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Exclusive Interview: पूर्व सीएम हरीश रावत बोले, मेरे राजनीतिक अस्तित्व के लिए जरूरी है कि केंद्र में आए कांग्रेस 

Mon, 14 Sep 2020 03:00 AM IST
अलका त्यागी सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून
सुधाकर भट्ट, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Mon, 14 Sep 2020 03:00 AM IST
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Uttarakhand former cm and congress national general secretary Harish rawat exclusive interview with amar ujala
- फोटो : फाइल फोटो

कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की आलोचना की जा सकती है, उन्हें सराहा जा सकता है, लेकिन नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 2017 के चुनाव में यह भाजपा को स्वीकार भी करना पड़ा था।

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अब प्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। कोरोना संक्रमण का ग्राफ भी बढ़ रहा है, इस सबके बीच हरीश रावत की मौजूदगी उत्तराखंड में लगातार बनी हुई है। कहने वाले कह रहे हैं कि हरीश रावत मुख्यमंत्री बनना चाह रहे हैं। खुद हरीश रावत इन मुद्दों पर बोले और बेबाकी से बोले। साफ किया कि उनकी मंजिल सिर्फ उत्तराखंड तक ही सीमित नहीं है।

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पूर्व सीएम हरीश रावत से सीधे सवाल

  • आपको पंजाब का प्रभार मिला है। पंजाब में भी हालात ठीक नहीं हैं। कैप्टन अमरिंदर को बाजवा और अन्य असंतुष्टों की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। कैसे मुकाबला करेंगे?
     - मैंने अपने अनुभव में यह पाया है कि पार्टी के अंदर झगड़ा तब उठ खड़ा होता है जब पार्टी का संपर्क जनसामान्य से टूटने लगता है। असम में भी पार्टी के अंदर बहुत झगड़े थे। हमने पार्टी संगठन को मजबूत किया, उसे लोगों से जोड़ा। आपको यकीन करना होगा कि छह माह में ही पार्टी के सारे अंतर्विरोध गायब हो गए। पंजाब में भी स्थिति सुधरेगी। जैसे-जैसे हमारी स्थिति जनता के बीच में सुधरती जाएगी, वैसे-वैसे पार्टी के अंदरूनी झगड़े भी खत्म हो जाएंगे।
  •  2022 में पंजाब में भी चुनाव हैं और उत्तराखंड में भी। उत्तराखंड से आपका लगाव जगजाहिर है। दो नावों की सवारी हो पाएगी?
    - 2022 के चुनाव करो या मरो वाले होंगे। हर किसी का चुनाव लड़ना जरूरी भी नहीं है, कुछ चुनाव लड़ाने वाले भी तो चाहिए। कोरोना ने एक बात तो सिखाई है, दुनिया बहुत हद तक आभासी भी हो रही है। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आप कहां हैैं। असम का काम भी तो मैंने देखा ही, सौ से अधिक वेबिनार किए।
  • उत्तराखंड की सियासत को कैसे देखते हैं?
    - हमें कहने की जरूरत नहीं पड़ रही है। आने वाला चुुनाव में कांग्रेस की पूर्व सरकार और वर्तमान सरकार के काम की तुलना होगी, या कहें कि हो रही है। इसे देखते हुए ही मैंने रणनीति बनाई है। छोटी-छोटी बाते उठाते हैं। लोग मुझे फोन करके कहते हैं कि झुमेला की प्रतियोगिता कराइए। पीएम ने जैसे ही लोकल और वोकल का नारा दिया, यहां के लोगों के जेहन में तुरंत मेरा चेहरा उभर आया। भई, हरीश रावत भी तो यही कहता था।
  • आप की सक्रियता की आपके आलोचक भी दाद देते हैं। उत्तराखंड पहुंचते ही यह बढ़ जाती है?
    - उत्तराखंड बार-बार आने का मेरा सिर्फ एक ही मकसद है, यहां मेरी उपस्थिति एक उत्प्रेरक का काम करती है। उपस्थिति का मतलब एक डिब्बे में बंद होकर रहना नहीं है, बल्कि एक जीवंत व्यक्ति के रूप में खड़े रहना है, क्रिया-प्रतिक्रिया अपने आप होती है।
  • कहा जाता है कि आप उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। इसीलिए आप उत्तराखंड में उपस्थिति बनाए रखते हैं। आपकी सक्रियता को भी इसी से जोड़ कर देखा जाता है?
    - मैं एक बात कहूंगा। चुनावी सफलता से चुनाव एस्पेक्ट ज्यादा महत्वपूर्ण है। राजनीतिक रूप से कांग्रेस अगर दिल्ली या कहीं आती है तो जब तक मेरे हाथ पांव चलेंगे, कांग्रेस मुझे खड़ा रखेगी। आज भी मेरी जरूरत नहीं थी, मुझे जगह मिली। मेरे राजनीतिक अस्तित्व के लिए यह जरूरी नहीं है कि उत्तराखंड में कांग्रेस आए, मेरे राजनीतिक अस्तित्व के लिए यह जरूरी है कि केंद्र में कांग्रेस आए। जो यह कहते हैं कि मैं मुख्यमंत्री बनना चाहता हूं, सही नहीं है। मैं कांग्रेस को बहुत अच्छी तरह से जानता हूं। पार्टी का अपना विचार रहता है।
  • कोरोना संक्रमण के बीच आप दिल्ली से दून चले आए। यह वह दौर था जब दिल्ली में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की मांग उठ रही थी। ठीक ऐसे वक्त पर दिल्ली से दूरी बना लेने की वजह?
    - संकटकाल में मुझे एक जगह से दूसरी जगह जाना था। दिल्ली में मेरी जरूरत नहीं थी। या तो उत्तराखंड आता या फिर असम जाता। असम में हालात यह बना दिए गए थे कि वहां की सरकार मुझे आने नहीं देना चाहती थी। मेरे लिए यह जरूरी था कि मैं या तो कर्मक्षेत्र में दिखाई देता या धर्मक्षेत्र में। मैने धर्मक्षेत्र को चुना। कोई अब यह नहीं कह सकता कि मैंने संकटकाल में उत्तराखंड का साथ नहीं दिया।

     
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