पीएम2.5 का स्तर सतह की तुलना में करीब 60 प्रतिशत अधिक दर्ज किया गया था। शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि प्रदूषण का आकलन केवल जमीन के पास किए गए मापन के आधार पर करना पर्याप्त नहीं है। ऊंचाई के साथ तापमान और हवा की परिस्थितियों में बदलाव प्रदूषकों के फैलाव और जमाव को प्रभावित कर सकता है।
सभी स्टेशन पूरे इलाके का प्रतिनिधित्व नहीं करते
आईआईटी दिल्ली के 2023 के एक अन्य अध्ययन में आबादी, भूमि उपयोग और प्रदूषण उत्सर्जन जैसे कारकों के आधार पर पीएम2.5 निगरानी केंद्रों की स्थिति का आकलन किया गया। अध्ययन में सामने आया कि निगरानी नेटवर्क के सभी केंद्रों की क्षेत्रीय पहुंच और अलग-अलग इलाकों की हवा का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता समान नहीं है।
-आईआईटी दिल्ली के सिविल एवं पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर मुकेश खरे के मुताबिक, घनी शहरी बसावट में एक स्टेशन करीब दो से तीन किलोमीटर के क्षेत्र की हवा की स्थिति समझने में मदद कर सकता है। खुले मैदानी इलाकों में यह दायरा पांच किलोमीटर तक हो सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि स्टेशन के आसपास की हर सड़क और बस्ती की हवा का स्तर एक जैसा होगा।
भारतीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों में अंतर
एक्यूआई के आंकड़ों में अंतर की एक वजह अलग-अलग एजेंसियों के आकलन के मानक भी हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के आकलन की तुलना निजी और विदेशी एजेंसियों के आंकड़ों से करने पर अंतर दिखाई दे सकता है।
-सफर के संस्थापक और पर्यावरण विशेषज्ञ गुफरान बेग के मुताबिक, पीएम2.5 की सांद्रता 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर होने पर भारतीय एक्यूआई की गणना में 100 का स्तर आता है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दिशानिर्देशों के संदर्भ में पीएम2.5 की 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर सांद्रता पर यही आंकड़ा बनता है। हालांकि, दोनों मानकों का उद्देश्य और गणना का आधार अलग है।
स्टेशन का आंकड़ा, व्यक्ति के एक्सपोजर का पैमाना नहीं
राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (एनएएमपी) के तहत आवासीय, औद्योगिक, व्यावसायिक और संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी केंद्र स्थापित किए जाते हैं। ये केंद्र रियल टाइम के साथ घंटेवार और 24 घंटे के आंकड़े उपलब्ध कराते हैं। फिर भी, किसी स्टेशन का एक्यूआई यह नहीं बताता कि कोई व्यक्ति वास्तव में कितनी प्रदूषित हवा के संपर्क में आया।
-गुफरान बेग के अनुसार, वास्तविक एक्सपोजर का आकलन करने के लिए यह जानना जरूरी है कि व्यक्ति कहां और कितनी देर रहा। सड़क पर चलते समय, ट्रैफिक सिग्नल के पास, घर या दफ्तर में प्रदूषण के संपर्क का स्तर अलग हो सकता है।
निगरानी केंद्रों के आसपास की गतिविधियां भी अहम
स्टेशन के आसपास होने वाली गतिविधियां भी मापन को प्रभावित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, यदि केंद्र के नजदीक पानी का छिड़काव किया जाए, तो धूल के कण अस्थायी रूप से कम हो सकते हैं और दर्ज प्रदूषण का स्तर प्रभावित हो सकता है। इसी तरह स्टेशन की लोकेशन में बदलाव या उसके आसपास हवा के प्रवाह में बाधा आने से भी मापन की परिस्थितियां बदल सकती हैं।
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संतोष कुमार
नई दिल्ली। दिल्ली में वायु प्रदूषण मापने के लिए देश का सबसे बड़ा निगरानी नेटवर्क है। शहर में 59 केंद्रों से मिलने वाले आंकड़ों के आधार पर वायु गुणवत्ता का आकलन किया जाता है। इसके बावजूद इन आंकड़ों से हर इलाके की हवा की वास्तविक स्थिति का सटीक पता नहीं चलता। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसकी प्रमुख वजह निगरानी केंद्रों की लोकेशन और उनके आसपास की भौगोलिक परिस्थितियां हैं। हरित क्षेत्र, व्यस्त सड़कें, औद्योगिक इकाइयां, निर्माण स्थल और घनी आबादी प्रदूषण के स्तर को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करते हैं।
दिल्ली के कई निगरानी केंद्र हरित क्षेत्रों के आसपास स्थित हैं। मंदिर मार्ग, श्री अरविंदो मार्ग, लोधी रोड, सीरी फोर्ट और पूसा इसके उदाहरण हैं। दूसरी ओर, वजीरपुर, बवाना, जहांगीरपुरी, नरेला, ओखला, पटपड़गंज और झिलमिल जैसे इलाकों में औद्योगिक गतिविधियां प्रदूषण को प्रभावित करती हैं। चांदनी चौक जैसे व्यावसायिक क्षेत्रों में भीड़ और यातायात की स्थिति अलग है, जबकि आनंद विहार और आईटीओ में वाहनों से निकलने वाले धुएं का असर अधिक हो सकता है।
