उत्तराखंड कुटीर उद्योगः युवाओं को गांवों की दहलीज लांघने से रोक सकता है मशरूम
- मशरूम को सोना बनाने के लिए अभी काफी काम होना बाकी
- हिमाचल ने 1961 में ही बढ़ा दिया था इस ओर कदम
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मांग भी है और बाजार भी। बस जरूरत है बाजार तक मशरूम को पहुंचाने की, उत्पादकों को सही प्रशिक्षण और तकनीक उपलब्ध कराने की। इतना भर हो जाए तो प्रदेश में किसानों के लिए मशरूम सोना भी बन जाए। मशरूम गर्ल के नाम से पहचान बनाने वाली डोईवाला की ज्योति रावत ने यह साबित भी किया है।
अपने साथ एक हजार से अधिक उत्पादकों को जोड़कर और 15 से अधिक केंद्र स्थापित कर दो करोड़ से अधिक का कारोबार इस समय ज्योति कर रही हैं। ज्योति को प्रदेश सरकार ने सराहा भी है लेकिन हर जिले में कम से कम एक और ज्योति नाम कमाएं, इसकी परवाह कम ही की। 2000 में जन्म लेेने के 19 साल बाद भी उत्तराखंड मशरूम के एक बड़ा संस्थान स्थापित नहीं हो पाया। बात-बात पर हिमाचल से तुलना करने वाली सरकार को यह भी ध्यान नहीं रहा कि हिमाचल ने 1961 में मशरूम पर काम करना शुरू कर दिया था।
पिछले कुछ समय में प्रदेश में मशरूम की खेती करने वालों की संख्या बढ़ी है। इतना होने पर भी मशरूम प्रदेश में सोना नहीं बन पा रहा है। यह तब है जबकि प्रदेश में घर-घर मशरूम का उत्पादन हो सकता है। लोगों की जेब के मुफीद हो और उन्हें इसकी पौष्टिकता की जानकारी सही तरीके से मिल जाए तो मशरूम में इतनी ताकत तो दिखती ही है कि वह युवाओं को गांव की देहरी लांघने से रोक सके।
प्रदेश में मशरूम की 15 प्रजातियां तो जंगलों में ही उगती हैं। इनमें से आठ प्रजातियां तो ऐसी हैं जो खाने योग्य हैं और लोग इनको खाते भी हैं। प्राकृतिक रूप से होने वाले इस मशरूम को घरों में उगाने के लिए युवाओं को न तो किसी वातानुकूलन की जरूरत है और न ही महंगे उपकरणों की।
विशेषज्ञों के मुताबिक मशरूम की एक फैक्ट्री को स्थापित करने के लए पांच करोड़ की जरूरत होती है। लेकिन यह व्यवसाय 50 हजार से भी शुरू किया जा सकता है। उद्यान विभाग के साथ ही प्रदेश में पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय और वन अनुसंधान संस्थान में भी मशरूम उत्पादन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यह साफ है कि इसमें भी अभी काम करने की जरूरत है। मशरूम गर्ल ज्योति रावत को एक खास तरह के मशरूम के उत्पादन का प्रशिक्षण लेने के लिए विदेश तक जाना पड़ा था।
एक्सीलेंस सेंटर बनेगा
मशरूम के एक बड़े प्रशिक्षण केंद्र का विचार बेहतर है और इस पर काम किया जाएगा। प्रदेश सरकार मशरूम का सेंटर ऑफ एक्सीलेंस बना रही है और इसमें शोध, प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था भी की जाएगी।
- सुबोध उनियाल, कृषि एवं उद्यान मंत्री
जंगली मशरूम की 15 प्रजातियां हैं उत्तराखंड में
में जंगलों में उगने वाले मशरूम की करीब 15 प्रजातियां चिह्नित की गई है। वन अनुसंधान केंद्र को अब चकराता में देवबंद और कुमाऊं में मुन्स्यारी में मशरूम पर शोध करने की अनुमति भी मिल गई है। जंगल में पैदा होने वाली गुच्छी मशरूम की कीमत तो करीब 30 हजार रुपये किलो है। इस पर अब शोध किया जा रहा है कि इस मशरूम की क्या खेती भी की जा सकती है। अगर यह प्रयोग सफल रहा तो उत्तराखंड को इससे फायदा होगा। यह मशरूम लोगों की फूड बास्केट में शामिल है और व्यवसायिक उत्पादन होने पर यह उत्पादकों की आय को बढ़ाने का बड़ा जरिया होगा।
- संजीव चतुर्वेदी, वन संरक्षक, वन अनुसंधान केेंद्र, हल्द्वानी
18000 रुपये तक आय में इजाफा संभव
अल्मोड़ा स्थित विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान केंद्र के एक शोध के मुताबिक पर्वतीय क्षेत्रों में मशरूम का उत्पादन किसानों की आय में 18000 रुपये तक का इजाफा कर सकता है और इस क्षेत्र में सात प्रतिशत तक रोजगार देने की क्षमता है। शोध के मुताबिक आय में इजाफा इससे भी अधिक हो सकता है लेकिन मार्केटिंग की सटीक व्यवस्था न होने, मशरूम महंगा होने, स्थानीय मांग में उतार चढ़ाव इसमें आड़े आते हैं।
भारत में 1886 में गया मशरूम पर ध्यान
1887 : कलकत्ता मेडिकल कालेज के डा. बीसी राय ने मशरूम का रासायनिक विश्लेषण किया।
1908 : देश में खाने योग्य मशरूम की खोज सर डेविड राम ने शुरू की
1921 : दो प्रजातियों का उत्पादन किया गया
1939-45 : मद्रास कृषि विभाग ने पैडी मशरूम को उगाने की शुरुआत की
1961 : हिमाचल ने भारतीय कृषि एवं अनुसंधान केंद्र की मदद से मशरूम विकास परियोजना शुरू की। देश में एक खास प्रजाति को उगाने का यह पहला प्रयास
1977 : तत्कालीन केंद्र सरकार ने 1.27 करोड़ की लागत वाली मशरूम विकास परियोजना शुरू की
1982 : नेशनल सेंटर फॉर मशरूम रिसर्च एंड ट्रेनिंग की स्थापना
कीड़ा जड़ी भी एक तरह से मशरूम
वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी के मुताबिक लाखों की कीमत वाली कीड़ा जड़ी भी मशरूम ही है। कुछ देशों में तो इसकी खेती भी हो रही है। प्रदेश में यह वन उपज में शामिल है। हालांकि कुछ स्थानों पर इसका उत्पादन भी किया जा रहा है।