फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   water crisis will be issue in election

यहां पानी का सवाल करेगा नेताजी को 'पानी-पानी'

Mon, 07 Apr 2014 12:34 PM IST
सुधाकर भट्ट/अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट/अमर उजाला, देहरादून Updated Mon, 07 Apr 2014 12:34 PM IST
विज्ञापन
water crisis will be issue in election

लोक सभा चुनाव 2014 के मैदान में पानी का सवाल चुनाव के रणबांकुरों को पानी-पानी कर सकता है। पिछले कई सालों से किए जा रहे वादे के बाद भी प्रदेश में करीब 15 प्रतिशत लोगों को पानी के लिए एक किलोमीटर से लेकर सात किलोमीटर तक का चक्कर लगाना पड़ रहा है।

विज्ञापन


पहाड़ की 84 प्रतिशत खेती आज भी बरसात पर निर्भर है और इस बरसात का भी यह हाल है कि या तो फरवरी में कहर ढा रही है या फिर मई-जून के महीने में।

प्रदेश में मतदान सात मई को है। ऐसे में अधिकतर प्रत्याशी मई की तपती गरमी में ही मतदाताओं के सामने हाथ बांधे खड़े होंगे। पर यही मौसम भी है जब शहरों से लेकर गांव तक पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रहा होता है।

विज्ञापन

मैदान से लेकर पहाड़ तक पानी की किल्लत

water crisis will be issue in election

हाल यह है कि पिछले एक साल में ही राजधानी दून में 20 ट्यूबवेल फेल हो गए थे। अप्रैल के पहले पखवाड़े में ही पानी की समस्या राजधानी में दून में दस्तक देनी शुरू कर दी है। हरिद्वार और उधमसिंहनगर के हालात भी इससे अलग नहीं हैं।

यह हाल तो मैदानी जिलों का है। पर्वतीय जिलों के हालात और खराब हैं। इन जिलों में प्राकृतिक स्रोतों के सूखने की समस्या से लोगों को परेशान होना पड़ रहा है। हर पर्वतीय जिले की एक ही कहानी है।

अधिकतर जिलों में 25 से लेकर 30 प्रतिशत तक लोगों कोपानी के लिए कई-कई किलोमीटर सफर तय करना पड़ता है।

पानी के ल‌िए चलना पड़ता है सात किलोमीटर

water crisis will be issue in election

जनगणना 2011 के मुताबिक पीने का पानी ढो कर लाने की समस्या टिहरी मे सबसे अधिक है। करीब 30 प्रतिशत लोगों के लिए पीने के पानी का मतलब है कि दो किलोमीटर से लेकर सात किलोमीटर तक का सफर तय करना।

जाहिर है कि पीने के पानी का सवाल चुनाव में विकास का वादा लेकर पहुंच रहे राणबांकुरों पर भारी पड़ सकता है। राज्य गठन के 13 साल बाद भी हालात में खास बदलाव नहीं आया है।

16-17 जून 2013 की आपदा के बाद से संपर्क मार्गों की हालत खराब है। ऐसे में पैदल चलकर पसीने-पसीने हो रहे प्रत्याशी पानी का एक गिलास पाने के लिए लोगों की झिड़की सुने तो ताज्जुब न करिएगा।

विज्ञापन

कौन बुझाएगा खेतों की प्यास

water crisis will be issue in election

सवाल सिर्फ पीने के पानी का नही है। सवाल खेतों की प्यास बुझाने का भी है। पर्वतीय जिलों में करीब 84 प्रतिशत खेती बरसात के ऊपर निर्भर है।

मतलब यह कि बरसात समय से हो गई तो फसल सही वरना चौतरफा नुकसान। यह नजारा राज्य गठन के बाद से अभी तक का है।

कहां कितने लोग लाते हैं पैदल चलकर पानी

उत्तरकाशी-28.42, चमोली-24.87, रुद्रप्रयाग-29.08, टिहरी-30, देहरादून-6.67, गढ़वाल-19.25, पिथौरागढ़-22.04, बागेश्वर-27.58, अल्मोड़ा-26.67, चंपावत-25.95, नैनीताल-14.68, उधमसिंहनगर-3.72, हरिद्वार-7.25 (सभी आंकड़े प्रतिशत में)

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed