उत्तराखंड चुनावी संग्राम 2022: यहां बापू और आडवाणी की चौपाल पर होती है चुनावी चर्चा, रोजाना जुटते हैं लोग
रुड़की से करीब सात किमी दूर स्थित तांशीपुर गांव निवासी दो सगे भाई रजनीश त्यागी और संजय त्यागी की गांव ही नहीं बल्कि आसपास के क्षेत्र में अलग पहचान है।
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चुनावी सरगर्मियों के बीच गांव-गांव में चौपाल सजने लगी है। सुबह से लेकर शाम तक ग्रामीण चुनावी चर्चा में मशगूल रहते हैं। रुड़की क्षेत्र में एक गांव ऐसा भी है, जहां गांधीजी और आडवाणी की एक ही छत के नीचे रोजाना चौपाल लगती है। खास बात ये है कि यहां आडवाणी के साथ-साथ गांधीजी भी भाजपाई हैं। यह सुनने में अटपटा जरूर लगेगा, लेकिन गांधीजी और आडवाणी नाम से मशहूर दो भाइयों के अहाते में लगने वाली चौपाल में रोजाना गांव और आसपास के ग्रामीण बैठक घंटों चुनावी चर्चा कर रहे हैं।
रुड़की से करीब सात किमी दूर स्थित तांशीपुर गांव निवासी दो सगे भाई रजनीश त्यागी और संजय त्यागी की गांव ही नहीं बल्कि आसपास के क्षेत्र में अलग पहचान है। दरअसल, गांव और क्षेत्र के लोग उन्हें अपने नाम से कम बल्कि उपनाम गांधीजी और आडवाणी के नाम से ज्यादा जानते हैं। गांव के लोग रनजीश त्यागी को (आडवाणी जी) और संजय त्यागी को (गांधीजी) कहकर संबोधित करते हैं। इस समय चुनावी दौर में दोनों भाई रोजाना घर के आंगन में चौपाल लगाते हैं।
यहां आडवाणी की तरह गांधी जी कांग्रेसी नहीं बल्कि भाजपाई हैं। उनका कांग्रेस से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। रोजाना दोनों भाई घर के आंगन में ही चौपाल लगाकर राजनीति पर चर्चा करते हैं। अमर उजाला की टीम उनके घर पहुंची तो दोनों भाइयों के साथ गांव के कई लोग चौपाल में शामिल थे। सभी टीवी पर राजनीतिक खबरों को देखने में मशगूल थे। आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर दोनों ने बड़ी बेबाकी से जवाब दिया। कहा कि एक बार कांग्रेस भी अपने पत्ते खोले तो हार-जीत का गणित लगाया जाए।
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उपनाम से मेल खाती है चालढाल और बोलचाल
रजनीश और संजय त्यागी ने बताया कि वे दसवीं पास हैं। उन्हें गांव के लोगों ने ही आडवाणी और गांधीजी नाम दिया है। वहीं, चौपाल पर बैठे ग्रामीण कहते हैं कि गांव और क्षेत्र के लोग दोनों भाई शुरू से ही संघ की विचारधारा से जुड़े हैं। उनकी बातों में गांधी के आदर्श और आडवाणी का हिंदुत्व झलकता है। चालढाल और बोलचाल भी उनके उपनाम से मेल खाती है। इसके चलते बुजुर्ग से लेकर बच्चे तक उन्हें गांधीजी और आडवाणी जी के नाम से बुलाते हैं।
जब बिल्ले और टोपी के लिए दौड़ते थे बच्चे
एक दौर था कि चुनावों में किसी राजनीतिक पार्टी के प्रचार वाहन के आते ही बच्चों की टोलियां गलियों में दौड़ने लगती थीं। कोई जीते कोई हारे उन्हें फर्क नहीं पड़ता था। उन्हें तो बस एक बिल्ला, एक झंडा की दरकार रहती थी। उस वक्त प्रचार का माध्यम बैच और बिल्ले ही होते थे।अब ऐसा नहीं दिखाई देता है। कोरोनाकाल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में तो बिल्कुल भी नहीं।
कोविड और आचार संहिता नियमों के चलते चुनावी प्रचार पूरी तरह मोबाइल व सोशल मीडिया तक सीमित हो गया है। दो दशक पहले जैसे ही चुनावी बिगुल बजता था तो रौनक दिखने लगती थी। नामांकन के बाद चुनाव चिह्न मिलते ही प्रत्याशी चुनाव चिह्न वाले बिल्ले, झंडे और कपड़े की टोपियां प्रिटिग छपवाते थे।
चुनाव प्रचार के लिए जैसे ही समर्थकों की टोली लाउडस्पीकर बजाते हुए गुजरती थी तो चुनाव से अंजान बच्चे बस बिल्ले और टोपी लेने के लिए दौड़ पड़ते थे। बच्चे बिल्लों को अपनी कमीज और टोपियां पहनकर घूमते थे। प्रत्याशी के पक्ष में नारे भी लगाते।चुनाव आयोग की सख्ती, प्रचार-प्रसार के लिए खर्चे तय होने और कोरोनाकाल में अब बिल्ले और टोपियां गायब हो गई हैं। कनखल के पहाड़ी बाजार निवासी सतेंद्र सिंह बताते हैं कि कांग्रेस और जनता पार्टी के दौर में बिल्लों को लेकर बड़ा आकर्षण होता था। चुनाव प्रचार में दादा जाते थे। उनके लाए हुए बिल्लों को पोता सीने पर लगाकर चौड़ा होकर घूमता था।