फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttarakhand ›   Dehradun News ›   uttarakhand news : high court will consider the matter of the right of child birth of prisoners

उत्तराखंड: कैदियों के संतानोत्पत्ति के अधिकार के मामले में हाईकोर्ट करेगा विचार

Fri, 06 Aug 2021 01:11 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यजू डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल
न्यजू डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Fri, 06 Aug 2021 01:11 PM IST
सार

हाईकोर्ट के समक्ष एक कैदी की पत्नी की ओर से संतानोत्पत्ति की इच्छा का हवाला देते हुए अल्पकालिक जमानत के लिए अर्जी दी गई है।

विज्ञापन
uttarakhand news : high court will consider the matter of the right of child birth of prisoners
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

कैदियों के संतानोत्पत्ति के अधिकार से संबंधित याचिका पर उत्तराखंड हाईकोर्ट विचार करेगा। याचिका सामूहिक दुष्कर्म के दोषी कैदी की पत्नी ने डाली है। हाईकोर्ट याचिका में उठाए गए कई पहलुओं पर भी मंथन करेगा। इसमें पत्नी और भविष्य में जन्म लेने वाले बच्चे का अधिकार भी शामिल होगा। मामले की अगली सुनवाई 31 अगस्त हो होगी। 

विज्ञापन


हाईकोर्ट के समक्ष एक कैदी की पत्नी की ओर से संतानोत्पत्ति की इच्छा का हवाला देते हुए अल्पकालिक जमानत के लिए अर्जी दी गई है। मामले में इससे पहले 2016 में निचली अदालत के निर्णय के खिलाफ एक जमानत अपील हाईकोर्ट में दायर की गई थी। वर्ष 2013 में हल्द्वानी में घटित सामूहिक दुष्कर्म के मामले में आरोपी सचिन समेत तीन आरोपियों को पॉक्सो अधिनियम में दोषी पाया गया था।
विज्ञापन


आरोपी को 20 साल, तीन साल और एक साल के सश्रम कारावास और जुर्माने  की सजा सुनाई गई थी। कोर्ट ने 2017 और 2020 में सचिन की जमानत की अपील भी खारिज कर दी थी। मौजूदा अर्जी में कहा गया है कि उसके पति को कारावास की सजा सुनाए जाने के समय आरोपी के विवाह को तीन महीने हो चुके थे। अब उसे कारावास में रहते सात साल से अधिक हो चुके हैं। संतानोत्पत्ति का पत्नी को भी अधिकार है लिहाजा पति को अंशकालिक जमानत दी जाए। 
विज्ञापन
विज्ञापन


मुख्य न्यायाधीश आरएस चौहान और न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा की खंडपीठ ने कहा कि इस तरह का अधिकार देने में अन्य अनेक बिंदु भी विचारणीय हो जाते हैं। जहां एक तरफ जन्म लेने वाले बच्चे का भविष्य बिना पिता के मुश्किल होगा, वहीं दूसरी तरफ परिवार के अधिकार से इनकार करना संभवतया कानून के उद्देश्य की पूर्ति न करे। ऐसे मामलों में पत्नी के अधिकारों पर भी विचार किया जाना आवश्यक होगा।

मामले के अन्य कानूनी और सामाजिक पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा। यह भी विचारणीय है कि संतानोत्पत्ति के बाद बच्चे की मां सरकार से बच्चे के पालन पोषण के लिए नौकरी की भी मांग कर सकती है। कोर्ट ने मामले में न्याय मित्र जेएस विर्क से ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, इंग्लैंड और अमेरिका में इस तरह के मामलों में प्रचलित व्यवस्था की जानकारी के साथ अपनी राय भी देने को कहा।  कोर्ट में यह भी चर्चा हुई कि पूर्व में पटना हाईकोर्ट ने भी ऐसे एक प्रकरण में आजीवन कारावास के कैदी को इस आधार पर पैरोल की इजाजत दी थी। 


बेहद घृणित था सामूहिक दुष्कर्म का यह प्रकरण
वर्ष 2013 में हल्द्वानी में एक नाबालिग लड़की को स्कूल जाते समय कुछ मोटरसाइकिल सवारों ने अगवा कर लिया था। आरोपियों ने उसे एक ट्रक में ले जाकर उसके हाथ पैर बांधकर उसके साथ दुष्कर्म किया। 

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed