Uttarakhand Election 2022: फौजी मतदाता, भाजपा-कांग्रेस को लुभाता, लेकिन चुनाव में टिकट हाथ नहीं आता
बीते विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो कुछेक फौजी अफसर ही आज भी सूबे की सियासत में इन मतदाताओं के चेहरे बने हुए हैं।
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जिस राज्य में हर घर में फौजी की परंपरा हो। जहां के करीब 12 फीसदी मतदाता सैन्य बहुल यानी सैन्य परिवारों से हों। जो मतदाता प्रदेश के राजनीतिक दलों के लिए चुनाव के समय सर्वोपरि हों। चुनाव में टिकट देने के मामले में फिसड्डी ही नजर आते हैं। बीते विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो कुछेक फौजी अफसर ही आज भी सूबे की सियासत में इन मतदाताओं के चेहरे बने हुए हैं। कमोबेश यही हाल नौकरशाहों का है।
पूर्व सैनिकों को सूबे की सियासत में भाजपा, कांग्रेस व अन्य सभी दल अलग अहमियत देते हैं। उनसे जुड़े मुद्दे हर चुनाव में चर्चाओं में होते हैं। टिकट बंटवारे को छोड़ दें तो अफसरों, सैनिकों, पूर्व सैनिकों और उनके परिवार सभी राजनीतिक दलों के लिए वोटबैंक बनकर ही रह गए हैं। पिछले चुनाव में सैनिकों के नाम पर केवल एक गणेश जोशी को छोड़कर कोई भी फौजी अफसर मैदान में भाजपा-कांग्रेस से हाथ नहीं आजमां पाया।
इस बार के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कर्नल(सेवानिवृत्त) अजय कोठियाल को सीएम उम्मीदवार बनाकर इस तिशनगी को हवा देने की कोशिश की है। भाजपा-कांग्रेस भी फौजी मतदाताओं को लुभाने के लिए जी-जान से जुटने लगे हैं। अब आने वाला वक्त बताएगा कि कौन सा दल किस सैन्य पृष्ठभूमि के नेता को सदन तक पहुंचाने की कोशिश करेगा।
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इन फौजी अफसरों-सैनिकों को मिला मौका तो मार दिया चौका
उत्तराखंड की सियासत में जिन फौजी अफसरों या सैन्य पृष्ठभूमि के नेताओं को मुख्य धारा की राजनीति में आने का मौका मिला, उन्होंने चौका मारा है। ज्यादातर कामयाब चेहरे साबित हुए। इनमें सबसे पहला नाम मेजर जनरल(सेवानिवृत्त) बीसी खंडूरी का आता है। सूबे के मुख्यमंत्री के अलावा सांसद बनकर केंद्र में मंत्री रहने तक मिसाल कायम की है।
दूसरा नाम ले.जन(सेवानिवृत्त) टीपीएस रावत का आता है। कांग्रेस से दो बार विधायक चुनने के साथ ही वह प्रदेश में कैबिनेट मंत्री भी रहे। इसके अलावा गढ़वाल सांसद भी रहे। तीसरा नाम गणेश जोशी का आता है जो कि सेना में सेवारत रहे हैं। वर्तमान में वह सरकार में सैनिक कल्याण मंत्री हैं।
12 फीसदी हैं सैन्य परिवारों के मतदाता
प्रदेश के कुल मतदाताओं में की बात करें तो यहां करीब 12 फीसदी मतदाता सैन्य परिवारों से आते हैं। प्रदेश में सैनिक ओर पूर्व सैनिकों की संख्या करीब दो लाख 67 हजार है। उत्तराखंड के कुल मतदाताओं का लगभग 3.30 प्रतिशत सैनिक मतदाता है, लेकिन अगर सैनिक वोटरों के साथ यदि इनके स्वजन एवं नाते-रिश्तेदारों को शामिल कर दिया जाए तो यह मत प्रतिशत बढ़कर लगभग 12 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।
सैन्य मतदाताओं को लुभाने को हर कसरत
राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र पर एक नजर डालें तो दलों के चुनावी घोषणा पत्र में सैनिकों के कल्याण की अनेकों योजनाएं शामिल रहती हैं। यहां तक कि सैन्य पृष्ठभूमि के वोटरों को लुभाने के लिए हर बड़े दलों में पूर्व सैनिक प्रकोष्ठ गठित है। भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों में तो बड़े-बड़े पूर्व सैन्य अधिकारी पार्टी अथवा सरकार में अहम पदों को सुशोभित रहे हैं। भाजपा व कांग्रेस इस समय बूथ स्तर पर सैनिकों को रिझाने के लिए बड़े कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। भाजपा ने जहां शहीद सम्मान यात्रा का आयोजन किया है तो कांग्रेस ने भी सैनिक सम्मान सम्मेलन आयोजित किए।
नौकरशाह भी इसी अनदेखी के सिलसिले का शिकार
न केवल सैन्य अफसर, सैनिक बल्कि राजनीति के मामले में कमोबेश नौकरशाहों के भी ऐसे ही हाल रहे हैं। वह रिटायर होने के बाद भाजपा-कांग्रेस या अन्य दलों के साथ जुड़ते हैं। चुनाव आते हैं तो टिकट के लिए तसरकर आखिरकार पार्टी से विदा हो जाते हैं। ताजा मामला पूर्व राज्य चुनाव आयुक्त सुवर्धन शाह का है, जिन्होंने दो साल पहले आम आदमी पार्टी ज्वाइन की और चुनाव से ठीक पहले आप का दाम छोड़ दिया। इसी प्रकार, पूर्व प्रमुख वन संरक्षक आरबीएस रावत ने रिटायरमेंट के बाद पहले कांग्रेस ज्वाइन की। वह हरीश रावत की सरकार में अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के अध्यक्ष भी बने।
भर्ती विवाद के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद भाजपा का दामन थामा तो तीरथ सरकार में उन्हें मुख्यमंत्री का प्रमुख सलाहकार बनाया गया था। वह आरएसएस के करीबी माने जाते रहे हैं लेकिन मुख्यधारा की राजनीति में कोई कमाल नहीं कर पाए। ताजा प्रकरण पूर्व आईपीएस अफसर अनंतराम चौहान का भी है, जिन्हें आप ने गढ़वाल मंडल का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया। कुछ महीनों बाद ही उन्होंने आप छोड़ दी। अब उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा है।
हालांकि बदरीनाथ के पूर्व विधायक और यूपी में मंत्री रहे केदार सिंह फोनिया कामयाब चेहरों में सबसे ऊपर आते हैं। पर्यटन विभाग के निदेशक पद के अलावा जीएमवीएन के जीएम और भारतीय वाणिज्य निगम में जनरल मैनेजर के पद पर रहे केदार सिंह फोनिया ने 1991 में भाजपा से अपनी राजनीति की शुरुआत की थी। वह 1993, 96 में लगातार विधानसभा का चुनाव जीते। यूपी में पर्यटन मंत्री भी बने। 2007 में फिर विधायक चुने गए और 2012 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में हार गए।