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उत्तराखंड को आपदाओं के साथ जीना सीखना होगा
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Sat, 09 Nov 2013 10:54 AM IST
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16-17 जून को आसमान से बरसी तबाही ने साबित कर दिया कि उत्तराखंड को अब आपदाओं से सबक लेने की आदत डालनी होगी।
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भारी बरसात, भूस्खलन, अचानक उफनाई नदियों के बीच भूंकप का खतरा अब प्रदेश के लिए स्थायी आपदा का संकेत बन रहा है।
विस्थापन का दर्द सहने को विवश
हर नई आपदा पहले की आपदाओं से ज्यादा भयावह साबित हो रही है। आपदाओं के कारण ही प्रदेश में अब करीब 400 गांव हैं जो विस्थापन का दर्द सहने को विवश हैं। जाहिर है अब उत्तराखंड को आपदाओं के साथ जीना सीखना होगा।
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बीते दो साल से लगातार बाढ़ की विभीषिका झेलने से पूर्व 1992 के उत्तरकाशी के भूकंप के बाद 1997 में चमोली के भूकंप ने तबाही मचाई थी। पूरा उत्तराखंड जोन चार और पांच में शामिल है। लिहाजा भूंकप प्रदेश के लिए एक ऐसी वास्तविकता है जिससे बच कर नहीं रहा जा सकता।
2013 की आपदा ने दिए गहरे जख्म
पर्यटन सेक्टर को 25 हजार करोड़ की चपत
तीन दर्जन जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान
करीब 4000 किलोमीटर सड़कें बेकाम
300 से अधिक पेयजल योजनाएं ध्वस्त
दस हजार से अधिक की जनहानि
2012 की बाढ़
उत्तरकाशी में अस्सी ने तबाही मचाई थी
त्रासदी से करीब तीन दर्जन गांव अब भी जूझ रहे
14 पुल और पुलिया बाढ़ की भेंट चढ़ी थी
एक हजार किलोमीटर सड़कें टूटीं
बादल फटने और बाढ़ से 75 जनहानि
2010-11 की बरसात
करीब 14000 किलोमीटर सड़कें टूटी
पर्वतीय जिलों का जनजीवन ठहर गया था
आपदाओं से निपटने में फिसड्डी
आपदा की चुनौतियों से निपटने में प्रदेश बेहद फिसड्डी साबित हुआ है। सबसे ज्यादा बुरा असर सड़कों पर पड़ता है। नई सड़क भी अगले साल आपदा की भेंट चढ़ जाती है। हर नई सड़क अपने साथ नए भूस्खलन क्षेत्र लेकर आती है। इस पर भी हाल यह है कि सड़क निर्माण प्रदेश में मुख्य गतिविधि है।
बारूद का अनियंत्रित उपययोग बदस्तूर जारी है। अकेले प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में करीब 5000 किलोमीटर सड़क का निर्माण प्रस्तावित है। नदियों के मुहाने से लेकर उनके मैदान में उतरने तक जल विद्युत परियोजनओं का साम्राज्य है।
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