केंद्रीय बजट 2020 : ‘सीता’ के बजट से ‘हिमालय’ नदारद - पर्यावरणविद् डॉ. अनिल जोशी
- पर्यावरणविद् डॉ. अनिल जोशी निराश, कहा गांव, पहाड़, पर्यावरण का जिक्र नहीं
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केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से पेश आम बजट में हिमालय नदारद है। बजट में गांव, पहाड़, पर्यावरण और प्रकृति का जिक्र न होने से पर्यावरणविद् पद्म भूषण डॉ. अनिल जोशी निराश है। उन्होंने बजट को निराशाजनक बताया। डॉ. जोशी का मानना है कि बजट में यदि गांव, पर्यावरण व प्रकृति और स्थिर आर्थिकी की बात नहीं है तो वह मेरे लिए निराशाजनक है। सबसे पहले बजट में गांव विकास के लिए क्या व्यवस्था की गई है। गांव जो सबसे बड़े उत्पादक है। इस पर देश की आर्थिकी तय होती है।
दूसरा सरकार ने बजट में पर्यावरण और प्रकृति पर कितना ध्यान दिया है। मात्र 100 शहरों में दूषित हवा फैल रही है, इसे प्राथमिकता देना नाकाफी है। देश की मिट्टी जहरीली हो गई। नदियों से पानी गायब हो रहा है। तालाब और पोखर सूख कर खत्म हो रहे हैं। वहीं, जंगलों की स्थिति का जिक्र न किया गया हो। बजट में पर्यावरण को तवज्जो नहीं दिया गया। जबकि देश और दुनिया की स्थिर आथिकी पर्यावरण व प्रकृति पर टिकी है। पर्यावरण संरक्षण की बड़ी कीमत चुका रहे हिमालयी राज्यों के लिए इस बार भी ग्रीन बोनस एक तरह से शिगूफा साबित हुआ है। जिससे मेरे लिए बजट निराशा पूर्ण रहा।
ग्रीन बोनस को लेकर प्रदेश सरकार की पहल पर मसूरी में हिमालयी राज्यों के मुख्यमंत्रियाें की बैठक में भी संकल्प पारित किया था। केंद्र सरकार को भी ग्रीन बोनस देने का प्रस्ताव भेजा गया। लेकिन इस बार भी मोदी सरकार हिमालयी राज्यों को ग्रीन बोनस की सौगात नहीं दे पाई।
बजट में दिखे आर्थिक मंदी से बचने के उपाय : डॉ. जोशी
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट में आर्थिक मंदी से बचने के उपाय किए गए हैं। सरकार का पूरा प्रयास है कि लोगों के हाथों में पैसा जाए ताकि वे ज्यादा से ज्यादा खर्च करें। ये उपाय बाजार में मंदी को तोड़ने में मदद करेगा। सरकार ने बुनियादी ढांचे के विकास के लिए बड़ी धनराशि रखी है। इससे विकास की गति में तेजी आने के साथ आर्थिक प्रगति का रास्ता खुलेगा। केंद्र ने कृषि क्षेत्र पर खास फोकस किया है। सरकार को यह एहसास है कि वह कृषि क्षेत्र को मजबूती दिए बगैर आर्थिक संकट की चुनौती से पार नहीं पा सकेगी। इसलिए उसने कृषि क्षेत्र के खास योजनाओं की घोषणा की है।
अब तक सरकारों की यह सोच रही है कि राजकोषीय घाटा काबू से बाहर नहीं होना चाहिए। लेकिन पिछले काफी समय से अर्थशास्त्रियों की यह राय सामने आ रही थी कि सरकार को राजकोषीय घाटे में ढील देनी चाहिए। बजट में इस बार ये ढील दी गई। इससे पैसा आएगा। देश के पर्यावरण में हिमालय राज्यों का खास योगदान है। हमेशा की तरह वे केंद्र से पर्यावरणीय सेवाओं के बदले केंद्र से कुछ पाने की इच्छा कर रहे थे। लेकिन उत्तराखंड या हिमालय राज्यों का अलग से बजट में कोई जिक्र नहीं हुआ।
ऐसे लगा राज्यों को झटका
बजट के शोर में एक अहम बात शायद दब गई। ये बात करों में राज्यों की हिस्सेदारी को लेकर है। शनिवार को 15वें वित्त आयोग की अंतरिम रिपोर्ट भी रखी गई। 14वें वित्त आयोग में राज्यों की करों में हिस्सेदारी 42 फीसदी थी। लेकिन 15वें वित्त आयोग ने इसे घटाकर 41 फीसदी करने की सिफारिश की है। केंद्र का तर्क है कि उसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए पैसा चाहिए। इसके अलावा वह जम्मू कश्मीर राज्य के कम हो जाने को भी आधार बना रहा है। - प्रोफेसर बीके जोशी, आर्थिक मामलों के जानकार एवं पूर्व कुलपति कुमाऊं विवि