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Uttarakhand: जलविद्युत के साथ सौर ऊर्जा में भी प्रदेश ने बनाई अपनी पहचान, 25 साल में बढ़ा जल विद्युत उत्पादन

Fri, 31 Oct 2025 02:47 PM IST
रेनू सकलानी अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून
अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून Published by: रेनू सकलानी Updated Fri, 31 Oct 2025 02:47 PM IST
सार

जलविद्युत के साथ सौर ऊर्जा में भी उत्तराखंड ने अपनी पहचान बनाई है। 25 साल में जल विद्युत उत्पादन बढ़ा है। राज्य स्थापना के समय 992 मेगावाट का जल विद्युत उत्पादन 1440 मेगावाट पर पहुंचा। 

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Uttarakhand Foundation Day: Along with hydropower Uttarakhand has also made its mark in solar energy
सौर ऊर्जा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तराखंड राज्य स्थापना से लेकर आज तक एक ओर जहां जल विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में निरंतर प्रगति हुई है तो सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भी नए आयाम स्थापित हो रहे हैं। उत्तराखंड में ऊर्जा के 25 साल जहां सकारात्मक तरक्की की ओर कदम बढ़ाने वाले रहे तो वहीं पर्यावरणीय कारणों से चुनौतियां भी कम नहीं रही। आने वाले समय में निश्चित तौर पर सौर ऊर्जा, जल विद्युत परियोजनाओं के साथ ही कोयला आधारित ऊर्जा उत्पादन से उत्तराखंड ऊर्जा क्षेत्र में देश के सरप्लस राज्यों में शुमार हो सकता है।

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25 साल में बढ़ा जल विद्युत उत्पादन

आंकड़ों पर गौर करें तो 25 साल में यूजेवीएनएल के जल विद्युत उत्पादन में निरंतर प्रगति हुई है। वर्ष 2000-01 में यूजेवीएनएल का उत्पादन 992 मेगावाट (335 करोड़ यूनिट) था। तब से लगातार उत्पादन बढ़ोतरी की ओर है। वर्ष 2024-25 में यूजेवीएनएल का विद्युत उत्पादन 1440.60 मेगावाट (517.5 करोड़ यूनिट) पर पहुंच गया है। यूजेवीएनएल के एमडी डॉ. संदीप सिंघल का कहना है कि निश्चित तौर पर जल विद्युत उत्पादन लगातार बढ़ा है। उन्होंने बताया कि इन 25 वर्षों में राज्य में 304 मेगावाट की मनेरी भाली-2 और 120 मेगावाट की व्यासी परियोजना का उत्पादन शुरू हुआ जो ऐतिहासिक उपलिब्ध है। वहीं, 300 मेगावाट की लखवाड़ बहुद्देशीय परियोजना आगे बढ़ चुकी है।

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जल विद्युत परियोजनाओं की राह में पर्यावरणीय चुनौतियां
वैसे तो राज्य में 25 साल में जितनी जल विद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हुईं, अगर धरातल पर आ जाती तो सचमुच ऊर्जा प्रदेश बन जाता। लेकिन लगातार परियोजनाओं में पर्यावरणीय अड़चनें रही हैं। 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद से गंगा और सहायक नदियों पर केंद्र ने जल विद्युत परियोजनाएं बनाने पर रोक लगा दी थी। इस दिशा में लगातार प्रयासों के बाद अब कुछ सफलता मिलनी शुरू तो हुई है लेकिन अभी और मेहनत की दरकार है। एक अनुमान के मुताबिक, जल विद्युत के क्षेत्र में उत्तराखंड की क्षमता 20 हजार मेगावाट से अधिक की है, जिसके सापेक्ष अभी तक 1400 मेगवाट तक ही पहुंच पाए हैं।

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सौर ऊर्जा में बढ़े कदम, चुनौतियां भी नहीं कम

उत्तराखंड ने 25 साल में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भी ठोस कदम उठाए हैं। पहले मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना शुरू की गई थी, जिसके बाद हाल ही में सरकार ने जरूरी पहल करते हुए सौर ऊर्जा नीति लागू कर दी। आलम ये है कि सौर ऊर्जा नीति के तहत प्रदेश के कई जिलों में तो यूपीसीएल की ग्रिड फुल हो गई है। नए सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट नहीं मिल पा रहे हैं। राज्य 400 मेगावाट से अधिक का सौर ऊर्जा उत्पादन कर रहा है जो कि राज्य की कुल बिजली उत्पादन क्षमता का करीब नौ प्रतिशत है। 81 प्रतिशत अभी भी जल विद्युत से ही आता है। बीते दिनों केंद्र सरकार की ओर से लागू हुई पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के तहत 37,400 से अधिक घरों में सोलर प्लांट लग चुके हैं, जिससे 140 मेगावाट से अधिक उत्पादन हो रहा है।

ऊर्जा उत्पादन में सरप्लस राज्य बनेगा उत्तराखंड

भविष्य के नजरिये से देखें तो आने वाला समय उत्तराखंड का होगा। 1320 मेगावाट की कोयला आधारित बिजली परियोजना के लिए केंद्र से अनुमति मिलने के बाद कोल ब्लॉक आवंटन भी हो चुका है। जल्द ही इसका काम आगे बढ़ जाएगा। वहीं, पिथौरागढ़ में 144 मेगावाट की सेला उर्थिंग परियोजना, 660 मेगावाट की किसाऊ बांध परियोजना समेत कई बड़ी परियोजनाएं भी आगे बढ़ रही हैं जो कि भविष्य में बिजली उत्पादन में एक नई पहचान कायम करेंगी।

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2032 तक दोगुनी हो जाएगी बिजली की मांग

उत्तराखंड में बिजली की मांग का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ रहा है। वर्ष 2019 में 2216 मेगावाट, 2020 में 2233 मेगावाट, 2021 में 2372 मेगावाट, 2022 में 2468 मेगावाट, 2023 में 2594 मेगावाट, 2024 में 2635 मेगावाट और इस साल 2863 मेगावाट बिजली की मांग रही है। वर्ष 2026 में 3035, 2027 में 3217 मेगावाट, 2028 में 3410 मेगावाट, 2029 में 3614 मेगावाट, 2030 में 3831 मेगावाट, 2031 में 4004 मेगावाट और 2032 में मांग का आंकड़ा 4184 मेगावाट पहुंचने का अनुमान जताया गया है। इसी हिसाब से सरकार ऊर्जा उपलब्धता की दिशा में प्रयास कर रही है।

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