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टाइगर रिजर्व में ही खतरे में टाइगर
बिशन सिंह बोरा / अमर उजाला, देहरादून
Updated Fri, 13 Oct 2017 12:27 PM IST
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राजाजी टाइगर रिजर्व में अवैध रूप से रह रहे वन गुर्जर टाइगर और लैपर्ड के लिए खतरा बने हैं। वन गुर्जर खटका, कलच वायर और जहर देकर वन्य जीवों का बेरहमी से शिकार कर रहे हैं।
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मंगलवार को हरिद्वार वन प्रभाग की श्यामपुर रेंज से वन गुर्जरों द्वारा किया गया लैपर्ड का शिकार कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी पार्क की विभिन्न रेंजों से वन गुर्जर टाइगर की खाल एवं अन्य वन्य जीव अंगों के साथ पकड़े जा चुके हैं। विभागीय सूत्रों के मुताबिक वन्य जीव अंगों की तस्करी मामले में जल्द ही पार्क के कुछ अन्य वन गुर्जरों की गिरफ्तारी हो सकती है।
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राजाजी टाइगर रिजर्व की विभिन्न रेंजों से कई वन गुर्जर परिवारों का पुनर्वास किया जा चुका है। गैंडीखाता में 723, पथरी में 512 परिवारों का पुनर्वास किया गया है। इसके बावजूद पार्क की चीलावाली, रामगढ़ और गौहरी रेंज में इक्का दुक्का नहीं बल्कि 119 से अधिक परिवार अवैध रूप से रह रहे हैं। यह वे परिवार हैं जिन्हें प्रति परिवार पथरी और गैंडीखत्ता में 8200 वर्ग मीटर भूमि आवंटित की गई।
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इसके अलावा पार्क में कुछ ऐसे परिवार भी हैं जो हिमाचल, उत्तर प्रदेश और कश्मीर से यहां आकर बसे हुए हैं। विभागीय सूत्रों के मुताबिक अवैध रूप से पार्क के भीतर रहने वाले यह वन गुर्जर परिवार वन्य जीवों खासकर टाइगर, लैपर्ड और हाथियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। इसी वर्ष मई में मोहंड के पास लैपर्ड की दो खालों के साथ वन गुर्जरों को पकड़ा गया था।
जबकि 2016 में गैंडीखत्ता में एक वन गुर्जर सहित चार लोगों को टाइगर की खाल के साथ पकड़ा गया था। यह लोग टाइगर की खाल बेचने का प्रयास कर रहे थे। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक इसमें तीन लोग यूपी वन विभाग की सीमा क्षेत्र के थे। इसके अलावा कुछ अन्य मामलों में भी वन गुर्जर वन्य जीव अंगों की तस्करी करते पकड़े जा चुके हैं। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि वर्ष 2008-09 में पार्क की चीलावाली में 12 से 15 टाइगर देखे गए थे, लेकिन इस रेंज में अब टाइगर दिखाई नहीं देता। जबकि टाइगर रिजर्व में 34 टाइगर हैं।
ऐसे करते हैं शिकार
पार्क के भीतर एवं इसकी सीमा से सटकर निवास करने वाले वन गुर्जर मृत जानवरों पर जहर डालते हैं। टाइगर या लैपर्ड के इसे खाते ही वह बेहोश होने लगता है। जिसे लाठी डंडों से पीटकर मारा जाता है। जिसकी एक खाल तीन से चार लाख रुपये में बेच दी जाती है। इसके अलावा खटका लगाकर एवं कलच वायर में फंसाकर भी वन्य जीवों को मारा जाता है।
पार्क के भीतर रहने वाले वन गुर्जरों को पार्क की पूरी जानकारी होती है, इनका अवैध शिकार के प्रकरणों में शामिल होना चिंता का विषय है, शिकार करने वाले घर के भेदी हैं और इन्हें पार्क क्षेत्र से बाहर करना होगा।
- सनातन, डायेक्टर राजाजी टाइगर रिजर्व