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‘विद्रोह’ से टूट कर बिखर गई उत्तराखंड पुलिस
अजित सिंह राठी/ अमर उजाला, देहरादून
Updated Mon, 17 Aug 2015 12:29 PM IST
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पंद्रह साल की उत्तराखंड पुलिस का अनुशासन टूट कर बिखर गया और पुलिस के सिपाही ‘विद्रोह’ पर उतर आए।
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विद्रोह भी ऐसा कि चार दिन पहले ही बाकायदा अज्ञात नामों से अल्टीमेटम दिया गया। वेतन विसंगति का मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन है इसलिए शासन ने तो हाथ पैर नहीं चलाए। वहीं पीएचक्यू का माइक्रो मैनेजमेंट भी भरभरा कर गिर पड़ा। अनुशासित बल ऐलान कर ‘अनुशासनहीनता’ कर गया और अशोक की लाट कंधों पर सजाए आला अफसर देखते रहे।
पुलिस कांस्टेबल को छठवें वेतनमान का लाभ अक्टूबर 2011 से मिला, लेकिन एरियर नहीं दिया गया। इसी एरियर को लेने के लिए राज्य पुलिस के कांस्टेबलों ने कई स्थानों पर काली पट्टी बांधकर काम किया। मामला न्यायालय और शासन दोनों जगह विचाराधीन है।
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शासन मामले के न्यायालय में विचाराधीन होने के तर्क पर अडिग है, लेकिन यह मसला अब वेतनमान का नहीं बल्कि सही और गलत के साथ पुलिस एक्ट के उन प्रावधनों का है जिनमें पुलिसकर्मी को किसी भी तरह का विरोध करने की इजाजत नहीं है। जिले के पुलिस कप्तान, रेंज के डीआईजी से लेकर डीजीपी तक सभी को इंटेलीजेंस ने चौकस किया था।
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सोशल साइट्स की खबरों ने भी खबरदार किया था, लेकिन पुलिस के आला अफसर इस घटना को टालने में बुरी तरह फेल साबित हुए। अनुशासित व सशस्त्र बल में वैसे भी इस तरह का कृत्य होना खतरनाक संकेत है। शासन की गलती यह है कि उच्च न्यायालय में जाने से पहले ही मामले का निस्तारण नहीं किया।
इसे लेकर बैठकें होती रहीं और पुलिसकर्मी उच्च न्यायालय चले गए। एकल पीठ से जीते तो सरकार डबल बेंच में चली गई। अब मामले की सुनवाई वहीं पर चल रही है। सवाल यह है कि क्या इसे अनुशासनहीनता माना जाएगा। प्रमुख सचिव गृह मनीषा पंवार ने सिर्फ इतना कहा कि अनुशासनहीनता की इजाजत किसी को नहीं है। पीएचक्यू से रिपोर्ट तलब की है।
पुलिस कांस्टेबल समेत कर्मचारियों के दर्जन भर कैडर ऐसे हैं जिन्हें सेटलमेंट की तारीख से छठवें वेतन आयोग का लाभ दिया गया। अब किसी कैडर ने काली पट्टी बांध कर काम किया और सरकार उसके पक्ष में फैसला ले लें तो बाकी कैडरों का क्या होगा। फिर वो कोर्ट जाएंगे। इसलिए जो भी निर्णय न्यायालय से होगा, उसका परीक्षण करने के बाद ही आगे की कार्यवाही होगी।
- राकेश शर्मा, मुख्य सचिव
अब तो इस बात का भी बहाना नहीं चल सकता कि इंटेलीजेंस ने सतर्क नहीं किया। खबर पहले से ही प्रचारित थी। विसंगति तो हमेशा बनी रहती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आंदोलन रोकने में सरकार के हथियार की तरह काम करने वाली पुलिस खुद ही आंदोलन पर उतर जाए। लेकिन फिर भी वेतन विसंगति दूर करने का प्रयास होना चाहिए था।
- जेएस पांडेय, रिटायर्ड डीजीपी
जब मैं आईजी पीएचक्यू था, तब से शासन से पत्राचार जारी है, लेकिन कुछ नहीं हुआ। इससे भी खराब बात यह है कि इसकी जानकारी पिछले चार दिन से सभी को थी, ऐसे में पीएचक्यू को कोई रणनीति बनाकर इसे रोकना चाहिए था। शासन स्तर पर जो भी खामी हो, लेकिन कांस्टेबल के इस कृत्य को लेकर पीएचक्यू फेल हो गया।
- जीवन चंद्र पांडेय, रिटायर्ड आईजी
प्रदेश भर में चिह्नित हुए 66 पुलिसकर्मी
