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उत्तराखंड: हाईकोर्ट ने पूछा, केदारनाथ आपदा में लापता शवों की खोज को कौन से वैज्ञानिक तरीके हो सकते हैं इस्तेमाल 

Tue, 23 Jun 2020 12:26 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नैनीताल Published by: अलका त्यागी Updated Tue, 23 Jun 2020 12:26 AM IST
सार

  • हाईकोर्ट ने वाडिया इंस्टीट्यूट से एक सप्ताह में मांगा जवाब

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Uttarakhand High Court Asks to Wadia Institute, What scientific methods can be used to search for missing bodies in Kedarnath disaster
- फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

नैनीताल हाईकोर्ट ने वर्ष 2013 में आई केदारनाथ आपदा के मामले में सुनवाई के बाद वाडिया इंस्टीट्यूट देहरादून से पूछा है कि आपदा में लापता लोगों के शवों को खोजने के लिए कौन कौन से वैज्ञानिक तरीके इस्तेमाल किए जा सकते हैं। कोर्ट ने मामले में एक सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। 

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मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार दिल्ली निवासी अजय गौतम ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि केदारनाथ में 2013 में आई आपदा के बाद केदार घाटी में से करीब 4200 लोग लापता थे।
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इनमें से 600 के कंकाल बरामद हो गए थे। याचिका में कहा कि आपदा के बाद आज भी 3600 लोग केदारघाटी में दफन हैं, जिन्हें सरकार निकालने को लेकर कोई कार्य नहीं कर रही है।
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याचिकाकर्ता ने कहा कि सरकार इस मामले को गंभीरता से ले और केदारघाटी से शवों को निकलवा कर उनका अंतिम संस्कार करवाए। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने वाडिया इंस्टीट्यूट देहरादून को एक सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

चारधाम देवस्थानम बोर्ड मामले में सुनवाई एक सप्ताह बाद

हाईकोर्ट ने भाजपा के राज्यसभा सदस्य व सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से चारधाम देवस्थानम बोर्ड के गठन के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद मामले की अगली सुनवाई के लिए एक सप्ताह बाद की तिथि नियत की है। 

मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन एवं न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से मामले की सुनवाई हुई। राज्य सभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी ने  हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि प्रदेश सरकार द्वारा चारधाम के मंदिरों के प्रबंधन को लेकर लाया गया देवस्थानम बोर्ड अधिनियम असांविधानिक है। देवस्थानम बोर्ड के माध्यम से सरकार द्वारा चारधाम व 51 अन्य मंदिरों का प्रबंधन लेना संविधान के अनुच्छेद 25 व 26 का उल्लंघन है।

याचिका में कहा कि सरकार के इस फैसले के बाद प्रभावित धार्मिक स्थानों व मंदिरों के पुजारियों में भारी रोष है। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि पूर्व में कुछ राज्य तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, केरल व महाराष्ट ने भी इस तरह के निर्णय लिए थे। जिनके खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं और उनको जीत मिली थी। उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णय पहले से ही हैं। याचिका में यह भी प्रार्थना की है कि जब तक इसमें कोर्ट से कोई निर्णय नहीं आ जाता सरकार कोई अग्रिम कार्यवाही न करे। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस प्रकरण पर अगली सुनवाई के लिए एक सप्ताह बाद की तिथि नियत की है।

सरकार ने रोडवेज कर्मियों की हालत प्रवासी मजदूरों जैसी कर दी : हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने रोडवेज कर्मचारी यूनियन की जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद राज्य सरकार से पूछा है कि यूपी सरकार को उत्तराखंड परिवहन निगम का कितना पैसा देना है। कोर्ट ने 29 जून तक इस संबंध में अवगत कराने को कहा है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि सरकार ने रोडवेज कर्मचारियों की हालत प्रवासी मजदूरों जैसी कर दी है। रोडवेज कर्मचारी यूनियन के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि लॉकडाउन में सरकार ने प्रवासियों को लाने के लिए उन्हें दिल्ली सहित कई राज्यो में भेजा, लेकिन अभी तक उन्हें मार्च-अप्रैल माह का वेतन तक नहीं दिया गया है।  

मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन व न्यायमूर्ति आरसी खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार रोडवेज कर्मचारी यूनियन की ओर से पूर्व में जनहित याचिका दायर कर कहा था कि उन्हें निगम की ओर से समय पर वेतन व अन्य भत्तों का भुगतान नहीं  किया जा रहा है और न ही सरकार यूपी से पुराना पैसा वापस ले रही है। इस कारण निगम उन्हें समय पर वेतन नहीं दे पा रहा है।

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