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इसके अलावा हवा की दिशा, गति, तापमान और स्थानीय मौसम भी प्रदूषकों के फैलाव को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि एक ही समय में दिल्ली के अलग-अलग निगरानी केंद्रों पर वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) में बड़ा अंतर दिखाई दे सकता है।
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ऊंचाई के साथ भी बदलती है प्रदूषण की तस्वीर
प्रदूषण का स्तर केवल स्थान के आधार पर ही नहीं, बल्कि ऊंचाई के साथ भी बदल सकता है। फरवरी 2026 में प्रकाशित आईआईटी दिल्ली के एक शोध के अनुसार, मार्च 2021 में किए गए ड्रोन आधारित मापन के दौरान जमीन से 100 मीटर की ऊंचाई पर पीएम2.5 का स्तर सतह की तुलना में करीब 60 प्रतिशत अधिक दर्ज किया गया था। शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि प्रदूषण का आकलन केवल जमीन के पास किए गए मापन के आधार पर करना पर्याप्त नहीं है। ऊंचाई के साथ तापमान और हवा की परिस्थितियों में बदलाव प्रदूषकों के फैलाव और जमाव को प्रभावित कर सकता है।
सभी स्टेशन पूरे इलाके का प्रतिनिधित्व नहीं करते
आईआईटी दिल्ली के 2023 के एक अन्य अध्ययन में आबादी, भूमि उपयोग और प्रदूषण उत्सर्जन जैसे कारकों के आधार पर पीएम2.5 निगरानी केंद्रों की स्थिति का आकलन किया गया। अध्ययन में सामने आया कि निगरानी नेटवर्क के सभी केंद्रों की क्षेत्रीय पहुंच और अलग-अलग इलाकों की हवा का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता समान नहीं है।
-आईआईटी दिल्ली के सिविल एवं पर्यावरण इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर मुकेश खरे के मुताबिक, घनी शहरी बसावट में एक स्टेशन करीब दो से तीन किलोमीटर के क्षेत्र की हवा की स्थिति समझने में मदद कर सकता है। खुले मैदानी इलाकों में यह दायरा पांच किलोमीटर तक हो सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि स्टेशन के आसपास की हर सड़क और बस्ती की हवा का स्तर एक जैसा होगा।
भारतीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों में अंतर
एक्यूआई के आंकड़ों में अंतर की एक वजह अलग-अलग एजेंसियों के आकलन के मानक भी हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) और भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम) के आकलन की तुलना निजी और विदेशी एजेंसियों के आंकड़ों से करने पर अंतर दिखाई दे सकता है।
-सफर के संस्थापक और पर्यावरण विशेषज्ञ गुफरान बेग के मुताबिक, पीएम2.5 की सांद्रता 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर होने पर भारतीय एक्यूआई की गणना में 100 का स्तर आता है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दिशानिर्देशों के संदर्भ में पीएम2.5 की 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर सांद्रता पर यही आंकड़ा बनता है। हालांकि, दोनों मानकों का उद्देश्य और गणना का आधार अलग है।
स्टेशन का आंकड़ा, व्यक्ति के एक्सपोजर का पैमाना नहीं
राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम (एनएएमपी) के तहत आवासीय, औद्योगिक, व्यावसायिक और संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी केंद्र स्थापित किए जाते हैं। ये केंद्र रियल टाइम के साथ घंटेवार और 24 घंटे के आंकड़े उपलब्ध कराते हैं। फिर भी, किसी स्टेशन का एक्यूआई यह नहीं बताता कि कोई व्यक्ति वास्तव में कितनी प्रदूषित हवा के संपर्क में आया।
-गुफरान बेग के अनुसार, वास्तविक एक्सपोजर का आकलन करने के लिए यह जानना जरूरी है कि व्यक्ति कहां और कितनी देर रहा। सड़क पर चलते समय, ट्रैफिक सिग्नल के पास, घर या दफ्तर में प्रदूषण के संपर्क का स्तर अलग हो सकता है।
निगरानी केंद्रों के आसपास की गतिविधियां भी अहम
स्टेशन के आसपास होने वाली गतिविधियां भी मापन को प्रभावित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, यदि केंद्र के नजदीक पानी का छिड़काव किया जाए, तो धूल के कण अस्थायी रूप से कम हो सकते हैं और दर्ज प्रदूषण का स्तर प्रभावित हो सकता है। इसी तरह स्टेशन की लोकेशन में बदलाव या उसके आसपास हवा के प्रवाह में बाधा आने से भी मापन की परिस्थितियां बदल सकती हैं।