इन मुख्यमंत्रियों को है बस मोदी लहर की आस
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लोकसभा चुनाव दोनों बड़े राष्ट्रीय दलों के साथ ही उत्तराखंड में भाजपा के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों की दिशा व दशा भी तय करेगा।
तीनों धुरंधरों को उनकी इच्छानुसार किस्मत संवारने का मौका दिया है। जीते तो दिल्ली जाएंगे, और हारे तो जल्द कोई दावा भी करने की स्थिति में नहीं रहेंगे।
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तीनों यह भी जानते है कि केंद्र में भाजपा सरकार गठित हुई तो कैबिनेट में एक ही दिग्गज के एडजस्ट होने की उम्मीद रहेगी। हालांकि प्रदेश से पहले भी भाजपा ने दो दो मंत्री एक साथ बनाए हैं, लेकिन इस बार के समीकरण देखने लायक होंगे।
सियासी रण में शानदार कैरियर
सेना की नौकरी के बाद सियासी रण में शानदार कैरियर स्थापित करने के बाद अब पूर्व सीएम बीसी खंडूड़ी एक बार फिर लोकसभा चुनाव में अपनी परंपरागत पौड़ी सीट से मैदान में है।
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सांसद, केंद्रीय राज्यमंत्री, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, मुख्यमंत्री रहने के बाद कोटद्वार से विधानसभा का चुनाव हारना उनके राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी बाधा साबित हुआ।
अस्सी बसंत पार कर चुके रिटायर्ड मेजर जनरल खंडूड़ी अब एक बार फिर लोकसभा जाने की राह पर है। जानकार लोग मानते हैं कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने पर खंडूड़ी को जगह मिलेगी।
लेकिन यदि लोकसभा सीट चूक गए तो यह उनके राजनीतिक कैरियर का आखिरी पड़ाव माना जाएगा। अपनी छवि और सेना की साफ सुथरी पृष्ठ भूमि के चलते उनका भाजपा हाईकमान के साथ बेहतर तालमेल है।
आरएसएस के शिविरों से मुख्यमंत्री की कुर्सी तक
गांव देहात से लेकर आरएसएस के शिविरों में राजनीति का ककहरा सीखकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे भगत सिंह कोश्यारी भी अपने कैरियर के निर्णायक दौर में है।
संगठन और सरकार चलाने का तजुर्बा रखने वाले भगतदा केलिए यह चुनाव काफी अहम है। जीत हासिल हुई तो वह और मजबूत होंगे।
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ग्रासरूट पर कार्यकर्ताओं की तरह ही पार्टी की सेंट्रल लीडरशीप में भी उनकी मजबूत पकड़ है। उनके समर्थक भी मान रहे है कि यदि सरकार बनी तो वह केंद्र में मंत्री होंगे।
मगर, उसके लिए जीतना बहुत जरूरी है। सूबे की सियासत को उलटने पुलटने का दमखम रखने वाले भगतदा के लिए जीतने पर केंद्र में मंत्री बनने के साथ ही भविष्य में मुख्यमंत्री बनने का दावा पेश करने का आधार रहेगा।
लेकिन यदि चूक हुई तो बैकफुट पर आकर राजनीति करने की विवशता बढ़ेगी। और प्रदेश भाजपा में विरोधी गुट उन पर हावी होने की कोशिश भी करेगा।
दिल्ली का रास्ता खुल जाएगा
लगभग पौने दो साल तक मुख्यमंत्री रहे रमेश पोखरियाल निशंक हरिद्वार से चुनाव मैदान में है।
बाबा रामदेव के भरोसे टिकट तो ले लिया, लेकिन जंग प्रदेश के मुख्यमंत्री से ही हो रही है। इस चुनाव में उनके लिए दो लक्ष्य तय है।
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मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाए जाने के बाद यह पहला मौका है कि बड़ी राजनीतिक जंग जीतकर प्रदेश में अपने विरोधियों को चित्त कर अपनी आवास बुलंद कर सकते हैं।
दूसरा उनके लिए दिल्ली का रास्ता खुल जाएगा। सांसद जीतने के बाद वह केंद्र में मंत्री भी नहीं बने तो अगले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री के लिए दावा कर सकेंगे।
लेकिन चुनाव परिणाम उलट रहने पर दिल्ली तो दूर होगी ही, प्रदेश में विरोधी गुट उनका सियासी मुकद्दर लिखने की कोशिश करेगा। यूपी के जमाने से विधायक, मंत्री रहने और उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनना उनकी पृष्ठभूमि को मजबूत करता है।