वैज्ञानिकों का दावा, उत्तराखंड में नहीं है एक भी ‘झील बम’
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‘उत्तराखंड में कोई भी ग्लेशियर झील ऐसी खतरनाक नहीं है, जिससे चार धाम में आई भयावह आपदा जैसी स्थिति दोबारा पैदा हो’। ग्लेशियर झीलों पर वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के एक विस्तृत अध्ययन में यह राहत भरा निष्कर्ष सामने आया है।
दरअसल आपदा के बाद उत्तराखंड में ग्लेशियरों के आसपास बनने वाली झीलों को इलेक्ट्रानिक मीडिया के कई चैनलों ने ‘झील बम’ की संज्ञा से नवाजा और विभिन्न विशेषज्ञों के हवाले से दावा किया था कि हिमालय क्षेत्र में ऐसे 200 ‘झील बम’ हैं, जिनके फटने से 2013 की आपदा से हजार गुना ज्यादा तबाही हो सकती है।
इसके उलट, इस अध्ययन में कहा गया है कि उत्तराखंड में ग्लेशियरों के बीच विभिन्न कारणों से बनने वाली छोटी-बड़ी 1266 झीलों हैं। बावजूद इसके ग्लेश्यिर के आसपास बनने वाली एक भी झील, ‘झील बम’ जैसी स्थिति में नहीं है।
पहली बार हुई झीलों की स्थिति की गणना
इस अध्ययन से मोरैन डैम्ड लेक कही जाने वाली इन ग्लेशियर झीलों की ताजा स्थिति उपलब्ध हो गई है। पहली बार उत्तराखंड की ग्लेशियर झीलों का विस्तृत खाका भी तैयार किया गया है।
झीलों की गणना करने वाले वरिष्ठ ग्लेशियर विशेषज्ञ डॉ. डीपी डोभाल का कहना है कि कोई भी मोरैन डैम्ड लेक खतरनाक स्थिति में नहीं है।
ग्लेशियर के आगे बनने वाली झील सबसे अधिक खतरनाक मानी जाती हैं, लेकिन ये झीलें उत्तराखंड में न के बराबर हैं। इन झीलों में ग्लेशियरों से रिसकर लगातार पानी आता रहता है। ऐसी झीलें नेपाल और भूटान में अधिक हैं। स्थायी झीलों और कटाव के कारण जो झीलें बनती हैं उनसे खतरा नहीं रहता है।
उत्तराखंड में नहीं आएगी केदारनाथ जैसी आपदा
उन्होंने बताया कि कि दो साल पहले चोराबारी ग्लेशियर झील के टूटने से केदारनाथ क्षेत्र को भयावह जल प्रलय का सामना करना पड़ा था। उसके बाद वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान ने ग्लेशियरों के टूटने या इनके नजदीक बनने वाली झीलों का सर्वेक्षण किया। साथ ही चोराबारी ग्लेशियर की भी लगातार मॉनीटरिंग की।
ग्लेशियरों के आसपास बनने वाली मोरैन डैम्ड झील बहुत कमजोर मानी जाती है। इसका आधार बहुत मजबूत नहीं होता है। अगर तेज झटका लग जाए तो झील टूट जाती हैं। चोराबारी ग्लेशियर झील को भी इसी श्रेणी का माना जाता है।
उत्तराखंड की ग्लेशियर झीलों का अध्ययन कर लिया गया है। इससे फायदा यह होगा कि इनकी बराबर मॉनीटरिंग की जाती रहेगी। समस्या के पहले उपाय कर लिए जाएंगे। झीलों को पंचर करके पानी निकालने समेत कई तरीके अपनाए जा सकते हैं।
-डॉ. डीपी डोभाल, वरिष्ठ ग्लेशियर विशेषज्ञ, वाडिया हिमालय भू विज्ञान संस्थान
आंकड़ों पर नजर
ग्लेशियर पिघलने से बनीं 1266 झीलें
ग्लेशियर बॉडी के अगल-बगल बनीं 329 झीलें
ग्लेशियर के कचरे के गड्ढे में बनीं झीलें 809 , ये झीलें अस्थायी प्रकृति की होती हैं
ग्लेशियर पिघलने से छिछले स्थान पर बनीं झीलें 48
पहाड़ की कटान (इरोजन) से बनीं 80 झीलें