उत्तराखंड: ये है भूस्खलन का प्रदेश, यहां मोड़-मोड़ पर होता है कोई न कोई हादसा, पढ़ें खास रिपोर्ट
प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन जोन बढ़ते ही जा रहे हैं। इनसे, खासतौर पर मानसून के दिनों में यात्रा करना खतरे से खाली नहीं है। कब किस सड़क पर पहाड़ से गिरकर मलबा और बोल्डर आ जाए, कहा नहीं जा सकता है।
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बीते दिनों देवप्रयाग के पास तोता घाटी इलाके से गुजर रहे पत्रकारिता के एक प्रोफसर की कार पर पहाड़ से बोल्डर गिरा और उनकी तत्काल मौत हो गई। हिमाचल प्रदेश में भी पहाड़ से गिरे भारी पत्थर ने एक लोहे का पुल तोड़कर भारी तबाही मचाई थी।
पहाड़ी राज्यों में कमजोर पहाड़ों से होने वाला भूस्खलन बड़ी दुश्वारी और चुनौती का सबब बना हुआ है। सबसे बड़ी बात यह है कि भूस्खलन से निजात पाने के तमाम दावे हवा-हवाई साबित हो रहे हैं। आलम यह है कि ऑलवेदर रोड भी अपने नाम को सार्थक नहीं कर पा रही है।
ऑलवेदर रोड हर मौसम में भूस्खलन की वजह से आए दिन बाधित हो रही है। इससे इसकी गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगे हैं। सरकारी तंत्र भूस्खलन को लेकर संवेदनशील नहीं है। न सभी आशंकित जोनों की निगरानी हो रही और न ही किसी प्रकार का चेतावनी सिस्टम ही लगाया गया है।
प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन जोन बढ़ते ही जा रहे हैं। इनसे, खासतौर पर मानसून के दिनों में यात्रा करना खतरे से खाली नहीं है। कब किस सड़क पर पहाड़ से गिरकर मलबा और बोल्डर आ जाए, कहा नहीं जा सकता है। प्रदेश में इस समय करीब 84 डेंजर जोन (भूस्खलन क्षेत्र) सक्रिय हैं।
संवेदनशील जोनों की निगरानी ही नहीं
देश, दुनिया में बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक भूस्खलन से जहां हर साल हजारों इंसानों को अपनी जिंदगी बचानी पड़ती है। वहीं अरबों की संपत्ति का नुकसान होता है। उत्तराखंड में सरकार और शासन इसके प्रति गंभीर नजर नहीं आते। वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी जैसे वैज्ञानिक संस्थानों को भी भूस्खलन के कारणों के विस्तृत अध्ययन करने व रोकने को लेकर ठोस उपायों की सिफारिश देने के लिए नहीं लगाया गया है।
सरकार और तमाम वैज्ञानिक संस्थान कितने संवेदनशील हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूरे उत्तराखंड में भूस्खलन पर निगरानी को लेकर कहीं भी अर्ली वार्निंग सिस्टम नहीं लगाए गए हैं। वाडिया इंस्टीट्यूट की ओर से आपदा के लिहाज से संवेदनशील कुछ ग्लेशियरों की निगरानी को लेकर ही अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए गए हैं।
संस्थान के वैज्ञानिकों की ओर से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश समेत देश के हिमालयी राज्यों में भूस्खलन को लेकर समय-समय पर अध्ययन किए जा रहे हैं। हाल ही में वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड के नैनीताल और मसूरी जैसे इलाकों में भूस्खलन को लेकर विस्तृत अध्ययन किया है और जिसकी रिपोर्ट भी सरकार शासन को सौंपी गई। लेकिन ऐसी प्राकृतिक आपदाओं को लेकर अभी कुछ किया जाना बाकी है।
आखिर क्या हैं भूस्खलन के कुछ प्रमुख कारण
वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली बर्फबारी के बाद जब गर्मी में बर्फ पिघलती है तो चट्टानों और मिट्टी को मुलायम बना देती है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ढलानों पर गुरुत्वाकर्षण बल अधिक होने की वजह से चट्टानें और मिट्टी नीचे खिसकने लगती हैं। यही भूस्खलन का कारण बनतीं हैं।
