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'क्या उत्तराखंड का नहीं है कोई लोकनृत्य....'

Sun, 29 Dec 2013 11:06 AM IST
अमर उजाला, देहरादून
अमर उजाला, देहरादून Updated Sun, 29 Dec 2013 11:06 AM IST
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uttarakhand have not its folk dance

उत्तराखंड का कोई लोकनृत्य नहीं क्या, दो दिन हो गए रंग महोत्सव शुरू हुए, लेकिन अभी तक दिखाई नहीं दिया। महोत्सव में छत्तीसगढ़, असम और मणिपुर, राजस्थान के लोकनृत्य की दिखाई दे रहे हैं।

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महोत्सव में लोकनृत्य के न होने पर आश्चर्य में पड़े नृत्यांजलि कला केंद्र असम के संस्थापक और कोरियोग्राफर शांतुमणि शर्मा ने बातों ही बातों में यह सवाल खड़ा कर दिया।
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चल रहा है यूनिवर्सल रंग महोत्सव
नगर निगम टाउन हॉल में शुक्रवार से 11वें यूनीवर्सल रंग महोत्सव की शुरुआत हुई है। जिसकी शुरुआत असम के प्रसिद्घ लोक नृत्य बिहू के साथ हुई। मगर उत्तराखंड के लोक नृत्य दिखाई नहीं दिया।
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शनिवार को सात बार राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके कोरियोग्राफर शांतुमणि शर्मा ने उत्तराखंड लोकनृत्य महोत्सव में शामिल न होने पर आश्चर्य जताया। उन्होंने कहा कि किसी भी राज्य में अगर रंग महोत्सव होता है, तो शुरुआत स्थानीय लोक नृत्य से होती है।

होता है दुख
बीते तीन साल से वे देहरादून में होने वाले रंग महोत्सव में आ रहे हैं, लेकिन आजतक उत्तराखंड का लोकनृत्य मंच पर दिखाई नहीं दिया, जिससे बड़ा दुख होता है।

रंग महोत्सव के जरिए ही संस्कृति का आदान-प्रदान होता है, रिश्तों में मजबूती आती है। एक दूसरे राज्यों को जानने और समझने का मौका मिलता है।

दूसरे राज्यों में दिखता है
अपने ही घर में अपनी लोक संस्कृति शामिल न हो तो इससे कलाकारों का मनोबल गिरता है। हालांकि उन्होंने दूसरे राज्यों में होने वाले रंग महोत्सव में उत्तराखंड के लोकनृत्य दिखने की बात जरूर कबूली है।

उन्होंने कहा कि मथुरा में उन्होंने उत्तराखंड का छोलिया नृत्य देखा था। वह बहुत एनर्जेटिक और आकर्षक था। उम्मीद थी यहां भी दिखेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

बिहू के हैं तीन रंग
हरियाली और फसल के प्रतीक असम के प्रसिद्घ बिहू नृत्य के तीन अलग-अलग रूप हैं। शांतुमणि शर्मा ने बताया कि लाइव हो या टीवी हर जगह माघ बिहू की प्रस्तुति होती है।

यह नृत्य धान कटने के बाद होता है। धान की पहली फसल लोग घर लाते हैं, इसके बाद पूरा गांव एक साथ इकट्ठा होकर खुशी मनाता है। इसे भोगाली बिहू भी कहा जाता है।


दूसरा होता है वैशाख बिहू जो नए साल और नए जीवन का प्रतीक है। वैशाख महीने में पेड़ों में नए पत्ते, फूल आते हैं, तब यह नृत्य किया जाता है।

वहीं कार्तिक बिहू इसका तीसरा रूप है, जिसे कंगाल बिहू भी कहते हैं। जब खेतों में कुछ नहीं होता, तब तुलसी के पौंधे की पूजा की जाती है और लोगों की समृद्घि और कुशलक्षेम के लिए नृत्य किया जाता है।

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