पढ़े लिखे अफसरों ने की ऐसी धोखाधड़ी कि बड़े-बड़े फ्रॉड भी शर्माजाएं
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उत्तराखंड में सौ करोड़ रुपये से ज्यादा के छात्रवृत्ति घोटाले में अपर सचिव वी. षणमुगम की जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
दर्जनों मामलों की जांच की इस रिपोर्ट में अफसरों और बिचौलियों की साफतौर पर मिलीभगत सामने आई है। इसमें यह भी स्पष्ट है कि जिन विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान की गई है, उनका न तो भौतिक सत्यापान किया गया और न ही छात्रवृत्ति के लिए आवश्यक उपस्थिति है।
जांच अधिकारी ने साफतौर रिपोर्ट में गंभीर अनियमितता की बात कहते हुए विस्तृत जांच की सिफारिश की है। बावजूद इसके शासन मामले पर चुप्पी साधे बैठा है।
समाज कल्याण विभाग को छात्रवृत्ति घोटाले की जांच आख्या सौंपी
बीती 27 मार्च को अपर सचिव वी. षणमुगम ने समाज कल्याण विभाग को छात्रवृत्ति घोटाले की जांच आख्या सौंपी है। इसमें विकासनगर के 11 और सेवलाकलां के आठ छात्र-छात्राओं की छात्रवृत्ति से जुड़े मामलों की डिटेल है। इन सभी के दाखिले कमलेश पैरामेडिकल प्राइवेट आईटीआई और कमालपुर स्थित कृष्णा कॉलेज ऑफ लॉ में हुए हैं।
इसी तरह हरिद्वार के बहादराबाद के भी चार मामले हैं, जिनका दाखिला सहारनपुर के वीर विजय शिक्षा संस्थान में हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ बिचौलियों ने इन छात्रों के कागजात लेकर उनके दाखिले करा दिए। बैंक के खाते भी इनकी जानकारी के बगैर खुलवाए गए और विड्रॉल फॉर्म में दाखिले के वक्त ही छात्रों के हस्ताक्षर करवा लिए गए।
बैंक पास बुक भी इन्हें नहीं दी गई। लगभग सभी की हाजिरी नाम मात्र की रही। कुछ को पेपर भी दिलवाए गए, जिसके एवज में दो-चार हजार रुपये दे दिए गए। जांच अधिकारी ने कहा है कि न्यूनतम 70 फीसदी उपस्थिति होने के बाद ही विद्यार्थी छात्रवृत्ति का अधिकारी होता है।
मगर इनमें से एक भी इस पैमाने पर खरा नहीं उतरता है। इसके अतिरिक्त यह भी प्रावधान है कि छात्रवृत्ति मांग पत्र का भौतिक सत्यापन अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए, जो नहीं किया गया। इसके अतिरिक्त संस्थान की मान्यता की जांच भी समाज कल्याण अधिकारियों ने नहीं की।
गिरोह बनाकर हुई लूट
जांच रिपोर्ट में अपर सचिव ने स्पष्ट रूप से कहा है कि जांच से यह प्रतीत होता है कि संबंधित जिला समाज कल्याण अधिकारियों ने भौतिक सत्यापन किए बगैर ही भुगतान संबंधित संस्थानों एवं छात्रों को कर दिया।
इससे तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारियों, उनके कार्यालय एवं संस्थाओं के साथ एक संगठित गिरोह के सदस्यों की दूराभिसंधि होना प्रतीत होती है। जिन मामलों की जांच हुई है, उनके संबंध में जिलों से प्राप्त अभिलेखों और आईटी सेल के डाटाबेस के मिलान से यह बात स्पष्ट होती है कि संबंधित छात्र-छात्राओं एवं संबंधित संस्थाओं के छात्रवृत्ति के लिहाज से अयोग्य पाए जाने के बावजूद नियम विरुद्ध एवं गैरकानूनी तरीके से भुगतान किया गया।
यह भी साफ तौर पर रिपोर्ट में कहा गया है कि देहरादून और हरिद्वार के तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारियों ने गैर कानूनी कार्य किया है, जिससे सरकारी पैसे की बर्बादी हुई है। यही नहीं यह एससी-एसटी एक्ट के अनुसार भी दंडनीय कार्य है।
यह केवल ट्रेलर, पिक्चर अभी बाकी
गौरतलब है कि यह जांच आख्या केवल वर्ष 2014-15 के कुछ मामलों की है, जिसे रैंडम आधार पर सैंपल लेकर किया गया है और समाज कल्याण विभाग से वित्तीय वर्ष 2011-12 से 2014-15 के बीच केवल देहरादून और हरिद्वार जिलों के छात्रों की संख्या हजारों में है। केवल रैंडम जांच में ही इतना बड़ा घपला सामने आया है तो विस्तृत जांच में क्या होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। जांच अधिकारी ने भी इस बात की सिफारिश की है कि राज्य के अंदर और बाहर पढ़ने वाले छात्रों की उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।