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अब हिमालय पर नहीं हो पाएगी अतार्किक घोषणा

Tue, 06 Dec 2016 10:56 AM IST
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून
रजा शास्त्री/ अमर उजाला, देहरादून Updated Tue, 06 Dec 2016 10:56 AM IST
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there will be no irrational announcement on himalayas
himalaya

हिमालयी ग्लेशियर वर्ष 2035 तक पिघल जाएंगे’ सरीखी अतार्किक घोषणाएं अब नहीं हो पाएंगीं।

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नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज के तहत हिमालय का डाटा बेस तैयार करने के लिए नौ हिमालयी राज्यों में 27 रिसर्च प्रोजेक्ट शुरू कर दिए गए हैं। मोरक्को की सीओपी-22 में हिमालय के विश्व पटल पर आने के बाद बड़े पैमाने पर विभिन्न पहलुओं पर शोध किए जा रहे हैं। अभी तक विश्व के देश हिमालय को ‘सबसे कम शोधवाला’ क्षेत्र कहते रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी इंटर-गवर्नमेंटल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज के सर्वे में हिमालय ग्लेशियर वर्ष 2035 तक पिघलने की बात कही गई थी, लेकिन इसके आधार के लिए कोई आंकड़ा उपलब्ध न होने पर इस बात को वापस ले लिया गया था।
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इस घटना के बाद हिमालय का डाटा बेस तैयार करने का निर्णय लिया गया। मोरक्को में हिमालय के विश्व पटल पर आने के बाद इतने बड़े पैमाने पर शोध श्रंखला पहली बार शुरू की गई है। इसमें सरकारी विभागों, शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों को भी जोड़ा जा रहा है।
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मिशन की ओर से रिसर्च करने वाले 219 शोधार्थियों को फेलोशिप दी जाएगी। जीबी पंत इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन डेवलपमेंट एंड एनवायरमेंट को इसकी नोडल एजेंसी बनाया गया है। पंत इंस्टीट्यूट ने इस संबंध में सभी विभागों, विवि और संस्थानों को पत्र जारी कर दिया है।

यूसैक को भी प्रोजेक्ट दिया गया है। इसमें हिमालयी वनस्पतियां, ग्लेशियर, चट्टानें, वन्य जीव संपदा आदि को शामिल किया जाएगा। इन शोधों में हिमालय के हर पहलू का डाटा बेस तैयार होगा। इससे परियोजनाएं शुरू करने में आसानी रहेगी।  


हिमालय के संबंध में अभी तक दीर्घकालीन डाटा नहीं मिलता था। इसी वजह से विश्व के देश हिमालय को ‘डाटा डिफिशिएंट’ व ‘लेस रिसर्चर्ड एरिया’ कहा करते थे, लेकिन अब बड़े पैमाने पर रिसर्च शुरू हो गया हैं। डाटा बेस तैयार किया जा रहा है। अब हिमालय के हर पहलु का डाटा उपलब्ध रहेगा।
- डॉ. पीपी ध्यानी, निदेशक, जीबी पंत इंस्टीट्यूट

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