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पहाड़ पर लालटेन की रोशनी बिखेर कर चले गए मंगलेश डबराल, पैतृक घर में छाई शोक की लहर
Wed, 09 Dec 2020 10:49 PM IST
प्राची प्रियम
कुमार अतुल/गंगा दत्त थपलियाल, अमर उजाला
कुमार अतुल/गंगा दत्त थपलियाल, अमर उजाला
Published by: प्राची प्रियम
Updated Wed, 09 Dec 2020 10:49 PM IST
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मंगलेश डबराल
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बीते दिनों पर्वतपुत्र साहित्यकार मंगलेश डबराल की बीमारी की खबर सोशल मीडिया पर आई और जंगल में आग की तरह फैल गई थी। जीवन भर वामपंथ दर्शन को ओढ़ने-बिछाने और जीने वाले इस खांटी साहित्यकार के स्वस्थ होने की ईश्वर से प्रार्थना उन्हें हर जानने-पहचानने वाला कर रहा था।
वामपंथी साहित्यकार भी और भाजपा के वरिष्ठ नेता, सांसद और पदाधिकारी भी। एक बात पर सभी सहमत थे कि उन्होंने उत्तराखंड और पहाड़ को साहित्य के मामले में अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। प्रार्थनाएं निष्फल गईं। पहाड़ पर लालटेन की साहित्यिक रोशनी बिखेर कर आखिरकार मंगलेश डबराल चले गए।
मंगलेश का जन्म टिहरी जिले के चंबा ब्लॉक के गांव काफलपानी में हुआ था। इनके पिता मित्रानंद डबराल वैद्य थे। मगर साहित्यिक अभिरुचि संपन्न थे। उन्होंने गढ़वाली मुहावरों और लोकोक्तियों का एक कोश भी तैयार किया था। उन्होंने 200 साल का एक कैलेंडर भी तैयार किया था। मां सतेश्वरी देवी सामान्य गृहणी थीं। मंगलेश चार बहनों के बीच अकेले भाई थे।
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पांचवीं तक ये गांव में पढ़े। बाद में इनका परिवार देहरादून आ गया। मंगलेश जी की कलम को धार देहरादून में ही मिली थी। यहां से प्रकाशित पत्र युगवाणी में उनकी पहली कविता छपी थी।
उस वक्त युगवाणी के संपादक आचार्य गोपेश्वर कोठियाल थे। गोपेश्वर कोठियाल और युगवाणी प्रेस से मंगलेश जी का जीवन भर का नाता जुड़ गया था। गोपेश्वर जी के बेटे संजय कोठियाल बताते हैं कि मंगलेश पहाड़, पहाड़ी लोगों और पहाड़ी व्यंजनों को किस कदर पसंद करते थे इसका ताजा उदाहरण यह है कि इसी दिवाली पर उन्होंने दिल्ली से उनसे पहाड़ी मिठाई सिंगोरी (पत्ते में लपेटी ताजा मावे की एक खास मिठाई) की मांग की थी।
कोरोनाकाल में वह मंगलेश तक यह मिठाई नहीं पहुंचा पाए थे। इसका उन्हें अब अफसोस हो रहा है। देहरादून के दर्शनलाल चौक पर स्थित युगवाणी का दफ्तर मंगलेश डबराल का अड्डा हुआ करता था। इसे देहरादून का मिनी जेएनयू कहा जाता है। मंगलेश जी और तमाम वामपंथी साहित्यकार वहां खूब चौकड़ी जमाते और साहित्य मंथन करते। संजय कोठियाल कहते हैं कि आज इस अड्डे का सबसे बड़ा महारथी चला गया।
मंगलेश डबराल का जाना हिंदी साहित्य की बड़ी क्षति: त्रिवेंद्र
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने रावत साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित, हिंदी भाषा के प्रख्यात लेख, कवि और पत्रकार मंगलेश डबकराल के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। उन्होंने मंगलेश डबराल के निधन को हिंदी साहित्य को एक बड़ी क्षति बताया। उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति व शोक संतप्त परिवार को धैर्य प्रदान करने की ईश्वर से प्रार्थना की।
