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अब नहीं सूखेंगे जल स्रोत, गर्मियों में जल स्रोतों में मिलेगा भरपूर पानी
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 09 Jan 2017 09:49 AM IST
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गंगा और इसकी 11 सहयोगी नदियों के बेसिन के जल स्रोत अब नहीं सूख पाएंगे। पहाड़ों पर बारिश के पानी के बहाव को थाम कर इसे भूगर्भ में रिसाया जाएगा जिससे गर्मियों में जल स्रोतों में भरपूर पानी रहेगा। इससे पहाड़ों की मिट्टी भी नहीं धसकेगी तथा गंगा और इसकी सहयोगी नदियों की जलधारा अविरल-निर्मल रहेगी। नदियों में गाद (सेडीमेंटेशन) भी नहीं बढ़ेगा।
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पहाड़ों पर एक बार में बहुत अधिक बारिश होने से दो नुकसान हो रहे हैं। एक तो पानी तेजी से नीचे निकल जाता है, जिससे जल स्रोत रिचार्ज नहीं हो पाते और दूसरा पानी के तेज बहाव के कारण मिट्टी का क्षरण होता है, जिससे नदियों में गाद बढ़ती है और जलधारा का रास्ता पट जाता है। नमामि गंगे परियोजना के तहत इस समस्या के निराकरण के लिए काम शुरू हो गया है। पहाड़ों पर खाइयां खोदी जा रही हैं। पानी इनमें ठहर जाएगा और धीरे-धीरे जमीन के अंदर रिसेगा जिससे जल स्रोत रिचार्ज होते रहेंगे।
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उत्तराखंड में बीते साल सूखे के लिए एक समय में इकट्ठी बारिश और पानी के बहाव (रन ऑफ) को जिम्मेदार माना गया था। अंदर जल स्रोतों के सूखने के कारण पहाड़ों के दरकने और धसकने की घटनाएं होने लगी थीं। नदियों में गाद भरी होने से बारिश में उनकी धारा भटक जा रही थी, इससे बाढ़ क्षेत्र में फैलाव आ रहा था। नमामि गंगे परियोजना के तहत गंगा तथा यमुना समेत इसकी दूसरे सहयोगी नदियों में खाइयां बनाने का काम शुरू हो गया।
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उत्तरकाशी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, हरिद्वार, ऋषिकेश (देहरादून) में खाइयां बनाने का काम शुरू हो गया है। इसके लिए 16 करोड़ रुपये पहली किस्त के रूप में आवंटित कर दिए गए हैं। पानी के रन आफ को नियंत्रित करने के लिए पहाड़ों पर नालियां भी बनाई गई हैं। इनके बीच-बीच में गड्ढे हैं जिससे पानी अटक कर आगे बढ़ता है। बता दें कि नमामि गंगे परियोजना के तहत उत्तराखंड में गंगा की सहयोगी नदियों का पूरा बेसिन लिया गया।
गंगा और इसकी सहयोगी नदियों के कैचमेंट एरिया में पानी का रन आफ और नदियों में गाद का जमाव रोकने के लिए ट्रेंच बनाई जा रही हैं। उद्देश्य धारा को अविरल और निर्मल रखना है। उत्तरकाशी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, हरिद्वार और देहरादून में ऋषिकेश, राजाजी नेशनल पार्क के कुछ हिस्से में काम किया जा रहा है।
- संतोष विजय शर्मा, मुख्य वन संरक्षक, नमामि गंगे परियोजना