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साहित्यकारों को भूल गई उत्तराखंड की सरकार

Thu, 13 Aug 2015 03:19 PM IST
ओमप्रकाश तिवारी / अमर उजाला, देहरादून
ओमप्रकाश तिवारी / अमर उजाला, देहरादून Updated Thu, 13 Aug 2015 03:19 PM IST
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uttarakhand government give no prize to writers.

एक सांस्कृतिक कार्यक्रम मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि अपनी लोक भाषा, कला और साहित्य से जुड़ाव नहीं रखेंगे तो चाहे कितनी तरक्की कर लें, उसका कोई लाभ नहीं है। लेकिन सीएम साहब एक सच यह भी है कि उत्तराखंड बनने से अब तक प्रदेश की सरकारों ने राज्य के लेखकों और साहित्यकारों को भुला रखा है।

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यह जानकर आश्चर्य होगा कि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से आज तक प्रदेश के किसी साहित्यकार को प्रदेश सरकार की तरफ से किसी प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित नहीं किया गया है। वह भी तब, जबकि इन वर्षों में एक मुख्यमंत्री ऐसे भी रहे, जो खुद साहित्यकार हैं।
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देश में उत्तराखंड शायद ऐसा राज्य है, जहां साहित्यकारों के लिए किसी प्रतिष्ठित पुरस्कार की योजना नहीं है। जबकि दिल्ली, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अपने लेखकों को हर साल प्रतिष्ठित पुरस्कार देकर सम्मानित करते हैं।
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वरिष्ठ साहित्यकार जितेन ठाकुर कहते हैं कि प्रदेश में किसी भी पार्टी की सरकार रही हो उसके पास साहित्यकारों के बारे में सोचने तक की फुर्सत नहीं रही है। बताते हैं कि जब हिंदी अकादमी की निदेशक डॉ. सविता मोहन हुआ करतीं थी तो गढ़वाली और कुमाऊंनी के कुछ लेखकों को सम्मानित किया गया था।

लेकिन उसके बाद से आज तक याद नहीं आता कि किसी लेखक को सरकार ने किसी तरह का पुरस्कार दिया हो। कहते हैं कि यहां हिंदी अकादमी के पास न तो पुराने लेखकों को सम्मानित करने की योजना है और न ही नवोदित लेखकों के लिए।

आधारशिला पत्रिका के संपादक दिवाकर भट्ट कहते हैं कि एक साल सरकार ने कुछ साहित्यकारों को सम्मानित किया था। लेकिन उसमें भी बड़ा मजाक यह था कि लेखकों को सम्मान राशि 250 रुपए दी गई थी, जबकि जिस होटल में लेखकों को ठहराया गया था उसका बिल 25000 रुपए भरा गया। उनका कहना है कि सांस्कृतिक रूप से समृद्ध प्रदेश में लेखकों की ऐसी उपेक्षा अफसोस जनक है।

राज्य बनने के दस साल बाद हिंदी अकादमी की स्थापना

साहित्य और साहित्यकारों के प्रति प्रदेश सरकारों के सरोकारों का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य बनने के दस साल बाद वर्ष 2010 में हिंदी अकादमी की स्थापना की गई। इसी साल ही भाषा संस्थान की भी स्थापना की गई।

हिंदी अकादमी का नाम प्रदेश के ख्याति नाम साहित्यकार डॉ. पीतांबर बड़थ्वाल के नाम पर तो कर दिया गया, लेकिन अकादमी चलाने के लिए उचित बजट की व्यवस्था नहीं की गई। यही वजह रही कि यह अकादमी जैसे-तैसे संविदा पर रखे गए कुछ कर्मचारियों के सहारे चल रही है।

हिंदी अकादमी की योजनाएं

- वैज्ञानिक लेखन एवं हिंदी मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार योजना : अकादमी की योजना में यह शामिल तो है, लेकिन आज तक इससे कोई लाभान्वित नहीं हो पाया।

- संकलन एवं प्रकाशन योजना : इस योजना के तहत केदार मानस नाम से एक त्रैमासिक शोथ पत्रिका का प्रकाशन किया जाता है। इसके अलावा प्रदेश के साहित्यकारों के रचनाओं का ग्रंथ प्रकाशित करने की भी योजना है। इसके तहत अभी केवल डॉ. पीतांबर दत्त बड़थ्वाल के साहित्य को प्रकाशित किया गया है।