इतना ही नहीं वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के चलते उत्तराखंड समेत देश के तमाम पर्वतीय राज्यों में कम समय में बहुत अधिक बारिश भी भूस्खलन का कारण बन रही है। वैज्ञानिकों की बातों पर यकीन करें तो उत्तराखंड समेत देश के तमाम हिमालयी राज्यों में अंधाधुंध तरीके से सड़कों के निर्माण समेत तमाम विकास कार्य, वनों की कटाई और जलाशयों से पानी का रिसाव भूस्खलन का बड़ा कारण साबित हो रहा है।
आखिर कितने प्रकार का होता है भूस्खलन
वैज्ञानिकों के अनुसार भूस्खलन कई प्रकार के होते हैं, जिसमें स्लाइड्स, फाल्स, प्रवाह, मलबे का प्रवाह, मलबा हिमस्खलन, मड फ्लो, टोपल्स, फैलाव समेत कई प्रकार होते हैं।
260 फीट प्रति सेकंड की गति से होता है भूस्खलन
वैज्ञानिक शोधों में यह बात सामने आई है कि उत्तराखंड समेत दुनिया में भूस्खलन की जितनी भी बड़ी घटनाएं हुईं, उनमें से ज्यादातर में भूस्खलन की गति 260 फीट प्रति सेकंड के आसपास रही। वैज्ञानिकों की मानें तो गुरुत्वाकर्षण बल अधिक होने के कारण भूस्खलन के दौरान मलबा तेजी से नीचे गिरता है और भारी तबाही होती है।
देश में कुल भूमि का 12 फ़ीसदी क्षेत्रफल भूस्खलन प्रभावित
आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में कुल जमीन में से 12 फ़ीसदी जमीन ऐसी है जो भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील है। भूस्खलन के लिहाज से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के अलावा देश के पश्चिमी घाट में नीलगिरि की पहाड़ियां, कोंकण क्षेत्र में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और गोवा, आंध्र प्रदेश का पूर्वी क्षेत्र, पूर्वी हिमालय क्षेत्रों में दार्जिलिंग, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश, पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड के कई इलाके भूस्खलन के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं।
ऐसे रुक सकती है भूस्खलन से होने वाली भारी तबाही
- भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में अधिक से अधिक वनीकरण कार्य कराए जाएं।
- सरकार, शासन स्तर पर पर्वतीय क्षेत्रों में वनों के कटान पर रोक लगाई जाए।
- भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में अधिक से अधिक रिटेनिंग वॉल के निर्माण कार्य कराए जाएं।
- भूस्खलन संभावित इलाकों में कमजोर संरचनाओं को मजबूती दी जाए।
- पर्वतीय क्षेत्रों में जलनिकासी के पर्याप्त उपाय किए जाएं।
- साथ ही जहां पर भूस्खलन की भावनाएं ज्यादा हो वहां से आमजन को विस्थापित कर दूसरी जगह बसाया जाए।
संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर हिमस्खलन व भूस्खलन को लेकर अध्ययन किया जा रहा है। हाल फिलहाल में संस्थान के वैज्ञानिकों ने नैनीताल और मसूरी जैसे इलाकों में भूस्खलन को लेकर विस्तृत अध्ययन किया है। जहां तक भूस्खलन संभावित जोन की मॉनिटरिंग का सवाल है तो फिलहाल कहीं भी अर्ली वार्निंग सिस्टम नहीं लगाया गया है। हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाकर उनकी निगरानी की जा रही है।
- डॉक्टर कालाचांद सांई, निदेशक , वाडिया इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन जियोलॉजी