उत्तराखंड: टटोले जा रहे हरक सिंह रावत के बयान के सियासी मायने, इन बयानों को लेकर चर्चाओं में रहे
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कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत के बयान के सियासी मायने टटोले जा रहे हैं। कोई इसे उनकी नाराजगी से जोड़कर देख रहा है तो कोई इसे बहुगुणा के लिए राज्यसभा के टिकट की लॉबिंग बता रहा है। सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन अगला विधानसभा चुनाव न लड़ने के हरक के बयान ने प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है।
जब एक ओर प्रदेश की सरकार कोरोना संकट से उबरने का प्रयास कर रही है और उसके सामने राज्यसभा का चुनाव भी है। ठीक ऐसे वक्त में सरकार के मंत्री हरक सिंह का चुनाव न लड़ने को लेकर आया बयान दबाव की राजनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है। लेकिन यह बात कई लोगों को हजम नहीं हो रही है कि सन्निर्माण कर्मकार बोर्ड के अध्यक्ष पद से विदाई की कहानी चुनावी राजनीति के मोड़ पर आकर क्यों अटक गई है? सियासी जानकार इसे राज्यसभा चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं।
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उनका मानना है कि हरक एक तीर से दो निशाने साधना चाह रहे हैं। उनके बयान में एक तरफ उनकी नाराजगी दिखाई दे रही है तो दूसरी तरफ दबाव की सियासत। कांग्रेस बगावत कर भाजपा में आए विधायकों में विजय बहुगुणा ही अकेले नेता हैं, जिनका भाजपा में राजनीतिक पुनर्वास नहीं हो पाया है। हरक का राज्यसभा के टिकट के लिए बहुगुणा की खुलकर पैरवी करना रणनीतिक माना जा रहा है।
बयानों को लेकर चर्चाओं में
प्रदेश की राजनीति के सबसे अनुभवी और कद्दावर नेताओं में शुमार डॉ. हरक सिंह रावत अपने बयानों को लेकर हमेशा चर्चाओं में रहे हैं। वे कांग्रेस में रहे हों या भाजपा में, उन्होंने अपने बयानों और फैसलों से राजनीति को गरमाए रखा।
1. हरक सिंह ने नवंबर 2019 में नगर निगम सभागार में एक कार्यक्रम के दौरान बयान दिया कि उत्तराखंड अलग राज्य बनने से कोई लाभ नहीं हुआ। हमने उत्तराखंड मांग कर गलती की है। उत्तराखंड का विकास दो ही नेता कर सकते थे, जो डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक और हरीश रावत हैं।
2. जनवरी 2019 में हरक सिंह ने मुख्यमंत्री न बन पाने की कसक को बयान किया। उन्होंने कहा कि वह 25 साल से मंत्री हैं, लेकिन उनका प्रमोशन नहीं हुआ।
3. 2017 में उनका यह बयान की भी चर्चा रही कि बीजेपी ने डबल इंजन मांगा और उत्तराखंड की जनता ने मजबूत इंजन दिया। लेकिन आज केंद्र का इंजन कमजोर दिखाई दे रहा है।
4 .वर्ष 2012 के विधानसभा में कांग्रेस को बहुमत मिलने के बाद हरक सिंह मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल थे। लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने कमान विजय बहुगुणा हाथों में थमा दी। इससे नाराज हरक ने तब कहा था कि वह मंत्री पद को जूते की नोक पर रखते हैं। उनके इस बयान को लेकर खासा विवाद हुआ था।
5. वर्ष 2012 में हरक सिंह धारी देवी की कसम खाने को लेकर चर्चाओं में रहे। उन्होंने कहा था कि वे कसम खाते हैं कि मंत्री नहीं बनेंगे। लेकिन बाद में वह मंत्री बनें तो यह कहा गया कि उन्होंने कसम तोड़ दी है।
6. हरक सिंह रावत 18 मार्च 2016 को हरीश रावत सरकार के खिलाफ आठ बागी विधायकों से साथ बगावत का झंडा बुलंद करने को लेकर विवादों में आ गए थे।
मेरी निजी इच्छा है कि मैं 2022 का विधानसभा चुनाव न लड़ूं। लेकिन यह पार्टी हाईकमान की इच्छा पर भी निर्भर करेगा। हमेशा वही नहीं होता है जो आप चाहते हैं। पार्टी हाईकमान जो कहेगा वो मुझे करना पड़ेगा।
- हरक सिंह रावत, कैबिनेट मंत्री