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देहरादून: गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी को एआई से जोड़ने की पहल, सीएम धामी ने लांच किया वॉइस कलेक्शन पोर्टल

Thu, 22 Oct 2026 03:08 PM IST
Renu Saklani अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: Renu Saklani Updated Thu, 22 Oct 2026 03:08 PM IST
सार

उत्तराखंड की लोकभाषाओं को डिजिटल दुनिया में नई पहचान दिलाने के लिए ‘भाषा एआई’ पहल शुरू की गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषाओं के वॉइस कलेक्शन पोर्टल का शुभारंभ किया। अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री की कुमाऊंनी वॉइस क्लिप से हुई।

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Uttarakhand launches voice collection portal to preserve garhwali kumaoni and jaunsari languages through AI
वॉइस कलेक्शन पोर्टल का शुभारंभ - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गुरुवार को मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय में गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी लोकभाषाओं के वॉइस कलेक्शन पोर्टल का शुभारंभ किया। एआई स्ट्रैटेजिक इंजीनियरिंग (AiSE) फाउंडेशन ने इसे ‘भाषा एआई’ पहल के तहत विकसित किया है। अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री की कुमाऊंनी भाषा में रिकॉर्ड की गई वॉइस क्लिप से हुई।

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मुख्यमंत्री ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि बोली-भाषाएं हमारी पहचान हैं। लोककला, संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित रखने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग जरूरी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में क्षेत्रीय भाषाओं को भी इस तकनीक के अनुरूप विकसित करना होगा, ताकि हमारी भाषाई विरासत को वैश्विक पहचान मिल सके।

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उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का प्रयास है कि दूर-दराज के गांवों में रहने वाले लोग अपनी बोली-भाषा में सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सकें और अपनी बात सरकार तक पहुंचा सकें। इसके लिए एआई का स्थानीय भाषाओं को सही ढंग से समझना जरूरी है। क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों के साथ उनके सही उच्चारण और बोलने की शैली को भी एआई से जोड़ना होगा।

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पीढ़ियों को लोककला, संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने में भी अहम भूमिका निभाएगी
मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड के अलग-अलग क्षेत्रों में एक ही शब्द का उच्चारण अलग-अलग तरीके से किया जाता है। पोर्टल पर जानकारी अपलोड होने से एआई को स्थानीय शब्दों और उच्चारण की विविधता समझने में मदद मिलेगी। उन्होंने विश्वास जताया कि यह पहल लोकभाषाओं के संरक्षण के साथ आने वाली पीढ़ियों को लोककला, संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने में भी अहम भूमिका निभाएगी।

इस अवसर पर पद्मश्री लोकगायक प्रीतम भरतवाण ने कहा कि लोकभाषाओं में लोकजीवन, लोकगीत, जागर और सांस्कृतिक परंपराओं की समृद्ध विरासत है। जागर अकादमी इस पहल में स्थानीय भाषाओं के सही उच्चारण और मौलिकता को बनाए रखने में सहयोग करेगी।



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एआईएसई फाउंडेशन के संस्थापक सचिदानंद सेमवाल ने बताया कि ‘भाषा एआई’ पहल के तहत गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी भाषाओं के शब्दों और आवाजों का संग्रह तैयार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य भविष्य में एआई आधारित तकनीक को इन लोकभाषाओं में संवाद करने में सक्षम बनाना है। कार्यक्रम में शक्ति प्रसाद भट्ट, गजेंद्र नौटियाल, अनिरुद्ध रैथवान, निधि सेमवाल, अनिल गोदियाल, डॉ. जे.के. पांडे और देव रतूड़ी सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

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