विधानसभा चुनावों में प्रदेश से जुड़े परंपरागत मुद्दे हों या फिर परिस्थितिजन्य मुद्दे। हर चुनाव में सत्ताधारी पार्टियों की हार के तौर पर ये मुद्दे प्रभावी तो हुए, लेकिन इनसे जुड़ी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया। 2002 के चुनाव से लेकर 2021 तक के चुनाव में कई मुद्दे ऐसे हैं जो जस के तस बरकरार हैं। सियासी पंडितों का मानना है कि इनके समाधान के लिए प्रबल इच्छाशक्ति का होना जरूरी है।
उत्तराखंड सत्ता संग्राम: 2002 के चुनाव से आज तक इन मुद्दों ने पलटी कई सरकार, लेकिन सवाल फिर भी बरकरार
2002 के चुनाव से लेकर 2021 तक के चुनाव में कई मुद्दे ऐसे हैं जो जस के तस बरकरार हैं। सियासी पंडितों का मानना है कि इनके समाधान के लिए प्रबल इच्छाशक्ति का होना जरूरी है।
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2012 विधानसभा चुनाव: भाजपा के तीन मुख्यमंत्री, घोटाले फिर पड़े भारी
सत्ता से पांच साल दूर रहने वाली कांग्रेस ने 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के कार्यकाल और घोटालों को मुद्दा बनाया। भाजपा ने 2007 से 2012 के बीच तीन मुख्यमंत्री बनाए। पहले मेजर जनरल बीसी खंडूरी (रिटायर्ड) ने 839 दिन सत्ता संभाली। इसके बाद डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने 808 दिन सरकार चलाई। केंद्रीय नेतृत्व ने चुनाव के समय दोबारा मेजर जनरल बीसी खंडूरी को सत्ता सौंप दी, जिन्होंने 185 दिन सरकार चलाई। लिहाजा, कांग्रेस ने भाजपा में हुए कथित महाकुंभ और स्टर्डिया घोटाले, पन बिजली परियोजनाओं के आवंटन और दवा घोटालों को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा। सत्ता में कांग्रेस की वापसी हुई लेकिन इन घोटालों पर कार्रवाई के नाम पर केवल बजट ठिकाने लगा। कोई नतीजा नहीं निकल पाया।
2017 विधानसभा चुनाव : हरीश रावत स्टिंग और आपदा ने दिए भाजपा को मुद्दे
2017 का विधानसभा चुनाव आया तो भाजपा के हाथ चुनाव से ऐन पहले सबसे बड़ा मुद्दा हरीश रावत के स्टिंग का आ गया। भाजपा ने इसे भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए जनता के बीच आवाज उठाई। जनता ने समर्थन दिया। इस बार दागी-बागी के खेल में कांग्रेस पिछड़ गई। बड़ी संख्या में कांग्रेस के विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा ने सत्ता में दमदार वापसी की। यह बात अलग है कि स्टिंग प्रकरण अभी हाईकोर्ट में लंबित है। जिस आपदा राहत को विजय बहुगुणा के कार्यकाल में भाजपा ने मुद्दा बनाया था, वह 2017 के चुनाव से ठीक पहले विजय बहुगुणा के भाजपा में शामिल होने के साथ ही गायब सा हो गया। किरकिरी के बीच कांग्रेस के हाथ से सत्ता चली गई और त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री की कुर्सी दी गई।
2021 विधानसभा चुनाव : इस बार कई परंपरागत मुद्दे भी हुए जिंदा
चूंकि 2017 से 2021 के बीच प्रदेश में जुड़े कई परंपरागत मुद्दों पर भी काम हुआ। त्रिवेंद्र सरकार में पलायन पर काबू पाने के लिए पलायन आयोग का गठन किया गया। गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाई गई। बेरोजगारी को लेकर भी भाजपा सरकार ने तमाम दावे किए हैं। लिहाजा, इस बार के चुनाव में यह मुद्दे उभरकर सामने आ रहे हैं। कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, गैरसैंण राजधानी के साथ ही नए जिलों का गठन आदि मुद्दों पर आवाज उठा रही हैं।
उत्तराखंड गठन से लेकर आज तक अनसुलझे मुद्दे
लोकायुक्त: भाजपा ने 2017 चुनाव में 100 दिन के भीतर मजबूत लोकायुक्त देने का वादा किया था। त्रिवेंद्र सरकार इसके लिए बिल भी लाई लेकिन आज तक यह आगे नहीं बढ़ पाया।
पलायन: पलायन आयोग का गठन तो हुआ, लेकिन आज तक कोई प्रभावी असर नजर नहीं आया।
बेरोजगारी: सरकार हर बार दावा तो करती आई, लेकिन बेरोजगारी आज भी चरम पर है।
शिक्षा: पहाड़ में गुणवत्तायुक्त शिक्षा का मुद्दा उत्तराखंड गठन से लेकर आज तक जारी है।
स्वास्थ्य: पहाड़ में डॉक्टरों की कमी, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव जारी है।
गैरसैंण: ग्रीष्मकालीन राजधानी तो बनी, लेकिन स्थायी राजधानी की मांग बरकरार है।