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तिब्बती कवि ने बताया चीन का सच, भारत को दी चेतावनी, कहा 'उससे सतर्क रहे'

Wed, 06 Mar 2019 11:14 AM IST
अलका त्यागी दीप जोशी, अमर उजाला, अल्मोड़ा
दीप जोशी, अमर उजाला, अल्मोड़ा Published by: अलका त्यागी Updated Wed, 06 Mar 2019 11:14 AM IST
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Tibetan poet told the truth of China
तिब्बत के क्रांतिधर्मी कवि तेनजिन त्सुन्दू - फोटो : अमर उजाला

2001 में पहला आउटलुक पिकाडोर नॉन फिक्शन अवार्ड प्राप्त तिब्बत के क्रांतिधर्मी कवि तेनजिन त्सुन्दू का कहना है कि भारत को चीन से सतर्क रहने की जरूरत है।

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भारत में रह रहे करीब एक लाख तिब्बती शरणार्थी अपनी संस्कृति, भाषा, परंपरा और अपनी अलग पहचान को संरक्षित रखकर आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। एक दिन जरूर आएगा जब तिब्बत को आजादी मिलेगी। 
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मनाली में एक गरीब तिब्बती शरणार्थी परिवार में जन्मे तेनजिन ने मुंबई विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एमए किया है। अब तक उनकी अंग्रेजी में तीन पुस्तकें क्रॉसिंग द बॉर्डर, कोरा और सेम्शूक छप चुकी हैं। आजादी पर फोकस उनका कविता संग्रह कोरा काफी लोकप्रिय है।

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खानों का दोहन करके दुनिया को बेचा जा रहा

तेनजिन के मुताबिक इस पुस्तक की बिक्री से उन्हें जो पैसा मिलता है उससे वह अपना खर्चा चलाते हैं और देश, विदेश के कालेजों, विश्वविद्यालयों और बुद्धिजीवियों के बीच जाकर तिब्बत के संघर्ष के बारे में जानकारी देते हैं। चीन 1911 में आजाद हुआ। 1949 में कम्युनिस्ट देश बन गया। इसके बाद चीन ने तिब्बत के अलावा ईस्ट तुर्किस्तान और इनर मंगोलिया देशों को अपने कब्जे में ले लिया। चीन का मकसद बस अपना विस्तार करना है। इसलिए भारत को उससे सतर्क रहना चाहिए।

तिब्बत में स्थित भारी मात्रा में सोने और लिथिम आदि की खानों का दोहन करके दुनिया को बेचा जा रहा है। चीन इस व्यापार के जरिये दुनिया में तिब्बत की पहचान मिटाने का काम भी कर रहा है। तेनजिन अपनी कविताओं के माध्यम से लोगों को स्वार्थ की जिंदगी जीने के बजाय अपने मुल्क और मातृ भूमि के लिए सोचने की प्रेरणा देते हैं।

क्षेत्रीय भाषाओं को जीवित रखना है तो ऐसा करना होगा

तेनजिन का कहना है कि क्षेत्रीय भाषाओं को जीवित रखना है तो उनका अधिक से अधिक उपयोग किया जाना चाहिए। इसके लिए आधुनिक तकनीक और जरूरतों के मुताबिक बदलाव की भी जरूरत है। उन्होंने बताया कि तिब्बती भाषा को बढ़ावा देने के लिए अपने समुदाय के बीच ह्वट्सएप संदेशों का तिब्बती भाषा में आदान प्रदान कर रहे हैं। तेनजिन कहते हैं कि कुमाऊंनी और गढ़वाली भाषाओं को बचाए रखने के लिए भी कुछ इस तरह के प्रयास होने चाहिए। 

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