उत्तराखंड और साहित्य को भारी क्षति : बलूनी
मंगलेश डबराल की बीमारी की खबर पाकर उनके इलाज की त्वरित व्यवस्था कराने वाले सांसद अनिल बलूनी उनके निधन से काफी आहत दिखे। उन्होंने इसे साहित्य जगत के साथ उत्तराखंड का भी भारी नुकसान बताया। उन्होंने बताया कि उनके इलाज के लिए अच्छी से अच्छी व्यवस्था की गई लेकिन होनी को जो मंजूर है, उसे कौन टाल सकता है। अनिल बलूनी ने बताया कि वह मंगलेश के परिवार के संपर्क में हैं और अंतिम संस्कार आदि की पूरी व्यवस्थाओं में लगे हैं।
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वामपंथी साहित्यकार भी और भाजपा के वरिष्ठ नेता, सांसद और पदाधिकारी भी। एक बात पर सभी सहमत थे कि उन्होंने उत्तराखंड और पहाड़ को साहित्य के मामले में अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। प्रार्थनाएं निष्फल गईं। पहाड़ पर लालटेन की साहित्यिक रोशनी बिखेर कर आखिरकार मंगलेश डबराल चले गए।
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मंगलेश का जन्म टिहरी जिले के चंबा ब्लॉक के गांव काफलपानी में हुआ था। इनके पिता मित्रानंद डबराल वैद्य थे। मगर साहित्यिक अभिरुचि संपन्न थे। उन्होंने गढ़वाली मुहावरों और लोकोक्तियों का एक कोश भी तैयार किया था। उन्होंने 200 साल का एक कैलेंडर भी तैयार किया था। मां सतेश्वरी देवी सामान्य गृहणी थीं। मंगलेश चार बहनों के बीच अकेले भाई थे।
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पांचवीं तक ये गांव में पढ़े। बाद में इनका परिवार देहरादून आ गया। मंगलेश जी की कलम को धार देहरादून में ही मिली थी। यहां से प्रकाशित पत्र युगवाणी में उनकी पहली कविता छपी थी।
उस वक्त युगवाणी के संपादक आचार्य गोपेश्वर कोठियाल थे। गोपेश्वर कोठियाल और युगवाणी प्रेस से मंगलेश जी का जीवन भर का नाता जुड़ गया था। गोपेश्वर जी के बेटे संजय कोठियाल बताते हैं कि मंगलेश पहाड़, पहाड़ी लोगों और पहाड़ी व्यंजनों को किस कदर पसंद करते थे इसका ताजा उदाहरण यह है कि इसी दिवाली पर उन्होंने दिल्ली से उनसे पहाड़ी मिठाई सिंगोरी (पत्ते में लपेटी ताजा मावे की एक खास मिठाई) की मांग की थी।
कोरोनाकाल में वह मंगलेश तक यह मिठाई नहीं पहुंचा पाए थे। इसका उन्हें अब अफसोस हो रहा है। देहरादून के दर्शनलाल चौक पर स्थित युगवाणी का दफ्तर मंगलेश डबराल का अड्डा हुआ करता था। इसे देहरादून का मिनी जेएनयू कहा जाता है। मंगलेश जी और तमाम वामपंथी साहित्यकार वहां खूब चौकड़ी जमाते और साहित्य मंथन करते। संजय कोठियाल कहते हैं कि आज इस अड्डे का सबसे बड़ा महारथी चला गया।
मंगलेश डबराल का जाना हिंदी साहित्य की बड़ी क्षति: त्रिवेंद्र
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने रावत साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित, हिंदी भाषा के प्रख्यात लेख, कवि और पत्रकार मंगलेश डबकराल के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है। उन्होंने मंगलेश डबराल के निधन को हिंदी साहित्य को एक बड़ी क्षति बताया। उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति व शोक संतप्त परिवार को धैर्य प्रदान करने की ईश्वर से प्रार्थना की।
