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Uttarakhand Landslides: बारिश से कमजोर हुईं पहाड़ की भू-आकृतियां... शुरू हुए भूधंसाव; इन जिलों में बढ़ी चिंता

Sun, 07 Sep 2025 11:22 AM IST
शाहरुख खान आफताब अजमत, अमर उजाला, देहरादून
आफताब अजमत, अमर उजाला, देहरादून Published by: शाहरुख खान Updated Sun, 07 Sep 2025 11:22 AM IST
सार

उत्तराखंड में जोशीमठ के बाद अब चमोली, गोपेश्वर, टिहरी, घनसाली, रुद्रप्रयाग में भूधंसाव ने चिंता बढ़ा दी है। भूगर्भ विज्ञानियों के मुताबिक, पहाड़ की जड़ों तक पानी अपने साथ मिट्टी ले जा रहा है। बारिश से पहाड़ की भू-आकृतियां कमजोर हो गई हैं। 

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Uttarakhand Dehradun Landslides Triggered as Hills Weaken Due to Heavy Rainfall in Uttarakhand News in Hindi
उत्तरकाशी में भूस्खलन - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

प्रदेश में इस साल भारी बारिश से पहाड़ की भू-आकृतियां कमजोर हो गई हैं। इस कारण चमोली के नंदानगर से लेकर टिहरी, रुद्रप्रयाग समेत कई शहरों, कस्बों, गांवों में भूधंसाव ने चिंता बढ़ा दी है। भूगर्भ विज्ञानियों के मुताबिक, इसके नुकसान से बचाव के लिए वैज्ञानिक पैमानों के आधार पर विकास की गतिविधियां लागू करनी होंगी।
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गोपेश्वर और टिहरी में भू-धंसाव और भूस्खलन से खतरा बढ़ गया है। गोपेश्वर में क्यूंजा घाटी के किणझाणी गांव के निचले क्षेत्र में खेतों में दरारें पड़ गईं हैं। घनसाली के भिलंगना ब्लॉक के घुत्तू क्षेत्र में मैडू ग्राम पंचायत के कनियाज और भाटगांव नामेतोक में जमीन धंसने से कई मकानों में दरारें आ गईं हैं। 
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गढ़वाल विवि के क्षेत्र में भी भू-धंसाव शुरू हो गया है। चमोली, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, टिहरी और पौड़ी गढ़वाल के कई गांवों में भू-धंसाव से घरों में बड़ी दरारें पड़ गई हैं।
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र्वतीय क्षेत्रों में तीन तरह की भू-आकृतियां
गढ़वाल विवि भूगर्भ विज्ञान विभाग के प्रोफेसर वाईपी सुंद्रियाल का कहना है कि पर्वतीय क्षेत्रों में तीन तरह की भू-आकृतियां (लैंडफॉर्म) हैं। एक तो नदी-नाले के मलबे पर बनी हुईं। दूसरी ग्लेशियर के कारण आई आपदा के मलबे और तीसरी गुरुत्वाकर्षण (यानी गुरुत्वाकर्षण के कारण होने वाली भूस्खलन जैसी प्रक्रियाएं) के कारण बनी हुईं। 

 

भू-धंसाव को भारी बारिश की वजह से ही बढ़ावा मिला
पुराने समय में इन्हें सपाट करके निर्माण किए गए। यहां मलबे के नीचे पत्थरों के साथ ही मिट्टी है जो कि बारिश के पानी के साथ नीचे जा रही है। इस कारण भू-धंसाव बढ़ता जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भू-धंसाव को भारी बारिश की वजह से ही बढ़ावा मिला है।

भूगर्भ विज्ञानियों का कहना है कि प्रदेश में 4000 मीटर से ऊपर वाले क्षेत्रों का तापमान 0.3 डिग्री प्रति दशक बढ़ रहा है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।

 

डीबीएस कॉलेज के पूर्व प्राचार्य व भूगर्भ विज्ञानी डॉ. एके बियानी का कहना है कि नदियों का रुख मुड रहा है, जिससे नीचे कटाव होकर भू-धंसाव को बढ़ावा मिल रहा है। वहीं, निर्माणाधीन भवनों के पास से पानी जमीन के भीतर जा रहा है, जो नीचे कटाव कर रहा है। मिट्टी भारी होकर गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे खिसक रही है, जो भूधसांव का कारण बन रहा है। वैज्ञानिक तरीके से विकास की गतिविधियां होने पर ही इससे बचाव संभव है।

तीन तरफ की हवाएं वेस्टर्न हिमालय पर बना रही कम दबाव का क्षेत्र
अभी तक मानसून सीजन में दक्षिण-पश्चिम मानसून की हवाएं हिंद महासागर से आती थीं। ये हवाएं भूमि और समुद्र के तापमान में अंतर के कारण उत्पन्न होती हैं, जिससे नमी से भरी हवाएं भारत की ओर आती हैं। मानसून शुरू होता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अब वेस्टर्न हिमालय से आने वाली ठंडी हवाएं भी मानसून सीजन में आ रही हैं। 

 

ये पहले सर्दियों में हिमालयी क्षेत्रों में बारिश और बर्फ लाते थे। अब मानसून के मौसम में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, जो कि एक चिंताजनक बदलाव है। यह दिखाता है कि पश्चिमी विक्षोभ की प्रकृति बदल रही है और यह गर्म होते मौसम में भी सक्रिय हो रहा है। जिससे गर्मी के दौरान बादल फटने जैसी आपदाएं और बाढ़ आ रही है।

वहीं, बंगाल की खाड़ी से भी साउथ ईस्ट हवाएं आ रही हैं। इन तीनों हवाओं के मिलने से वेस्टर्न हिमालय(उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, लद्दाख और हिमालय) पर कम दबाव वाले क्षेत्र बन रहे हैं। जो भारी आपदाओं का कारक हैं।
 
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