नैनीताल : सीएम न बनकर भी उत्तराखंड की सुपर सीएम रहीं इंदिरा, यूं ही कोई नहीं बनता है हृदयेश
उनकी राजनीतिक शुचिता ऐसी थी कि लगभग आधी सदी से अधिक समय तक वह राजनीति में रहीं, लेकिन कभी अपनी राजनीतिक आस्था बदली नहीं।
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आज की अवसरवादी राजनीति के खिलाड़ियों के लिए भले ही ये एक अजूबा हो, लेकिन इंदिरा हृदयेश ने पार्टी के बुरे से बुरे दौर में भी सदैव एक ही पार्टी का दामन थामे रखा और मूल्यों और सिद्धांतों की राजनीति की। उनकी राजनीति के केंद्र में हमेशा वंचित, पीड़ित और और आम लोग रहे।
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चाहे वह राजकीय तदर्थ शिक्षकों को वर्षों की सेवा के बाद ज्वॉइनिंग की तिथि से नियमितीकरण और वरिष्ठता दिलाने का मामला हो, हल्द्वानी में रेलवे भूमि से कब्जा हटाने पर बेघर होने जा रहे लोगों की लड़ाई हो या नैनीताल में सात नंबर क्षेत्र से लोगों को विस्थापित करने का प्रकरण हो, वह बगैर किसी दबाव या चुनावी लाभ-हानि का गणित लगाए दृढ़ता से गरीब और वंचित लोगों के साथ खड़ी रहीं।
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यही उनका मानवीय पक्ष भी था और यही उनकी राजनीतिक शक्ति भी बना। उनकी राजनीतिक शुचिता ऐसी थी कि लगभग आधी सदी से अधिक समय तक वह राजनीति में रहीं, लेकिन कभी अपनी राजनीतिक आस्था बदली नहीं। एक बार कांग्रेस में शामिल होने के बाद वह हमेशा कांग्रेस में ही रहीं।
हिंदी एवं राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर थीं इंदिरा
1960 के दशक में पौड़ी के एक अशासकीय विद्यालय में अध्यापिका बनीं। इसी विद्यालय में हृदयेश कुमार भी कार्यरत थे, जिनसे बाद में उनका विवाह हुआ।
तब गढ़वाल के कद्दावर कांग्रेस नेता हेमवती नंदन बहुगुणा के संपर्क में आने पर उनका राजनीति में रुझान हुआ और पहली बार मात्र 32 वर्ष की आयु में वह गढ़वाल कुमाऊं शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से उतर प्रदेश विधान परिषद की सदस्य बनीं। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
उस दौर में इंटरमीडिएट और राजकीय डिग्री कॉलेज स्तर के अध्यापकों की नियुक्ति की निर्धारित प्रक्रिया न होने के कारण हजारों अध्यापक वर्षों से अस्थायी और तदर्थ रूप में कार्य करने के लिए मजबूर थे। इंदिरा ने लंबी लड़ाई के बाद इनके नियमितीकरण और ज्वॉइनिंग से वरिष्ठता सुनिश्चित करवाई।
अपनी जबरदस्त संघर्ष क्षमता और समर्पित भाव से कार्य करने की शैली के चलते वे 1974, 1986, 1992 और 1998 में एमएलसी चुनीं गईं। उनकी लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी कि विधान परिषद के इतिहास में सर्वाधिक मतांतर से जीतने वाली महिला होने का रिकॉर्ड भी उनके नाम दर्ज रहा।
इसी दौरान वे नारायण दत तिवारी के संपर्क में आईं, जिनकी कार्यप्रणाली से उन्होंने बहुत कुछ सीखा और हमेशा तिवारी की विश्वासपात्र बनीं रहीं। वर्ष 2000 में उतराखंड राज्य बनने पर वे अंतरिम विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनीं।
2002 में प्रदेश में नारायण दत तिवारी सरकार में वह लोक निर्माण, वित की कैबिनेट मंत्री रहीं। 2002, 2012 तथा 2018 के विधानसभा चुनाव में भी वह उतराखंड विधानसभा की सदस्य निर्वाचित हुईं। पार्टी के सरकार में आने पर शिक्षा मंत्री सहित तमाम वरिष्ठ पदों पर रहीं।
यह एक यक्ष प्रश्न ही कहा जाएगा कि पार्टी के प्रति अटूट निष्ठा, बड़े नेताओं की विश्वासपात्र, संसदीय प्रणाली की विशेषज्ञ जानकार, जनता में लोकप्रिय, मजबूत जनाधार कर्मठ और बेहतरीन प्रशासक, जिस कार्य को शुरू करें उसे पूरा निभाने की क्षमता, हाईकमान से निकटता और बेदाग छवि के बावजूद वे राज्य की मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन पाईं।
2016 में जब तमाम मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत सरकार छोड़ कर भाजपा में चले गए थे तो वे मजबूती से पार्टी के साथ खड़ी रहीं। गर्दन में चोट के चलते हरीश रावत लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहे तब भी उन्होंने सरकार की कमान बेहतर तरीके से संभाली और सरकार में हावी होने का प्रयास भी नहीं किया।
उनकी इन्हीं खूबियों के चलते पहले एनडी तिवारी और बाद में हरीश रावत उन्हें सुपर सीएम मानते और कहते रहे लेकिन हकीकत में उतराखंड में उनका सफर नेता प्रतिपक्ष से शुरू होकर नेता प्रतिपक्ष पर ही समाप्त हुआ, हालांकि अपनी क्षमता और लोकप्रियता के बूते जनता के दिल पर राज कर वे सदैव जनता के दिल की हृदयेश ही बनी रहीं।