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Uttarakhand Election 2022: असल मुद्दों पर हावी होता चुनावी सियासत का पीपीपी मॉडल, कोई जाति की तो कोई धर्म की सियासत को बना रहा हथियार

Fri, 04 Feb 2022 11:59 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून
राकेश खंडूड़ी, अमर उजाला, देहरादून Published by: Nirmala Suyal Nirmala Suyal Updated Fri, 04 Feb 2022 11:59 AM IST
सार

एक-दूसरे के खिलाफ प्रोपेगेंडा, वोटों के पोलराइजेशन के लिए धार्मिक और जाति आधारित मुद्दों को हवा दी जा रही है और इससे भी बड़ी बात की सस्ती लोकप्रियता के लिए जनता से ऐसे वादों का बहु प्रचार (पोपुलाइजेशन) किया जा रहा है, जिसे मतदाता को भ्रमित करने की कोशिश की तौर पर देखा जाना चाहिए।

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Uttarakhand Election 2022: election season politics of polarization, propaganda and multi-campaign dominated
हरीश रावत और पुष्कर सिंह धामी - फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो

विस्तार

 उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के मुद्दों पर सियासत का पीपीपी मॉडल हावी है। विकास से जुड़े पीपीपी मॉडल को लोग पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तौर जानते हैं। लेकिन सियासत का पीपीपी मॉडल झूठा प्रचार (प्रोपेगेंडा), ध्रुवीकरण (पोलराइजेशन) और बहुप्रचार (पापुलराइजेशन) के रूप में जाना जा रहा है।

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इसके सामने प्रदेश के जनसरोकारों से जुड़े मुद्दे फीके और गौंण है और वोटों को प्रभावित करने के लिए कतिपय सियासी दल इस पीपीपी मॉडल के तरीके को अपना रहा है, जो उन्हें छोटा और ज्यादा मारक प्रतीत हो रहा है। इसकी ताजा बानगी तीन ऐसे बयानों से जुड़ी है, जिसे सियासी दलों ने तूल देने की कोशिश की। इनमें ताजा मामला मुस्लिम विवि को लेकर दिए गए एक बयान का है, जिसे लेकर भाजपा ने कांग्रेस पर हमला बोला।
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अचानक पार्टी उस सरकारी आदेश को भी सामने ले आई, जिसमें समुदाय विशेष के लोगों के लिए जुमे के दिन अल्प अवकाश की सुविधा थी। इस आदेश के बहाने भाजपा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत पर धावा बोल दिया है। सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरों को बदल कर वायरल किया जा रहा है। सियासी जानकारों की निगाह में ये हरीश रावत को टारगेट करने के साथ ही वोटों के ध्रुवीकरण का भी प्रयास है।
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 सच्चाई जो भी हो, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बयान भी ध्रुवीकरण की सियासत से अछूते नहीं रहे। पिछले दिनों उनका बयान आया कि कांग्रेस की सरकार बनने पर ब्राह्मण आयोग बनाया जाएगा। पूर्व सीएम की भावना एक जाति वर्ग के लिए कितनी ही तटस्थ क्यों न हो, लेकिन उनके इस बयान जात-पात की सियासत के तौर पर देखा गया।

जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक, चुनाव में धर्म और जाति की राजनीति हो रही हावी

सियासी जानकारों का मानना है कि ऐसा करके सियासी दल और उनके नेता चुनाव में वोटों को ध्रुवीकृत करने का प्रयास करते हैं।  जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, चुनाव में धर्म और जाति की राजनीति हावी हो रही है। सियासी दलों पर क्षेत्रवाद और जातिवाद की सियासत का इस कदर दबाव है कि उन्हें अपना नेतृत्व चुनते समय भी इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि कुमाऊं से यदि मुख्यमंत्री हैं या गढ़वाल से प्रदेश अध्यक्ष होना चाहिए।

नेता प्रतिपक्ष यदि क्षत्रीय या जनजातीय वर्ग से हैं तो प्रदेश अध्यक्ष ब्राह्मण होना चाहिए। भाजपा और कांग्रेस इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। टिकट बंटवारे तक में राजनीतिक दलों का यह जातिवादी सियासत का चेहरा दिखाई दिया। भाजपा ने पौड़ी जिले में जब एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया तो कोटद्वार से उसे ब्राह्मण चेहरे विधायक रितु खंडूड़ी को मैदान में उतारना पड़ा। जबकि प्रत्याशियों की पहली सूची विधायक रितु खंडूड़ी का टिकट काट दिया गया था।

कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों में कई काबिल दावेदार इसलिए टिकट की दौड़ में बाहर हो गए क्योंकि वे वोटों के जातीय समीकरण में फिट नहीं बैठ रहे थे। सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज फाउंडेशन के संस्थापक अनूप नौटियाल कहते हैं, सियासत के पीपीपी मॉडल के आगे चुनावी मुद्दे नेपथ्य में चले गए हैं।

एक-दूसरे के खिलाफ प्रोपेगेंडा, वोटों के पोलराइजेशन के लिए धार्मिक और जाति आधारित मुद्दों को हवा दी जा रही है और इससे भी बड़ी बात की सस्ती लोकप्रियता के लिए जनता से ऐसे वादों का बहु प्रचार (पोपुलाइजेशन) किया जा रहा है, जिसे मतदाता को भ्रमित करने की कोशिश की तौर पर देखा जाना चाहिए।

घोषणापत्रों से क्यों नहीं होती प्रचार की शुरुआत
एसडीएफ के संस्थापक अनूप नौटियाल प्रश्न उठाते हैं कि चुनाव प्रचार के आगाज के समय ही राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र लेकर क्यों नहीं आते। मतदाताओं को इतना वक्त मिलना चाहिए कि वे घोषणापत्रों में किए गए वादों की परख कर सके। ऐसी गंभीरता सियासी दलों की ओर से नहीं दिखाई दे रही है।

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