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उत्तराखंडः विधायकों के असंतोष को नहीं भांप पाए त्रिवेंद्र, गोलबंदी ने खिसका दी कुर्सी
Wed, 10 Mar 2021 06:46 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, देहरादून
अमर उजाला नेटवर्क, देहरादून
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 10 Mar 2021 06:46 AM IST
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trivendra singh rawat
- फोटो : amar ujala
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उत्तराखंड में 70 सीटों में से 57 विधायकों की प्रचंड की संख्या के बावजूद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत अपनी कुर्सी नहीं बचा पाए। वे पार्टी के विधायकों के असंतोष को भांप पाने में नाकाम रहे। जिसकी कीमत उन्हें अपनी कुर्सी गंवाकर चुकानी पड़ी।
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पार्टी के भीतर और बाहर विधायकों की नाराजगी की चर्चाएं गाहे बगाहे सुनाई देती रहीं, लेकिन मुख्यमंत्री खेमा अंदर ही अंदर सुलग रहे अंसतोष को नहीं भांप सका। विधायकों की नाराजगी कभी अफसरशाही की मनमानी के विरोध के रूप में तो कभी उनके विधानसभा क्षेत्रों में विकास योजनाओं के तौर पर सामने आती दिखीं। उनका ये असंतोष कई बार विधानसभा में अपनी ही सरकार के असहज करने वाले सवालों की शक्ल में सामने आया।
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लोहाघाट के विधायक पूरन फर्त्याल इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। उन्होंने अपनी ही सरकार के भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति पर ही प्रश्न खड़े कर दिए। सदन में कार्यस्थगन प्रस्ताव के जरिये इस मुद्दे उठाने की कोशिश पर सरकार की खूब किरकिरी हुई। इसे मुख्यमंत्री के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलने की कवायद के तौर पर देखा गया।
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रायपुर के विधायक उमेश शर्मा काऊ की नाराजगी तो कई बार सामने आई। अपने विधानसभा क्षेत्र में विकास कार्यों को लेकर उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा तक से शिकायत की। डीडीहाट के विधायक बिशन सिंह चुफाल, लोहाघाट के विधायक पूरन सिंह फर्त्याल की नाराजगी भी कई बार सतह पर दिखी। लेकिन मुख्यमंत्री ने विधायकों के इस असंतोष को हल्के में लिया जो बाद में उनकी कुर्सी पर भारी पड़ गया।
विधायक ही नहीं मंत्री भी थे नाराज
मुख्यमंत्री की सख्त और कड़क कार्यशैली से केवल भाजपा के विधायक ही असहज नहीं थे। बल्कि मंत्रियों की नाराजगी भी खुलकर सामने आती रही। अपने मंत्रालयों में कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज अफसरशाही की मनमानी से इस कदर व्यथित थे कि उनकी यह व्यथा भाजपा संगठन से लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर तक पहुंच गई थी। कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत कर्मकार बोर्ड में कथित घोटालों की जांच को लेकर खासे असहज थे। बोर्ड की सचिव दमयंती रावत की विदाई, बोर्ड के मामलों की जांच कराए जाने से नाराज हरक ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से शिकायत कर दी थी।
महिला एवं बाल विकास मंत्री रेखा आर्य आईएएस अधिकारी डॉ. षणमुगम से विवाद में सरकार की भूमिका से असहज थीं। शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय भी अपने विभागों में अफसरशाही की मनमानी से बहुत ज्यादा सहज नहीं थे। कृषि मंत्री सुबोध उनियाल उनके विभाग के एक सचिव को बदल दिए जाने से नाराज थे। ये तमाम नाराजगियां कब बारूद बनकर धमाके में बदल गई, मुख्यमंत्री खेमे को इसकी भनक तक नहीं लगी।