- आर्थिक सहायता अनुदान योजना : इसके तहत ऐसे लेखकों को उनकी पुस्तक के प्रकाशन में आर्थिक सहयोग दिया जाता है जो अपनी किताब प्रकाशित करने में असमर्थ हों। इस योजना के तहत अब तक वर्ष 2011-12 में 25 लेखक। वर्ष 2012-13 में 25 लेखक और वर्ष 2013-14 में 36 लेखकों को पुस्तक प्रकाशन के लिए राशि दी गई है।

- राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन एवं हिंदी प्रतियोगिताओं का आयोजन : किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन अभी तक नहीं किया गया है। हिंदी दिवस और बाल दिवस आदि मौकों पर प्रतियोगिताओं का आयोजन कर दिया जाता है।

- हिंदी पुस्तकालय की स्थापना : यह योजना भी अभी अपने प्रथम चरण में ही है।

छह साल में छह सचिव
हिंदी अकादमी की पहली निदेशक डॉ. सविता मोहन नियुक्त की गई थी। इनका कार्यकाल 24 फरवरी 2010 से 11 अक्तूबर 2011 तक रहा। बताया जाता है कि इन्होंने अपने कार्यकाल में अकादमी को स्थापित करने में काफी कार्य किया। इसके बाद सचिव पद पर डॉ. मुनिराम सकलानी की नियुक्ति की गई।

इनका कार्यकाल 12 अक्तूबर 2011 से 5 मार्च 2014 तक रहा। बताया जाता कि डा. सकलानी अपने कार्यकाल में काफी सक्रिय रहे। इसके बाद इस पद पर डॉ. मनमोहन जोशी की नियुक्ति की गई, जो पांच मार्च 2014 से 23 सितंबर 2014 तक रहे।

23 सितंबर 2014 को अकादमी के निदेशक पद पर आईएएस विनोद शर्मा की नियुक्ति की गई, जो 24 दिसंबर 2014 तक इस पद पर रहे। इसके बाद 24 दिसंबर 2014 को सुधीर जोशी को यहां नियुक्त किया गया, जो 9 जनवरी 2015 तक इस पद पर रहे।

9 जनवरी 2015 से इस पद पर विजय कुमार ढौंडियाल नियुक्त हैं। इस तरह अपने करीब पांच साल की उम्र में हिंदी अकादमी ने छह सचिवों के कार्यकाल को देखा है। जाहिर है इतने कम समय में कोई भी कुछ नहीं कर सकता।

वह भी तब जबकि किसी को भी पूरी तरह से अकादमी की जिम्मेदारी नहीं दी गई थी। अब तक बनाए गए लगभग सभी सचिव अतिरिक्त जिम्मेदारी के तहत ही यहां रहे और उसी तरह कार्य भी किया।

इनकी भी स्थापना
हिंदी अकादमी के अलावा उर्दू अकादमी, पंजाबी अकादमी और भाषा संस्थान की भी स्थापना की गई है, लेकिन सभी की हालत एक जैसी है। सभी बजट नहीं मिलने की वजह से अपने वजूद को किसी तरह ढो रही हैं।

वर्ष 2011 से नहीं मिला बजट
हिंदी अकादमी के प्रभारी निदेशक रहे डॉ. मनमोहन जोशी कहते हैं कि साल 2011 के बाद से किसी भी लेखक को कोई सम्मान नहीं दिया गया है। उनका कहना है कि इसके बाद से सरकार ने बजट नहीं दिया।

प्रभारी निदेशक प्रशिक्षण पर
हिंदी अकादमी के प्रभारी निदेशक विजय कुमार ढौंडियाल फिलहाल मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशिक्षण अकादमी में प्रशिक्षण लेने गए हैं। वह चार सितंबर को आएंगे। उनकी अनुपस्थित में अकादमी में कोई ऐसा अधिकारी या कर्मचारी नहीं तैनात किया गया है, जो अकादमी के कार्यों को संचालित कर सके।


अकादमी में अधिकतर कर्मचारी संविदा पर
यह भी गौर करने की बात है कि हिंदी अकादमी में कार्यरत करीब छह कर्मचारियों में से लगभग सभी संविदा पर तैनात हैं। इन कर्मचारियों को अपने ही भविष्य की चिंता सताती रहती है वह किसी लेखक के लिए क्या कर सकते हैं?

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