विजय दिवस: रणबांकुरों के 'विशेष सम्मान' की कीमत सिर्फ 200 रुपए, पूरी हकीकत से दिल पसीज जाएगा
सेना में विशिष्ट सेवा के लिए दिए जाने वाले सम्मान की कीमत सिर्फ 200 रुपए, आगे पढ़िए...
सैनिकों को मिलने वाले पीवीएसएम, एवीएसएम, वीएसएम पाने वाले अफसरों को सरकार सस्ता सम्मान दे रही है। यूपी और हरियाणा जैसे राज्यों के मुकाबले उत्तराखंड में सम्मान राशि के तौर पर महज 200 से 400 रुपये सालाना दिए जाते हैं।
दो साल पहले सरकार ने यह सम्मान राशि बढ़ाने की घोषणा की थी, लेकिन आज तक वह घोषणा अमल में नहीं आ पाई। सम्मानित अधिकारी इस बात से भी नाराज हैं कि उन्हें यह मामूली रकम भी सम्मान राशि के बजाए अनुदान राशि बताकर दी जाती है।
उत्तराखंड सैन्य बहुल प्रदेश है। यहां 10 प्रतिशत आबादी पूर्व सैनिक और सैनिक आश्रितों की है। इनके बीच तमाम ऐसे फौजी अफसर हैं, जो परम विशिष्ठ सेवा मेडल (पीवीएसएम), अति विशिष्ठ सेवा मेडल (एवीएसएम), विशिष्ठ सेवा मेडल (वीएसएम) से सम्मानित हैं। इनमें से पीवीएसएम और एवीएसएम को देश के राष्ट्रपति से यह सम्मान मिलता है।
उत्तराखंड सरकार पीवीएसएम को सालाना 400 रुपये, एवीएसएम को सालाना 300 रुपये और वीएसएम को सालाना 200 रुपये अनुदान राशि के तौर पर दे रही है। इसके अलावा प्रदेश में इस ‘विशेष सम्मान’ का कोई सम्मान नहीं है।
घोषणा रह गई हवा-हवाई
यूपी में पीवीएसएम को अवार्ड मिलने के साथ ही एकमुश्त 1 लाख 15 हजार रुपये दिए जाते हैं। इसके बाद सालाना 5400 रुपये दिए जाते हैं। एवीएसएम को सम्मान मिलने पर पहले एकमुश्त 57 हजार रुपये और इसके बाद 4800 रुपये सालाना दिया जाता है।
वीएसएम को सम्मान मिलने पर एकमुश्त 23 हजार रुपये और इसके बाद 3000 रुपये वार्षिक दिया जाता है। इसी प्रकार, तमिलनाडु में पीवीएसएम को 50 हजार रुपये, एवीएसएम को 25 हजार रुपये और वीएसएम को 15 हजार रुपये दिए जाते हैं।
त्रिपुरा जैसे राज्य में भी पीवीएसएम को 18 हजार 500 रुपये, एवीएसएम को 7 हजार 700 रुपये और वीएसएम को 3 हजार 300 रुपये एकमुश्त दिए जाते हैं। लेकिन उत्तराखंड में किसी भी अधिकारी को इनमें से कोई भी सम्मान मिलने पर एकमुश्त राशि नहीं दी जाती है।
घोषणा रह गई हवा-हवाई
सरकार ने दो साल पहले घोषणा की थी कि सम्मान राशि बढ़ाई जाएगी। इसके तहत पीवीएसएम का 7500 रुपये सालाना, एवीएसएम का 5500 रुपये सालाना और वीएसएम का 3000 रुपये सालाना करने का प्रस्ताव था, लेकिन आज तक वह प्रस्ताव कागजों से बाहर नहीं निकल पाया है।
हमारे सामने पहले यह मामला आया था। हमने इस पर काम भी शुरू कर दिया था, लेकिन पूर्व की सरकार में उस पर मोहर नहीं लग पाई। वैसे तो उत्तराखंड में सेना को प्राथमिकता दी जाती है। केवल एक यही मामला अटका रह गया है। अब मुख्यमंत्री जी के पास यह विभाग है, उम्मीद है कि कुछ हल निकलेगा।
- हरक सिंह रावत, कैबिनेट मंत्री