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Uttarakhand: जोशीमठ का अध्ययन कर लौटे वैज्ञानिकों का दावा, भू-धंसाव में आएगी कमी, मिलेगी राहत

Tue, 17 Jan 2023 06:15 AM IST
आकाश दुबे अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून
अरविंद सिंह, अमर उजाला, देहरादून Published by: आकाश दुबे Updated Tue, 17 Jan 2023 06:15 AM IST
सार

वैज्ञानिकों का कहना है कि जोशीमठ में भू-धंसाव वाले इलाके की जमीन स्थिर होने का प्रयास कर रही है। हालांकि, इसमें थोड़ा वक्त लगेगा। गर्मी शुरू होते ही परिस्थिति में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे।

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Uttarakhand Scientists who returned after studying landslides claim there will be reduction in landslides in J
जोशीमठ में घरों से पानी का रिसाव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जोशीमठ भू-धंसाव मामले में एक नया खुलासा हुआ है। भू-धंसाव का अध्ययन कर लौटे एक संस्थान के वैज्ञानिकों का कहना है कि हाइड्रोस्टैटिक प्रेशर के साथ ही अलकनंदा नदी में रैणी आपदा के बाद लगातार जारी टो कटिंग के चलते जोशीमठ में यह नजारा देखने को मिला है। हालांकि, सुकून देने वाली बात यह है कि भू-धंसाव क्षेत्र से अधिकांश पानी निकलकर अलकनंदा नदी में जा चुका है। साथ ही अब मिट्टी सूखने लगी है। ऐसे में अब इस भू-धंसाव में काफी हद तक कमी आएगी।

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वैज्ञानिकों का कहना है कि जोशीमठ में भू-धंसाव वाले इलाके की जमीन स्थिर होने का प्रयास कर रही है। हालांकि, इसमें थोड़ा वक्त लगेगा। गर्मी शुरू होते ही परिस्थिति में सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेंगे। नाम न छापने की शर्त पर वैज्ञानिकों ने बताया कि जोशीमठ में जेपी कॉलोनी में जो पानी का बहाव 10 लीटर प्रति सेकंड की गति से हो रहा था, अब वह 1.9 लीटर प्रति सेकंड की गति से हो रहा है। जो सुकून देने वाली बात है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जोशीमठ भू-धंसाव को लेकर साल 2021 में आई रैणी आपदा भी काफी हद तक जिम्मेदार है। वैज्ञानिकों के मुताबिक आपदा के दौरान धौलीगंगा और अलकनंदा नदियों में बड़े पैमाने पर जलप्रवाह हुआ, जिससे अलकनंदा नदी में टो कटिंग हुई जो अब भी जारी है।

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वैज्ञानिक अपने साथ भू-धंसाव वाले इलाके से मिट्टी, पानी के कुछ नमूने भी लाए हैं। जिनकी संस्थान की प्रयोगशाला में जांच की जा रही है। ताकि इस बात का पता लगाया जा सके कि मिट्टी में पानी की मात्रा कितनी है? साथ ही जो जलबहाव हो रहा है क्या वह अज्ञात प्राकृतिक स्रोत का पानी है? या घरों से निकलने वाला पानी है। बता दें कि जोशीमठ भू-धंसाव को लेकर वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाइड्रोलॉजी, आईआईटी रुड़की, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया, आईआईआरएस समेत देश के कई नामीगिरामी संस्थानों के वैज्ञानिकों की टीम दिनरात अध्ययन कर रही है।

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प्रतिदिन घरों से निकलने वाला 30 लाख लीटर पानी भी आपदा के लिए जिम्मेदार
वैज्ञानिकों का कहना है कि जोशीमठ की मौजूदा आबादी 30 हजार के करीब है। यदि एक व्यक्ति प्रतिदिन औसतन 100 लीटर पानी का इस्तेमाल कर रहा है तो ऐसे में जोशीमठ में प्रतिदिन घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से औसतन 30 लाख लीटर पानी निकल रहा है। यहां जल निकासी की उचित व्यवस्था नहीं है, ऐसे में पानी का अधिकांश हिस्सा जमीन में समां रहा है। जिसकी वजह से लगातार जोशीमठ क्षेत्र में हाइड्रोस्टैटिक प्रेशर बन रहा है।

दुरुस्त करनी होगी जल निकासी की व्यवस्था
वैज्ञानिकों का कहना है कि जोशीमठ को आपदा से बचाने के लिए तत्काल जल निकासी की अत्याधुनिक व्यवस्था करनी होगी। इसके साथ ही पानी की आपूर्ति को भी नियंत्रित करना होगा। वहीं, भू-धंसाव वाले इलाकों में जो भी निर्माण किए जाएं या रिटेनिंग वॉल बनाई जाए, उनमें डीप होल बनाए जाएं। ताकि मानसून के दौरान रिटेनिंग वॉल जल निकासी में बाधा न बने।

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