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Uttarakhand Glacier Burst: ऋषिगंगा पर बनने जा रहे तीन बांधों पर सुप्रीम कोर्ट रोक न लगाता तो भयावह होता तबाही का मंजर

Tue, 09 Feb 2021 03:00 AM IST
अलका त्यागी आफताब अजमत, अमर उजाला, देहरादून
आफताब अजमत, अमर उजाला, देहरादून Published by: अलका त्यागी Updated Tue, 09 Feb 2021 03:00 AM IST
सार

  • सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में ऋषिगंगा-1, ऋषिगंगा-2 और लाटा तपोवन पर लगा दी थी रोक
  • कोर्ट ने क्षेत्र में निर्मित और निर्माणाधीन बांधों से पर्यावरणीय नुकसान के आकलन को बनाई थी समिति
  • समिति की रिपोर्ट पर मंत्रालय ने दिया था सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा
  • सुप्रीम कोर्ट में मामला तो लंबित फिर ऋषिगंगा प्रोजेक्ट पर चलता रहा काम
     

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Uttarakhand Chamoli Glacier burst News: Supreme court Stopped Three Dams on Rishi ganga construction in 2014
इसी जगह पर था ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तराखंड में ऋषिगंगा के प्रोजेक्ट को आपदा ने निगल लिया। अब सवाल उठ रहे हैं कि अगर ऋषिगंगा पर बनने जा रहे तीन अन्य प्रोजेक्ट पर सुप्रीम कोर्ट रोक न लगाता तो आपदा की भयावहता और अधिक हो सकती थी। 

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उत्तराखंड में बांधों से होने वाले नुकसान को लेकर मंथन और विवादों की शुरुआत 2013 की आपदा के बाद हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इसका संज्ञान लिया और एक कमेटी बनाई। इस कमेटी को प्रदेश के इस पूरे क्षेत्र में निर्मित और निर्माणाधीन बांधों से हुए पर्यावरणनीय नुकसान का आकलन करने की जिम्मेदारी दी गई।
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यह भी पढ़ें: Uttarakhand Glacier Burst: ग्लेशियर टूटने से नहीं बल्कि इस वजह से आई आपदा, इसरो के वैज्ञानिकों ने बताई असली वजह
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समिति ने हिमालय के इन ऊपरी क्षेत्रों में आकलन करने के बाद साफ किया कि यह परियोजनाएं ग्लेशियर डिपॉजिट के हॉटस्पॉट यानी पैराग्लेशियर के दायरे में हैं। लिहाजा, सुप्रीम कोर्ट ने मई 2014 में यूजेवीएनएल के ऋषिगंगा-1, ऋषिगंगा-2 और एनटीपीसी के लाटा तपोवन प्रोजेक्ट सहित कुल 24 प्रोजेक्ट पर रोक लगा दी थी। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि आपदा के वक्त अगर यह तीनों प्रोजेक्ट भी ऋषिगंगा पर बने होते तो क्या हालात होते, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। 

मंत्रालय ने स्वीकार तो किया लेकिन फैसला अभी बाकी
समिति की रिपोर्ट के आधार पर केंद्रीय वन, पर्यावरण मंत्रालय ने यह तो स्वीकारा कि इन बांधों से पर्यावरण को नुकसान हुआ है लेकिन अभी तक भी कोई सख्त फैसला नहीं लिया है। उधर, राज्य सरकार ने भी ऋषिगंगा के एक प्रोजेक्ट को लेकर कोई रोक नहीं लगाई। वहीं, तपोवन विष्णुघाट प्रोजेक्ट पर भी काम अंतिम चरण में पहुंच चुका है।

यह उठ रहे सवाल
- ऋषिगंगा में जब आपदा आई तो इसके लिए पहले से कोई अर्ली वार्निंग सिस्टम क्यों नजर नहीं आया? केंद्रीय जल आयोग भी यहां ऐसे सिस्टम का दावा करता है। पहले से अगर मजदूरों को सूचना मिल जाती तो शायद उनकी जान बच जाती।
- पर्यावरण आंकलन समिति के चेताने और सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद भी इन परियोजनाओं पर काम चलता रहा लेकिन किसी ने सुध क्यों नहीं ली?

1991 के बाद बढ़ गया है 0.66 सेंटीग्रेड तापमान

2018 में दवेचा सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज बंगलूरू के वैज्ञानिकों ने एक रिपोर्ट जारी की थी। उन्होंने साफ किया था कि 1991 के बाद से पश्चिमोत्तर हिमालय में औसत तापमान 0.66 डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ गया है जो कि ग्लोबल औसत से काफी अधिक है। उच्च हिमालय भी उसी अवधि में औसतन गर्म हो गया है। चंडीगढ़ में हिमपात और हिमस्खलन अध्ययन प्रतिष्ठान के वैज्ञानिक भी यह निष्कर्ष दे चुके हैं कि पश्चिमोत्तर हिमालय में सर्दियां पिछले 25 वर्षों में गर्म होने लगी हैं यानी ग्लेशियरों पर खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।

स्थानीय लोगों ने किया था प्रोजेक्ट का विरोध
ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट का काम साल 2008 में शुरू हुआ था। उस समय स्थानीय लोगों ने इस प्रोजेक्ट का विरोध किया था। प्रोजेक्ट का निर्माण शुरू होने पर स्थानीय लोगों ने न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया। इलाके के लोगों का कहना था कि प्रोजेक्ट के लिए किए जा रहे विस्फोट क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन और पर्यावरण के लिए घातक है। यह मामला अभी उत्तराखंड हाईकोर्ट में विचाराधीन है। हालांकि, मामला कोर्ट पर पहुंचने के बीच प्रोजेक्ट में विद्युत उत्पादन चल रहा था। 

अब भी अगर हम इसे प्राकृतिक आपदा का रूप बता रहे हैं तो यह घोर दुर्भाग्यपूर्ण है। जितने लोग मरे हैं, नीति निर्धारकों के खिलाफ उनकी हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। सोशल मीडिया के माध्यम से लोग बचाव कर रहे हैं, लेकिन बांधों की सुरक्षा को लेकर कंपनियों या वैज्ञानिकों ने कोई सिस्टम ही विकसित नहीं किया।
- हेमंत ध्यानी, सदस्य, पर्यावरण अध्ययन समिति

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