उत्तराखंडः पांच दिन चले विस सत्र में सरकार के चक्रव्यूह को भेद नहीं पाया विपक्ष
- कांग्रेस ने सदन में उठाए कई मुद्दे पर नहीं घिरी सरकार
- श्राइन बोर्ड पर सरकार को कुछ हद तक किया असहज
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विधानसभा के पांच दिन चले शीतकालीन सत्र में सत्ता पक्ष के मजबूत संख्या बल के आगे विपक्ष के पैंतरे कोई करामात नहीं दिखा पाए। सरकार को असहज करने के लिए विपक्ष ने हंगामा, धरना और वॉकआउट जैसे दांव चले तो सत्ता पक्ष ने उसके हर दांव को धता बताते हुए अपना कामकाज निपटाया। राज्य विकास के भविष्य की दिशा तय करने वाले कई अहम विधेयकों पर चर्चा तक नहीं हो पाई।
विपक्ष ने मानों रस्मअदायगी के लिए विरोध किया। श्राइन बोर्ड और उत्तराखंड कृषि पौधशाला विधेयक को छोड़कर बाकी 17 विधेयक मिनटों में पास होते चले गए। सियासी जानकारों ने इसे पक्ष विपक्ष की दुरभि संधि माना है और कहा कि कई ज्वलंत और बुनियादी सवाल नेपथ्य में चले गए। कुल मिलाकर सत्र के दौरान भीतर से ठंडी कांग्रेस बाहर से खुद को उग्र दिखाने की जी तोड़ कोशिश करती दिखी। लेकिन उसकी रणनीति कांग्रेस विधायकों के निजी एजेंडे तक सीमित रही।
सदन के बाहर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के तेवर और तंज के हिसाब से उनके समर्थक विधायकों का अंदाज बदलता दिखा। इस सबके बावजूद विपक्ष सरकार को मन की करने से नहीं रोक पाई। अलबत्ता सदन के भीतर एक बार फिर सरकार के मंत्री कमजोर होमवर्क के चलते असहज दिखे और कई ऐसे मौके भी आए जब अपने सदस्यों के कारण सरकार को असहज होना पड़ा।
शीतकालीन सत्र के दौरान कांग्रेस की सदन के भीतर और बाहर की रणनीति में तालमेल गड़बड़ाता दिखा। पहले दिन विपक्ष महंगाई के मुद्दे पर सरकार को घेरने की तैयारी करने पहुंचा, लेकिन विधानसभा के बाहर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के नेतृत्व में कांग्रेसी कार्यकर्ता गैरसैंण में सत्र नहीं करवाने को लेकर मोर्चा खोल धरने पर बैठ गए। विपक्ष ने गैरसैंण में सत्र आयोजित नहीं करने की बात उठाई जरूर, लेकिन वॉकआउट बढ़ती महंगाई के मुद्दे पर किया।
दूसरे दिन कांग्रेस ने गन्ना किसानों के बकाया भुगतान को मुद्दा बनाया। इसी मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत विधानसभा कूच को निकले। हालांकि सरकार के सदन में आश्वासन के बाद विपक्ष शांत हो गया। इस बीच निर्दलीय विधायक प्रीतम पंवार ने श्राइन बोर्ड गठन का विरोध किया।
वहीं, बाहर चल रहे तीर्थ पुरोहितों के प्रदर्शन में केदारनाथ से कांग्रेस विधायक मनोज रावत सक्रिय दिखे। ऐसे में मंत्रिमंडल की बैठक में सरकार ने श्राइन बोर्ड गठन को लेकर निर्णय लिए तो विपक्ष आक्रामक हुआ और रणनीति बदली। कांग्रेस ने कार्यमंत्रणा की बैठक में लाए बिना श्राइन प्रबंधन विधेयक को सदन के पटल पर रखने के बाद अपने तेवर कड़े कर लिए।
विपक्ष ने विधेयक से तीर्थ पुरोहितों और अन्य हक हकूकधारियों के हित प्रभावित होने को लेकर वेल में उतरने से लेकर धरना देने और वॉकआउट तक का दांव चला। पार्टी सड़कों पर तीर्थ पुरोहितों के समर्थन में उतर आई, लेकिन सत्ता पक्ष भी डटा रहा। आखिरी दिन विपक्ष के भारी विरोध के बीच सरकार ने श्राइन बोर्ड विधेयक का नाम परिवर्तित कर उसे पास करवा लिया। सत्र समाप्त होने के बाद कांग्रेस बोर्ड गठन के मुद्दे का सड़कों पर उतर कर विरोध करने की रणनीति बना रही है।
अपनों ने किया मंत्रियों को असहज
विपक्ष के साथ सत्ता पक्ष के सदस्यों ने ट्रेजरी बेंच को असहज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। प्रश्नकाल में बिना तैयारी के पहुंचे मंत्री भाजपा विधायकों के निशाने पर रहे। ट्रेजरी बेंच ने पिछले सत्रों से भी कोई सबक नहीं लिया। अधिकांश मंत्री सदस्यों के अनुपूरक सवालों पर घिरते दिखे।
काम के निकले ‘कामचलाऊ’ संसदीय कार्यमंत्री
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने शीतकालीन सत्र में बतौर संसदीय कार्यमंत्री की जिम्मेदारी कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक को दी। कौशिक ने सदन में दी जिम्मेदारी को मजाक में कामचलाऊ व्यवस्था बताया, लेकिन वे कई विषयों पर विपक्ष पर पलटवार कर उसे शांत करवाने में सफल रहे। ट्रेजरी बेंच के साथी जब भी विपक्ष से घिरे कौशिक उनके पक्ष में खड़े दिखे।