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यहां देखने के लिए है बहुत कुछ
अमर उजाला, देहरादून
Updated Thu, 26 Sep 2013 05:05 PM IST
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इस वीकेंड आप चमोली जिले के दर्शनीय स्थलों पर जाकर नया अनुभव ले सकते हैं। इन जगहों पर देखने के लिए काफी कुछ है। यहां स्थित हरे भरे घास के मैदान और विश्व प्रसिद्घ औली बरबस ही लोगों को अपनी ओर खिंचती है। इन स्थानों पर जाकर आप अपने वीकेंड को और भी ज्यादा मजेदार बना सकते हैं।
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चोपता-तुंगनाथ-दुग्गलबिटठ
बदरीनाथ-केदारनाथ मार्ग पर चमोली के जिला मुख्यालय गोपेश्वर से 27 किमी. की दूरी पर चोपता बुग्याली (घास का हरियाला पर्वतीय मैदान) क्षेत्र है। यहां से तुंगनाथ जाने का पैदल मार्ग भी शुरूहोता है। यहां से हिमालय की लंबी श्रृंखलाओं के दीदार होते हैं।
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गोपेश्वर से चोपता मार्ग पर वन क्षेत्र होने के चलते यहां हिमालयी वन्य जीवों को भी देखा जा सकता है। वहीं प्रकृति के अनोखे उपहार के रूप में चोपता से 2 किमी. की दूरी पर दुग्गलबिटठ बुग्याल भी देखने योग्य है।
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औली
शीतकालीन खेलों के लिए प्रसिद्ध औली जोशीमठ नगर से 7 किमी. की दूरी पर स्थित है। यहां जाने के लिए पर्यटन विभाग द्वारा रोप-वे का निर्माण भी कराया गया है। लेकिन बीते कुछ वर्षों से रोप-वे खराब है। यहां मोटर मार्ग से यहां सुगमता से पहुंचा जा सकता है।
जोशीमठ
बदरीनाथ यात्रा का मुख्य पड़ाव और शंकराचार्य का शीतकालीन गद्दी स्थल है। यहां भगवान नृसिंह का भव्य मंदिर, ज्योर्तिमठ और वृद्ध बदरी दर्शनीय स्थल हैं।
भविष्य बदरी
जोशीमठ नगर से करीब 17 किमी. की दूरी मोटर मार्ग तथा 6 किमी. की दूरी पैदल तय कर पहुंचा जाता है। यहां पत्थर पर भगवान बदरीनाथ की मूर्ति स्वयं उभर रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भविष्य में नर-नारायण पर्वतों के मिलने के बाद वर्तमान बदरीनाथ यात्रा नहीं हो पाएगी। जिसके बाद भगवान बदरीविशाल की पूजा भविष्य बदरी के मंदिर में ही की जाएगी।
बेनीताल की सुरम्य पहाड़ियों का करें दीदार
कर्णप्रयाग से करीब 25 किमी दूर स्थित 33 हजार नाली भूमि में फैला यह क्षेत्र अजादी से पूर्व देश के 48 टी-स्टेटों में शामिल था। यहां तीन सौ मीटर लंबी और करीब 70 मीटर चौड़ी प्राकृतिक झील बेनीताल के साथ ही ढलवा पहाड़ियां लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। यहां बस या अपने वाहन से सिमली से आगे सिमली-बेनीताल मोटर मार्ग से पहुंचा जा सकता है।
37 राजाओं की राजधानी चांदपुर गढ़ी
गढ़वाल राजाओं की पहली राजधानी का गौरव लिए इस गढ़ में राजशाही दौर के संपूर्ण अवशेष विद्यमान हैं। भवनों का निर्माण, आंगन पर बिछे पत्थर की शिलाएं एवं पानी की निकासी की उत्कृष्ट व्यवस्था यहां आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करती है। यहां बारहों महीने आया जा सकता है।
भेंकलताल
नौ हजार फीट ऊंचा स्थित भेंकलताल देवदार, सुराई, बुरांश के पेड़ों के बीच में घिरा हुआ है। करीब एक किमी वर्ग क्षेत्र में फैले स्थान में प्रकृति ने खूब नेमतें बख्सी हैं। यहां भेंकल नाग देवता का प्राचीन मंदिर भी है। जून माह में प्रतिवर्ष भेंकलताल से कुछ नीचे तालगेर में भेंकलताल महोत्सव का आयोजन होता है।
ब्रह्मताल
भेंकलताल से लगभग तीन किमी दूर ऊंचाई पर समुद्रतल से 11 हजार फीट की ऊंचाई पर ब्रह्मताल मौजूद है। खुले स्थान पर तीन सौ वर्ग मीटर में सालभर क्रिस्टल के समान स्वच्छ जल से भरा ताल नजर आता है। यहां से वैदनी और औली बुग्याल के भी दर्शन भी होते हैं। बसंत ऋतु और ग्रीष्मकाल में यहां प्रकृति का सौंदर्य अपने चरम पर होता है।
लैंसडौन
लैंसडौन में पर्यटन के लिए पूरा क्षेत्र ही महत्वपूर्ण है। इसके आसपास मनोरम दर्शनीय स्थलों में मधुगंगेश्वर, भगलीनाऊ, ताड़केश्वर धाम एवं भैरवगढ़ी मंदिर हैं। इस बार पर्यटकों को खास देने के लिए लैंसडौन महोत्सव का आयोजन 25 अक्तूबर से 28 अक्तूबर तक होने जा रहा है।