पुलिस कर्मियों के दिनभर चले विरोध प्रदर्शन में रविवार शाम तक 66 पुलिस कर्मियों को चिह्नित किया जा चुका था, जिनके खिलाफ साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। केवल उनके खिलाफ कार्रवाई की तैयारी है जो अड़ियल रवैया अपनाए हैं। आला अफसर भी ज्यादा पर कार्रवाई का चाबुक चलाने के मूड में नहीं हैं।
डीजीपी बीएस सिद्धू के निर्देश के बाद राज्य में काली पट्टी बांधकर विरोध जताने वाले पुलिसकर्मियों की देर रात तक सूची तैयार की गई। खुफिया तंत्र से भी इस बाबत इनपुट मांगा गया है। सूत्रों की मानें अब तक 66 पुलिसकर्मियों के नाम सामने आए हैं। इनमें ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार और टिहरी के सबसे अधिक पुलिसकर्मी हैं।
उनमें में पीएसी के जवानों की संख्या ज्यादा बताई गई है। देहरादून में यह आंकड़ा पांच तक पहुंचा है। डीजीपी बीएस सिद्धू बताते हैं कि कुछ पुलिसकर्मियों ने बहकावे में आकर यह कदम उठाया था, जिन्होंने तुरंत अपनी पट्टी उतार दी। कुछ अड़ियल रहे हैं, जिनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। फेसबुक और व्हाट्स ऐप पर चल रहे संदेशों के बारे में पता किया जा रहा है।
हो सकती है बर्खास्तगी की कार्रवाई
कानून के जानकार बताते है कि सीधे तौर पर यह अनुशासनहीनता से जुड़ा मामला है। इसमें 14 ए के तहत बर्खास्तगी की कार्रवाई तक हो सकती है।
आरोपों को लेकर पुलिस स्तर पर होने वाली जांच में संबंधित पुलिसकर्मी की भूमिका तय होगी। भूमिका के हिसाब से आगे की कार्रवाई तय होगी। इसमें अर्दली रूम में तलब कर सजा देने के साथ चरित्र पंजिका में प्रतिकूल प्रवृष्टि की जा सकती है।
आठ साल से लटका है मामला
प्रदेश के करीब बीस हजार पुलिस कर्मचारियों की वेतन विसंगति का मामला करीब आठ साल से लटका हुआ है। नैनीताल हाईकोर्ट ने बेसिक-पे बढ़ाने और एरियर भुगतान का आदेश कर दिया था, लेकिन प्रदेश सरकार अदालत के फैसले के खिलाफ डबल बेंच में चली गई।
तभी से यह मामला अदालत में विचाराधीन है। हालांकि, पुलिस मुख्यालय दो साल पहले अपील वापस लेकर विवाद निस्तारित करने का अनुरोध शासन से कर चुका है।
साल 2006 में लागू छठे वेतन आयोग में पुलिस कर्मचारियों का मूल वेतन 6,440 रुपए होना था, लेकिन सरकार ने छठे वेतन आयोग को अक्तूबर 2011 से लागू कर दिया। इस वजह से साल 2011 से पहले के पुलिस कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग का लाभ नहीं मिला। जबकि उसके बाद के कर्मचारियों को छठे वेतनमान का लाभ मिल रहा है।
इसी वजह से वेतन विसंगति पैदा हो गई। साल 2011 और उसके बाद भर्ती हुए पुलिसकर्मियों का बेसिक-पे 6,440 रुपए है। जबकि साल 2002 बैच के पुलिसकर्मियों का बेसिक-पे 5,200 रुपए और साल 2005-06 बैच के पुलिसकर्मियों का बेसिक-पे 5,830 रुपए है।
छठा वेतनमान लागू करने के बाद सरकार को साल 2006 से वर्ष 2011 तक के पुलिसकर्मियों का बेसिक पे बढ़ाने के साथ ही उनका एरियर भी देना था। लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं दिया। सरकार से निराश होकर पुलिसकर्मियों ने वेतन विसंगति पर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने साल 2013 में सरकार को पुलिस कर्मचारियों का बेसिक बढ़ाकर एरियर देने का आदेश दिया, लेकिन सरकार साल 2014 में अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट की डबल बेंच में चली गई। इसके बाद से मामला अदालत में विचाराधीन है।
यहां भी विसंगति
पुलिस कर्मचारियों का कहना है हमारी रैंक के सचिवालय कर्मचारियों को बाइक का खर्च 12,00 रुपए मिलता है, जबकि पुलिस विभाग में बीट के सिपाही को 300 रुपए मिलते हैं। तीन साल में मिलने वाली वर्दी की किट में कटौती हो रही है। टीए-डीए का भुगतान भी लटका हुआ है।