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बीच कैंपिंग सर्वेक्षण रिपोर्ट देगी उत्तराखंड शासन को झटका
ब्यूरो / अमर उजाला, देहरादून
Updated Sun, 14 Feb 2016 10:33 AM IST
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उत्तराखंड में गंगा किनारे बीच कैंपिंग के संबंध में कराई गई सर्वेक्षण रिपोर्ट शासन को झटका दे सकती है। सूत्रों के मुताबिक, जब से बीच कैंपिंग की गाइडलाइन बनी है, इसका पूरी तरह कभी पालन नहीं हुआ है। सर्वे टीमों को भी कई जगह गाइडलाइन का उल्लंघन नजर आया है।
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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश पर गठित कमेटी ने भारतीय वन्य जीव संस्थान से हाल ही में बीच कैंपिंग क्षेत्र का सर्वेक्षण कराया है। संस्थान ने अपनी गोपनीय रिपोर्ट शासन को दे दी है। शासन अब इसे एनजीटी के समक्ष प्रस्तुत करेगा।
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गंगा किनारे बीच कैंपिंग के संबंध में यूपी के समय वर्ष 1998 में गाइडलाइन तैयार की गई थी। शासनादेश में कहा गया था कि कैंपिंग से जंगल और पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे। इसमें शाम को आग जलाने से मनाही थी। दिन में तसले में आग जलाने के निर्देश थे।
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कहा गया था कि लकड़ी जंगल से न ली जाए, बल्कि वन निगम से खरीदी जाए। मई-जून में आग जलाना प्रतिबंधित था। ड्राई टायलेट बनाने के आदेश थे। गंदगी नदी में डालने की मनाही थी। गाइड लाइन में यह भी कहा गया था कि 250 वर्ग किमी क्षेत्र में एक कैंप लगेगा, लेकिन हुआ उलटा लोगों ने गाइडलाइन का उल्लंघन कर नदी किनारे के बजाय जंगल में कैंप लगाए।
इसके साथ ही यहां फ्लश शौचालय भी पाए गए। बीच कैंपिंग कराने वाली कंपनियों ने गाइडलाइन का पालन नहीं किया है। एनजीटी की कमेटी ने भारतीय वन्य जीव संस्थान को नदी की स्वच्छता, पर्यावरण और धारण क्षमता के संबंध में भी रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था।