लद्दाख के उच्च हिमालीय क्षेत्रों में आर्यों के पूर्वजों की खोज में जुटे वैज्ञानिक, लिए ग्रामीणों के खून के नमूने
- भारतीय प्राणी विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों की टीम ने लिए लेह के
- दोरपा इलाके के ग्रामीणों का है असली आर्य होने का दावा
विस्तार
भारतीय प्राणी विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों की टीम इन दिनों लद्दाख के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में आर्यों के पूर्वजों की खोज में जुटी हुई है। इसके लिए भारतीय प्राणी विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों की टीम ने लेह लद्दाख क्षेत्र के दोरपा इलाके में दर्जनों ग्रामीणों के खून के नमूने भी लिए हैं।
संस्थान के वैज्ञानिकों की टीम डीएनए टेस्ट के जरिये असली आर्यों के पूर्वजों के बारे में जानकारियां जुटा रही है। संस्थान के क्षेत्रीय प्रभारी डॉ. हर्षवर्धन के मुताबिक आर्य कहां से आए थे। इसको लेकर कई तरह के मत हैं। जहां कई इतिहासकारों का मानना है कि आर्य मध्य एशियाई स्टेपी चरवाहे थे जो 2000 ईसा पूर्व से लेकर 1500 ईसा पूर्व के बीच भारत में आए थे।
इनके जरिये ही इंडो-यूरोपियन भाषाओं का इस उपमहाद्वीप में प्रवेश हुआ। वहीं कुछ इतिहासकारों का तर्क है कि आर्यों का मूल स्थान लिथुआनिया था।
रूस के काकेशस की पहाड़ियों में रहते थे आर्य
कई जातियों के लोग दावा करते हैं कि वही असली आर्यों के वंशज हैं। डॉ. हर्षवर्धन के मुताबिक लेह लद्दाख के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में दोरपा इलाके में रहने वाले ग्रामीणों का दावा है कि वही असली आर्य हैं।
उनके इस दावे की जांच पड़ताल के लिए संस्थान के वैज्ञानिकों की टीम ने दोरपा के कई इलाकों से दर्जनों लोगों के खून के नमूने लिए हैं। जिसकी जांच की जा रही है। डीएनए टेस्ट के जरिये आर्य और उनके पूर्वजों के बारे में जानकारियां जुटाई जाएंगी।
इतिहासकारों का एक वर्ग ऐसा भी है। जिसका मानना है कि आर्य आधुनिक रूस में ब्लैक सी के पास काकेशस की पहाड़ियों में रहते थे। आर्य खैबर दर्रे से होते हुए सिंधु घाटी तक पहुंचे थे।