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उत्तराखंड सत्ता संग्राम: 2002 के चुनाव से आज तक इन मुद्दों ने पलटी कई सरकार, लेकिन सवाल फिर भी बरकरार 

Wed, 24 Nov 2021 11:59 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal आफताब अजमत, अमर उजाला, देहरादून
आफताब अजमत, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Wed, 24 Nov 2021 11:59 AM IST
सार

2002 के चुनाव से लेकर 2021 तक के चुनाव में कई मुद्दे ऐसे हैं जो जस के तस बरकरार हैं। सियासी पंडितों का मानना है कि इनके समाधान के लिए प्रबल इच्छाशक्ति का होना जरूरी है।

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uttarakhand election 2022: From 2002 elections till today, these issues have overturned the government
पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी, बीसी खंडूरी, रमेश पोखरियाल निशंक - फोटो : फाइल फोटो

विधानसभा चुनावों में प्रदेश से जुड़े परंपरागत मुद्दे हों या फिर परिस्थितिजन्य मुद्दे। हर चुनाव में सत्ताधारी पार्टियों की हार के तौर पर ये मुद्दे प्रभावी तो हुए, लेकिन इनसे जुड़ी समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया। 2002 के चुनाव से लेकर 2021 तक के चुनाव में कई मुद्दे ऐसे हैं जो जस के तस बरकरार हैं। सियासी पंडितों का मानना है कि इनके समाधान के लिए प्रबल इच्छाशक्ति का होना जरूरी है।



पहली निर्वाचित सरकार के लिए वर्ष 2002 में उत्तराखंड विधानसभा के चुनाव हुए। उस वक्त सबसे बड़ा मुद्दा अंतरिम सरकार के घोटाले थे। इन मुद्दों के दम पर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस सत्ता में आ गई। यह बात अलग है कि इन मुद्दों को लेकर बाद में कांग्रेस ने खामोशी अख्तियार कर ली। एनडी तिवारी मुख्यमंत्री बने और पूरे पांच साल सरकार चलाई। उनकी इस सरकार ने ही 2007 के चुनावी मुद्दों को जन्म दिया।

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वर्ष 2007 में विधानसभा के चुनाव हुए। चुनाव से जनता के मुद्दे गायब थे। एनडी तिवारी सरकार में करीब 300 नेताओं को लालबत्ती बांटने के मामले को भाजपा ने इस चुनाव में बड़ा मुद्दा बनाया। भाजपा ने कांग्रेस राज के 56 घोटालों का मुद्दा भी बनाया। यह बात अलग है कि इन मुद्दों पर कांग्रेस से सत्ता छीनने वाली भाजपा सत्ता में आने के बाद 56 घोटालों को भी भूल गई। आयोग बनाया लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। लालबत्तियों के मामले में जरूर सरकार दबाव में रही। भाजपा ने मेजर जनरल (रिटायर्ड) बीसी खंडूरी को प्रदेश की कमान सौंपी।

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बीसी खंडूड़ी - फोटो : फाइल फोटो

2012 विधानसभा चुनाव: भाजपा के तीन मुख्यमंत्री, घोटाले फिर पड़े भारी
सत्ता से पांच साल दूर रहने वाली कांग्रेस ने 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के कार्यकाल और घोटालों को मुद्दा बनाया। भाजपा ने 2007 से 2012 के बीच तीन मुख्यमंत्री बनाए। पहले मेजर जनरल बीसी खंडूरी (रिटायर्ड) ने 839 दिन सत्ता संभाली। इसके बाद डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने 808 दिन सरकार चलाई। केंद्रीय नेतृत्व ने चुनाव के समय दोबारा मेजर जनरल बीसी खंडूरी को सत्ता सौंप दी, जिन्होंने 185 दिन सरकार चलाई। लिहाजा, कांग्रेस ने भाजपा में हुए कथित महाकुंभ और स्टर्डिया घोटाले, पन बिजली परियोजनाओं के आवंटन और दवा घोटालों को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा। सत्ता में कांग्रेस की वापसी हुई लेकिन इन घोटालों पर कार्रवाई के नाम पर केवल बजट ठिकाने लगा। कोई नतीजा नहीं निकल पाया।

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पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत - फोटो : फाइल फोटो

2017 विधानसभा चुनाव : हरीश रावत स्टिंग और आपदा ने दिए भाजपा को मुद्दे
2017 का विधानसभा चुनाव आया तो भाजपा के हाथ चुनाव से ऐन पहले सबसे बड़ा मुद्दा हरीश रावत के स्टिंग का आ गया। भाजपा ने इसे भ्रष्टाचार से जोड़ते हुए जनता के बीच आवाज उठाई। जनता ने समर्थन दिया। इस बार दागी-बागी के खेल में कांग्रेस पिछड़ गई। बड़ी संख्या में कांग्रेस के विधायकों ने भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा ने सत्ता में दमदार वापसी की। यह बात अलग है कि स्टिंग प्रकरण अभी हाईकोर्ट में लंबित है। जिस आपदा राहत को विजय बहुगुणा के कार्यकाल में भाजपा ने मुद्दा बनाया था, वह 2017 के चुनाव से ठीक पहले विजय बहुगुणा के भाजपा में शामिल होने के साथ ही गायब सा हो गया। किरकिरी के बीच कांग्रेस के हाथ से सत्ता चली गई और त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री की कुर्सी दी गई।

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त्रिवेंद्र सिंह रावत - फोटो : फाइल फोटो

2021 विधानसभा चुनाव : इस बार कई परंपरागत मुद्दे भी हुए जिंदा
चूंकि 2017 से 2021 के बीच प्रदेश में जुड़े कई परंपरागत मुद्दों पर भी काम हुआ। त्रिवेंद्र सरकार में पलायन पर काबू पाने के लिए पलायन आयोग का गठन किया गया। गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाई गई। बेरोजगारी को लेकर भी भाजपा सरकार ने तमाम दावे किए हैं। लिहाजा, इस बार के चुनाव में यह मुद्दे उभरकर सामने आ रहे हैं। कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, गैरसैंण राजधानी के साथ ही नए जिलों का गठन आदि मुद्दों पर आवाज उठा रही हैं। 

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ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण - फोटो : फाइल फोटो

उत्तराखंड गठन से लेकर आज तक अनसुलझे मुद्दे
लोकायुक्त: भाजपा ने 2017 चुनाव में 100 दिन के भीतर मजबूत लोकायुक्त देने का वादा किया था। त्रिवेंद्र सरकार इसके लिए बिल भी लाई लेकिन आज तक यह आगे नहीं बढ़ पाया। 
पलायन: पलायन आयोग का गठन तो हुआ, लेकिन आज तक कोई प्रभावी असर नजर नहीं आया।
बेरोजगारी: सरकार हर बार दावा तो करती आई, लेकिन बेरोजगारी आज भी चरम पर है।
शिक्षा: पहाड़ में गुणवत्तायुक्त शिक्षा का मुद्दा उत्तराखंड गठन से लेकर आज तक जारी है।
स्वास्थ्य: पहाड़ में डॉक्टरों की कमी, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव जारी है।
गैरसैंण: ग्रीष्मकालीन राजधानी तो बनी, लेकिन स्थायी राजधानी की मांग बरकरार है।

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