Uttarakhand: पर्वतीय शहरों में बढ़ रही जनसंख्या, ज्योतिर्मठ जैसे हालात के मुहाने पर खड़े हैं नैनीताल, मसूरी
पर्वतीय शहरों में जनसंख्या बढ़ रही है। नैनीताल, मसूरी, अल्मोड़ा, पौड़ी जैसे शहर ज्योतिर्मठ जैसे हालात के मुहाने पर खड़े हैं। धारण क्षमता के हिसाब से भवन निर्माण पर नियंत्रण करना होगा।
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उत्तराखंड के पर्वतीय शहरों में लगातार बढ़ रही जनसंख्या और भवनों की संख्या ने जोशीमठ जैसे हालात पैदा कर दिए हैं। आज मसूरी, नैनीताल, अल्मोड़ा, पौड़ी जैसे शहर इस बोझ से दबे हैं और ज्योतिर्मठ की भांति खतरे की जद में आ रहे हैं। इन पर नियंत्रण के लिए ठोस नीति की दरकार है।
ज्योतिर्मठ में बीते वर्षों में हुए अनियोजित निर्माण ने हालात चिंताजनक बना दिए। नियमविरुद्ध बहुमंजिला इमारतों ने इस चिंता को और गंभीर बना दिया। उत्तराखंड के तमाम शहरों में इसी तरह से अनियोजित विकास बढ़ रहा है। बीते 25 वर्षों में अल्मोड़ा, नैनीताल, मसूरी, पौड़ी जैसे शहरों में भारी विस्तार हुआ। विस्तार के साथ ही यहां भारी बिल्डिंग मैटेरियल की भी एंट्री हुई। विशेषज्ञों का तर्क है कि पहले पारंपरिक घर औसतन 1.5 से 2 टन का दबाव डालते थे लेकिन अब आधुनिक आरसीसी बिल्डिंग 10 से 20 टन भार जमीन पर डालते हैं। नतीजा पहाड़ के ढलानों पर दबाव, तनाव बढ़ रहा है। बारिश या भूकंप के समय मिट्टी ढीली होकर भू-स्खलन का कारण बनती है। इससे भूधंसाव जैसे हालात पैदा हो रहे हैं।
सबसे पहले जड़ों में पानी जाने से रोकना होगा : डॉ. बियानी
डीबीएस पीजी कॉलेज के पूर्व प्राचार्य व भूगर्भ विज्ञानी डॉ. एके बियानी का कहना है कि सबसे पहले नियंत्रण के लिए घरों का पानी पहाड़ की जड़ों में जाने से रोकना होगा। इसके लिए सरकार कोई ठोस नीति बनाए, सीवर लाइनों पर काम करे। जड़ों में पानी जाने की वजह से इमारतें अस्थिर हो रही हैं। उन्होंने कहा कि मिट्टी की मोटाई और उसके नीचे मलबे का आकलन करने के साथ ही पहाड़ की चट्टानों की क्षमता का भी अध्ययन करने की जरूरत है। इन दोनों विश्लेषण के आधार पर ही पर्वतीय शहरों में विकास करने और पुराने निर्माण को नियंत्रित करने की कोई नीति लागू की जा सकती है।
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कुमाऊं विवि कर चुका है अपने शोध से आगाह
कुमाऊं विवि के एसएसजे कैंपस अल्मोड़ा के भूगर्भ विभाग की पुष्पा और ज्योति जोशी ने अल्मोड़ा पर बढ़ रहे शहरीकरण और मानव गतिविधियों से पैदा हो रहे प्राकृतिक असंतुलन को लेकर शोध किया था। यह शोध यूनिवर्सिटी जर्नल ऑफ एनवायरमेंटल रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित हुआ था। उन्होंने इसमें स्पष्ट किया था कि उत्तराखंड के पहाड़ों पर बढ़ते भारी निर्माण और मैटेरियल का दबाव धीरे-धीरे पर्यावरणीय संकट की ओर बढ़ रहा है। यदि स्थानीय भूगर्भीय क्षमता और पारंपरिक ज्ञान को नजरअंदाज किया गया तो आने वाले वर्षों में और कई जोशीमठ जैसे उदाहरण देखने को मिल सकते हैं।