विशेष राज्य के नाम पर केंद्र ने उत्तराखंड के साथ किया 'छल'
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उत्तराखंड को विशेष राज्य का दर्जा बरकरार तो रहा पर बदली हुई परिस्थितियों में यह आधा-अधूरा रह गया है। विशेष दर्जे का मतलब है कि केंद्रीय योजनाओं में 90 प्रतिशत पैसा केंद्र सरकार का लगे और दस प्रतिशत राज्य का। अब केंद्र ने इस तरह की योजनाओं की संख्या ही आधी कर दी है।
अभी तक सीएसएस (सेंट्रल स्पांसर्ड स्कीम) की कुल संख्या 66 थी, जिसमें से उत्तराखंड में 60 योजनाओं के लिए केंद्र पैसा दे रहा है। राज्य को पिछले तीन सालों में इन योजनाओं के लिए 16707 करोड़ रुपये मिले। इन्हीं योजनाओं के लिए केंद्र 90:10 के अनुपात में बजट दे रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक राज्य का विशेष दर्जा केंद्र पोषित योजनाओं की फंडिंग से निर्धारित होता है, जिसे केंद्र ने बरकरार रखा है। अब इन योजनाओं की संख्या घटाकर 30 कर दी गई है। इसमें 17 कोर योजनाएं हैं और बाकी 13 को अंब्रेला प्रोग्राम के तहत रखा गया है। राज्य के लिए राहत की बात यह है कि प्रदेश को अंब्रेला प्रोग्राम में भी 80:20 की फंडिंग मिलेगी। फिर भी विशेष राज्य का दर्जा मिलने के बाद भी राज्य को नुकसान हो सकता है।
उत्तराखंड के बजट में करीब 50 प्रतिशत हिस्सेदारी केंद्र से मिल रही धनराशि का है। जाहिर है कि सीएसएस में कोई भी छेड़छाड़ राज्य पर भारी पड़ेगी। हालांकि केंद्र का कहना है कि कम होने वाली राशि राज्यों को अवस्थापना विकास के लिए दी जाएगी। वैसे भी इन योजनाओं के पूरे पैसे का उपयोग हिमालयी राज्य नहीं कर पा रहे हैं।
हिमाचल के मुकाबले कम मिला उत्तराखंड को
कुल मिलाकर अब राज्य की निगाह इस बात पर भी है कि सीएसएस के तहत प्रदेश को कुल कितना पैसा मिलता है। इसी से यह भी साबित होगा कि विशेष राज्य का दर्जा मिलने का राज्य को आखिरकार कितना फायदा पहले के मुकाबले हुआ।
हिमाचल में 62 केंद्र पोषित योजनाएं लागू हैं। इसके तहत पिछले तीन सालों में केंद्र से इन योजनाओं में हिमाचल को 5651 करोड़ रुपये मिले। जबकि इसी अवधि में उत्तराखंड को 60 योजनाओं के लिए 6569 करोड़ रुपये मिले। इस हिसाब से उत्तराखंड अपने पड़ोसी हिमालयी राज्य से आगे है।
लेकिन, सीएसएस के साथ दी जाने वाली ब्लॉक ग्रांट की वजह से फर्क पड़ गया। ब्लॉक ग्रांट कम मिलने से उत्तराखंड को 16707 करोड़ रुपये मिले, जबकि हिमाचल को 17935 करोड़। अधिक योजनाओं को लागू करने के बाद भी उत्तराखंड के हिस्से करीब एक हजार करोड़ रुपये कम आए। अब ब्लॉक ग्रांट भी समाप्त कर दी गई है।
राज्य की कमी से केंद्र ने फंडिंग की कम
केंद्र पोषित योजनाओं पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने पाया था कि केंद्र पोषित योजनाओं का पूरा उपयोग राज्य नहीं कर पा रहे हैं। इसी आधार पर केंद्र ने सीएसएस की संख्या आधी की है। पिछले तीन सालों में पूर्वोत्तर और तीन हिमालयी राज्यों को केंद्र ने सीएसएस की अंब्रेला योजनाओं के तहत 24000 करोड़ रुपये दिए। इनमें से सिर्फ 15000 करोड़ रुपये का ही उपयोग हुआ। यह कुल बजट का करीब 60 प्रतिशत है। जबकि अन्य राज्यों ने कुल बजट का करीब 85 प्रतिशत खर्च किया।
जाहिर है कि हिमालयी राज्य कई कारणों से इस बजट का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। प्रदेश सरकार के मुताबिक निर्माण कार्य के लिए मानसून के कारण कम समय मिलता है और फंड वित्तीय वर्ष के अंत में रिलीज किया जा रहा है। इससे राज्य इस फंड का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहे हैं।
हमारी चिंता यही है कि अभी तक हमें मिल रहा केंद्र पोषित योजनाओं का बजट योजनाओं की संख्या कम होने पर और कम न हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो हमारा नुकसान होगा। कारण यह भी है कि 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों तहत केंद्र से मिल रहा पैसा पहले के मुकाबले कम हो गया है। हम 1700 करोड़ का नुकसान उठा रहे हैं।
- हरीश रावत, मुख्यमंत्री