उत्तराखंड कैग रिपोर्ट : सामरिक और सीमांत सड़क की डीपीआर ही गलत बना दी
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सामरिक महत्व की नेपाल सीमा क्षेत्र की टनकपुर-जौलजीबी सड़क की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) गलत बना दी गई। 263 किलोमीटर की खुली नेपाल सीमा में करीब 173 किलोमीटर सड़क का निर्माण प्रस्तावित किया गया और सर्वे से जाहिर हुआ कि सड़क की वास्तविक लंबाई केवल 135 किलोमीटर की ही थी।
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महालेखा परीक्षक की शनिवार को सदन के पटल पर रखी गई रिपोर्ट के मुताबिक लोक निर्माण विभाग ने ठेकेदार को साफ तौर पर यह बताया ही नहीं कि सड़क बननी कहां-कहां है। इसका नतीजा यह रहा कि सरकार को करीब 1.92 करोड़ का अतिरिक्त नुकसान उठाना पड़ा। इस सड़क के लिए केंद्र सरकार ने करीब 209 करोड़ रुपये दिए थे। इसमें से 73 करोड़ रुपये ही आठ साल मेें खर्च हो पाए।
सामरिक महत्व की सड़क होने के बावजूद विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने में लापरवाही बरती गई। कैग ने पाया कि डीपीआर ही गलत तैयार की गई। भारतीय रोड कांग्रेस कोड का पालन न कर करीब 12 किलोमीटर सड़क तैयार कर दी गई।
सड़क निर्माण में कटने वाले पेड़ों की वन विभाग से समय से अनुमति ली ही नहीं गई। निर्माण कार्य की गुणवत्ता की निगरानी के लिए थर्ड पार्टी ऑडिट का सहारा नहीं लिया गया और 9.21 करोड़ रुपये ही अन्य कार्य में खर्च किए गए।
सड़क की डिजाइनिंग में भी कमी
सुरक्षा पर कैबिनेट समिति ने 2010 में अपनी टिप्पणी दी थी और कहा था कि भारतीय रोड कांग्रेस कोड के हिसाब से सड़क बनाई जाए। इस सड़क से सेवा और सैन्य उपकरणों का लाया और ले जाया जाना है।
पाया गया कि सड़क के 12 किलोमीटर हिस्से की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने से पहले यातायात सर्वे किया ही नहीं गया। थुलिगाड़ से रुपालीगढ़ तक के 43 किलोमीटर के हिस्से में डीपीआर को तैयार करने में पांच साल का समय लगा। पंचेश्वर बांध के प्रस्ताव के कारण डीपीआर बदली गई। देरी के कारण कोरोना का प्रभाव भी सामने आया और ठेकेदार ने समय बढ़ाने की मांग की।
दस्तावेजों की जांच नहीं की, 25 किलोमीटर सड़क कब पूरी होगी पता नहीं
ठेकेदार के दस्तावेज की जांच सही तरीके से होने के कारण अनुबंध निरस्त हुआ और मामला कोर्ट में गया। अब सरकार को पता ही नहीं है कि सड़क कब बनेगी। ठेकेदार ने भी 104 करोड़ रुपये के मुआवजे का दावा किया हुआ है।
सड़क की लागत बढ़ेगी, केवल 12 किलोमीटर सड़क बनी
कैग ने माना है कि केवल 12 किलोमीटर सड़क ही बन पाई है। इससे अब सड़क की लागत बढ़ना भी तय है। कैग ने कहा कि सीमांत और सामरिक महत्व को देखते हुए सरकार पहले औपचारिकताएं पूरी करे और इस सड़क को जल्द से जल्द बनाने का प्रयास करे।
अपने ही विधायक के कार्यस्थगन को झेल चुकी है सरकार
भराड़ीसैंण। इसी सड़क के मामले को लेकर सत्ता पक्ष के विधायक पूरन सिंह फर्त्याल अपनी ही सरकार के खिलाफ सदन में काम रोको प्रस्ताव भी ले आए थे। मुसीबत में फंसी सरकार ने उस समय किसी तरह से इस मामले को संभाला था। फर्त्याल की नाराजगी इस मामले को लेकर अब भी जारी है। ब्यूरो
राजस्व आय से ज्यादा हो रहा है प्रदेश सरकार का खर्च
प्रदेश सरकार अपने संसाधनों का उपयोग भी सही तरीके नहीं कर पा रही है। हाल यह है कि सकार का कर्मचारियों के वेतन, पेंशन सहित अन्य राजस्व मदों में खर्च तेजी से बढ़ रहा है और उस हिसाब से आय नहीं हो रही है। वर्ष 2014 से लेकर 2019 तक की लेखा परीक्षा में पाया गया कि प्रदेश सरकार के कुल खर्च का करीब 84 प्रतिशत तो राजस्व व्यय का ही था।
जबकि इसी अवधि में पंजीगत परिव्यय करीब 19 प्रतिशत पाया गया। राजस्व व्यय में 15 प्रतिशत के हिसाब से इजाफा हुआ और राजस्व आय करीब 13 प्रतिशत के हिसाब से बढ़ी। रिपोर्ट में फिर केंद्र सरकार के स्तर से सीधे राज्य सरकार को करीब 701 करोड़ रुपये दे देने का मामला भी उठा है। यह पैसा संबंधित एजेंसी को दिया जाना था। केंद्र से मिलने वाले सहायता अनुदान में भी कमी आई लेकिन वर्ष 2017-18 में इसमें इजाफा हुआ।
ऊर्जा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों का भी फायदा नहीं मिल रहा है सरकार को
ऊर्जा क्षेत्र के चार सार्वजनिक उपक्रमों में प्रदेश सरकार का 31 मार्च 2019 को कुल निवेश करीब 6000 करोड़ रुपये था। इसमें से सिर्फ दो उपक्रमों को 88 करोड़ का लाभ हुआ और एक उपक्रम ने 553 करोड़ रुपये का नुकसान उठाया।