उत्तराखंड और साहित्य को भारी क्षति : बलूनी
मंगलेश डबराल की बीमारी की खबर पाकर उनके इलाज की त्वरित व्यवस्था कराने वाले सांसद अनिल बलूनी उनके निधन से काफी आहत दिखे। उन्होंने इसे साहित्य जगत के साथ उत्तराखंड का भी भारी नुकसान बताया। उन्होंने बताया कि उनके इलाज के लिए अच्छी से अच्छी व्यवस्था की गई लेकिन होनी को जो मंजूर है, उसे कौन टाल सकता है। अनिल बलूनी ने बताया कि वह मंगलेश के परिवार के संपर्क में हैं और अंतिम संस्कार आदि की पूरी व्यवस्थाओं में लगे हैं।
आज तो दुख को भी रोना पड़ेगा: लीलाधर जगूड़ी
जाने माने कवि एवं साहित्यकार मंगलेश डबराल के निधन पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कवि लीलाधर जगूड़ी रुंधे स्वर में कहते हैं कि उनकी लगभग पूरी साहित्यिक जिंदगी मंगलेश के साथ बीती। उनके निधन से तो आज दुख को भी रोना पड़ेगा। स्वर्गीय डबराल की साहित्य पर गहरी पैठ थी और उन्होंने अपनी रचनाओं में आम आदमी को हमेशा तवज्जो दी।
बहुत सहज और मिलनसार थे मंगलेश: अतुल
जनकवि डॉ. अतुल शर्मा ने कहा कि ऐसा दुख हो रहा है कि कुछ शब्द ही ढंग से नहीं निकल पा रहे हैं। वह बहुत बड़े कवि थे, लेकिन हमारे तो बड़े भाई की तरह भी थे। वह बहुत ही मिलनसार और सहज थे। कभी यह लगता ही नहीं था कि हम इतने बड़े कवि से बात कर रहे हैं।
डॉ. अतुल ने कहा कि मंगलेश भाई के साथ उनके टिहरी, उत्तरकाशी, दिल्ली आदि जगह के बहुत सारे संस्मरण हैं। 1980 में वह एक पुस्तक के विमोचन के लिए भी देहरादून आए थे। तब भी उनसे खूब बातचीत हुई थी।
पर्वतों को लेकर बेजोड़ थी मंगलेश की निष्ठा: मुकेश
साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने बताया कि मंगलेश से उनका परिचय 30 साल पुराना है। वह एक संवेदनशील कवि के साथ-साथ उच्च दर्जे के अनुवादक, पारखी पत्रकार और मंझे हुए संपादक थे। पर्वतों को लेकर उनकी निष्ठा बेजोड़ थी।
केदारनाथ आपदा पर लिखी अपनी कहानी जब मैंने उन्हें सुनाई तो उन्होंने तुरंत मुझसे प्रति मांगी और उसको प्रकाशित किया। देहरादून जब भी आते तो आने से पहले फोन कर देते। तब हम सभी उनके साथ जुटते और साहित्यिक गोष्ठियां करते थे।
जाने माने कवि एवं साहित्यकार मंगलेश डबराल के निधन पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कवि लीलाधर जगूड़ी रुंधे स्वर में कहते हैं कि उनकी लगभग पूरी साहित्यिक जिंदगी मंगलेश के साथ बीती। उनके निधन से तो आज दुख को भी रोना पड़ेगा। स्वर्गीय डबराल की साहित्य पर गहरी पैठ थी और उन्होंने अपनी रचनाओं में आम आदमी को हमेशा तवज्जो दी।
बहुत सहज और मिलनसार थे मंगलेश: अतुल
जनकवि डॉ. अतुल शर्मा ने कहा कि ऐसा दुख हो रहा है कि कुछ शब्द ही ढंग से नहीं निकल पा रहे हैं। वह बहुत बड़े कवि थे, लेकिन हमारे तो बड़े भाई की तरह भी थे। वह बहुत ही मिलनसार और सहज थे। कभी यह लगता ही नहीं था कि हम इतने बड़े कवि से बात कर रहे हैं।
डॉ. अतुल ने कहा कि मंगलेश भाई के साथ उनके टिहरी, उत्तरकाशी, दिल्ली आदि जगह के बहुत सारे संस्मरण हैं। 1980 में वह एक पुस्तक के विमोचन के लिए भी देहरादून आए थे। तब भी उनसे खूब बातचीत हुई थी।
पर्वतों को लेकर बेजोड़ थी मंगलेश की निष्ठा: मुकेश
साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने बताया कि मंगलेश से उनका परिचय 30 साल पुराना है। वह एक संवेदनशील कवि के साथ-साथ उच्च दर्जे के अनुवादक, पारखी पत्रकार और मंझे हुए संपादक थे। पर्वतों को लेकर उनकी निष्ठा बेजोड़ थी।
केदारनाथ आपदा पर लिखी अपनी कहानी जब मैंने उन्हें सुनाई तो उन्होंने तुरंत मुझसे प्रति मांगी और उसको प्रकाशित किया। देहरादून जब भी आते तो आने से पहले फोन कर देते। तब हम सभी उनके साथ जुटते और साहित्यिक गोष्ठियां करते थे।
बचपन से ही होनहार रहे: प्रमोद कौंसवाल
स्वर्गीय डबराल के भांजे और कवि प्रमोद कौंसवाल ने बताया कि वह बचपन से ही होनहार रहे। उनके निधन से साहित्यिक और पत्रकारिता जगत को खासा नुकसान हुआ है।
मंगलेश डबराल की कविता पहाड़ पर लालटेन का एक अंश
दूर एक लालटेन जलती है पहाड़ पर,
एक तेज आंख की तरह,
टिमटिमाती धीरे-धीरे आग बनती हुई
देखो अपने गिरवी रखे हुए खेत
बिलखती स्त्रियों के उतारे गए गहने
देखो भूख से बाढ़ से
महामारी से मरे हुए
सारे लोग उभर आए हैं चट्टानों से
दोनों हाथों से बेशुमार बर्फ झाड़कर
अपनी भूख को देखो
जो एक मुस्तैद पंजे में बदल रही है
जंगल से लगातार एक दहाड़ आ रही है
और इच्छाएं दांत पैने कर रही हैं पत्थरों पर।
मंगलेश डबराल की प्रमुख कृतियां
पहाड़ पर लालटेन (काव्य संग्रह)
घर का रास्ता (काव्य संग्रह)
हम जो देखते हैं (काव्य संग्रह)
आवाज भी एक जगह है (काव्य संग्रह)
नए युग में शत्रु (काव्य संग्रह)
लेखक की रोटी (गद्य संग्रह)
कवि का अकेलापन (गद्य संग्रह)
एक बार आयोवा (यात्रावृत्त )
(कई कृतियों का अंग्रेजी, जर्मन, रूसी, डच, स्पेनिश, पुर्तगाली, फ्रेंच, इतालवी, पोलिश और बुल्गारियाई भाषाओं में अनुवाद)
पुरस्कार/सम्मान
साहित्य अकादमी सम्मान (2000 में हम जो देखते हैं के लिए)
दिल्ली हिंदी अकादमी का साहित्यकार सम्मान
कुमार विकल स्मृति पुरस्कार
स्वर्गीय डबराल के भांजे और कवि प्रमोद कौंसवाल ने बताया कि वह बचपन से ही होनहार रहे। उनके निधन से साहित्यिक और पत्रकारिता जगत को खासा नुकसान हुआ है।
मंगलेश डबराल की कविता पहाड़ पर लालटेन का एक अंश
दूर एक लालटेन जलती है पहाड़ पर,
एक तेज आंख की तरह,
टिमटिमाती धीरे-धीरे आग बनती हुई
देखो अपने गिरवी रखे हुए खेत
बिलखती स्त्रियों के उतारे गए गहने
देखो भूख से बाढ़ से
महामारी से मरे हुए
सारे लोग उभर आए हैं चट्टानों से
दोनों हाथों से बेशुमार बर्फ झाड़कर
अपनी भूख को देखो
जो एक मुस्तैद पंजे में बदल रही है
जंगल से लगातार एक दहाड़ आ रही है
और इच्छाएं दांत पैने कर रही हैं पत्थरों पर।
मंगलेश डबराल की प्रमुख कृतियां
पहाड़ पर लालटेन (काव्य संग्रह)
घर का रास्ता (काव्य संग्रह)
हम जो देखते हैं (काव्य संग्रह)
आवाज भी एक जगह है (काव्य संग्रह)
नए युग में शत्रु (काव्य संग्रह)
लेखक की रोटी (गद्य संग्रह)
कवि का अकेलापन (गद्य संग्रह)
एक बार आयोवा (यात्रावृत्त )
(कई कृतियों का अंग्रेजी, जर्मन, रूसी, डच, स्पेनिश, पुर्तगाली, फ्रेंच, इतालवी, पोलिश और बुल्गारियाई भाषाओं में अनुवाद)
पुरस्कार/सम्मान
साहित्य अकादमी सम्मान (2000 में हम जो देखते हैं के लिए)
दिल्ली हिंदी अकादमी का साहित्यकार सम्मान
कुमार विकल स्मृति पुरस्कार