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बंदरों से बचना है तो 'इन्हें' कराइए भरपेट भोजन

Thu, 26 Dec 2013 09:03 PM IST
कुमार अतुल/अमर उजाला, देहरादून
कुमार अतुल/अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 26 Dec 2013 09:03 PM IST
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want to safe from monkey give food

उत्तराखंड, हिमाचल, यूपी और दिल्ली में बंदरों के उत्पात से त्रस्त लोगों के लिए मेनका गांधी ने फलदार वृक्ष लगाने, कुत्ते पालने समेत कई उपाय सुझाए हैं। उनका दावा है कि बंदरों के उपद्रव से मुक्ति के अब तक अपनाए गए तरीके असरदार साबित नहीं हुए हैं।

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बंदरों के उत्पात से निजात पाने के लिए गोपेश्वर में वन विभाग के अफसरों ने बंदरबाड़ा की स्थापना का प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजा था।

बताया जाता है कि इसे मेनका गांधी की अगुवाई वाली संस्था पीएफए (पीपुल फॉर एनिमल्स) के विरोध के बाद खारिज कर दिया गया। पीएफए ने बंदरबाड़ा के साथ ही बंदरों को पकड़कर जंगलों में छोड़ने जैसे उपाय को भी कारगर नहीं बताया है।
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ये तरीके विफल रहे
दिल्ली और हिमाचल ने अपनाया था, यह तरीका विफल हो गया। मेनका गांधी के अनुसार बंदरबाड़ा की देखभाल करने वाले अफसर पैसा खा गए, नतीजतन बंदर भूख से मर गए

यह प्रयोग दिल्ली, मथुरा और हिमाचल प्रदेश में किया गया, लेकिन कहीं भी सफल नहीं रहा।

अमर उजाला ने लिखा था पत्र
अमर उजाला ने मेनका गांधी के पास उनकी आपत्ति की वजह और बंदरों के उत्पात से निजात पाने के उपाय जानने के लिए पत्र लिखा। उसके जवाब में उन्होंने कई व्यावहारिक उपायों के साथ-साथ उत्पाद के कारण भी बताए हैं।
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मेनका गांधी के अनुसार 1987 में भारत में बंदरों की संख्या 4 करोड़ थी, जो अब घटकर सिर्फ चार लाख रह गई है। वह इसे ‘जीनोसाइड’ (किसी नस्ल का कत्लेआम) की संज्ञा देती हैं।


इसके पीछे बड़ा कारण यह है कि 1983 के बाद वन विभाग ने कुदरती फलों के पौधे लगाने के बजाय इमारती लकड़ी अथवा विदेशी पौधे लगाने शुरू कर दिए। इसलिए बंदरों के लिए भोजन का संकट हो गया।

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