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Dehradun News: भीम के कंचे उठाना नहीं आसान, श्रद्धा से बनता है काम
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छोटे गोलों को उठाने में छूट जाते हैं पहलवानों के पसीने
हनोल मंदिर परिसर में मौजूद गोलों में छिपा है रहस्य
हनोल स्थित महासू देवता मंदिर में पांडु पुत्र भीम के असीम बल के साक्ष्य मौजूद हैं। यहां मंदिर परिसर में दो छोटे सीसे के गोले रखे हैं। मान्यता है कि यह भीम के कंचे है, जिनसे वह खेला करते थे, लेकिन इस मामूली और कम वजनी दिखने वाले गोलों को उठाने में अच्छे से अच्छे पहलवानों के पसीने छूट जाते है। इनमें से एक गोले का वजन छह मन (240 किलोग्राम) और दूसरे का नौ मन (360) किलोग्राम है। मान्यता है कि यह कंचे अभिमान के बल से नहीं बल्कि सच्ची श्रद्धा की भावना से उठते हैं।
महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास के साक्ष्य जौनसार क्षेत्र में आज भी मौजूद हैं। मान्यता है कि पांडव अज्ञात वास के दौरान हनोल, चकराता, लाखामंडल और कालसी क्षेत्र में ठहरे थे। यहां हनोल स्थित महासू महादेव मंदिर परिसर में सीसे के दो गोले रखे हैं। मंदिर समिति के सचिव मोहन लाल सेमवाल ने बताया कि मान्यता है कि द्वापरयुग 8,64,000 वर्ष का होता है। इसमें मनुष्य लगभग एक हजार वर्ष तक जीवित रहते हैं। द्वापर युग में मनुष्य की लंबाई 11 फीट से अधिक हुआ करती है।
उन्होंने बताया कि पांडव काल द्वापर युग के समय का है। मंदिर परिसर में मौजूद सीसे के गोले वास्तव में महाबली भीम के कंचे (गिटिया) है, जिससे वह खेला करते थे। उन्होंने कहा कि आकार में यह कंचे बहुत छोटे नजर आते है, लेकिन इनका भार आकार से कई गुना है। छोटे गोले का वजन छह मन और बड़े का नौ मन है। उन्होंने बताया कि मंदिर में आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक कौतुहल वश इन गोलों के बारे पूछते हैं। कई श्रद्धालु और पर्यटक गोलों के वजन की बात पर विश्वास नहीं करते हैं। बताया कि ऐसे में श्रद्धालु और पर्यटक स्वयं गोलों को उठाकर अपनी ताकत की अजमाइश करते हैं।
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बताया कि महासू महाराज में आस्था रखने वाले भक्त अगर पूरी श्रद्धा से प्रयास करते हैं तो गोले को आराम से उठा लेते हैैं। जागड़ा पर्व पर आने वाले श्रद्धालु इन गोलों को कंधे पर उठाकर फेंकते हैं। जहां यह गोले गिरते हैं, वहां पर गड्ढा हो जाता है।
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हनोल मंदिर परिसर में मौजूद गोलों में छिपा है रहस्य
हनोल स्थित महासू देवता मंदिर में पांडु पुत्र भीम के असीम बल के साक्ष्य मौजूद हैं। यहां मंदिर परिसर में दो छोटे सीसे के गोले रखे हैं। मान्यता है कि यह भीम के कंचे है, जिनसे वह खेला करते थे, लेकिन इस मामूली और कम वजनी दिखने वाले गोलों को उठाने में अच्छे से अच्छे पहलवानों के पसीने छूट जाते है। इनमें से एक गोले का वजन छह मन (240 किलोग्राम) और दूसरे का नौ मन (360) किलोग्राम है। मान्यता है कि यह कंचे अभिमान के बल से नहीं बल्कि सच्ची श्रद्धा की भावना से उठते हैं।
महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास के साक्ष्य जौनसार क्षेत्र में आज भी मौजूद हैं। मान्यता है कि पांडव अज्ञात वास के दौरान हनोल, चकराता, लाखामंडल और कालसी क्षेत्र में ठहरे थे। यहां हनोल स्थित महासू महादेव मंदिर परिसर में सीसे के दो गोले रखे हैं। मंदिर समिति के सचिव मोहन लाल सेमवाल ने बताया कि मान्यता है कि द्वापरयुग 8,64,000 वर्ष का होता है। इसमें मनुष्य लगभग एक हजार वर्ष तक जीवित रहते हैं। द्वापर युग में मनुष्य की लंबाई 11 फीट से अधिक हुआ करती है।
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उन्होंने बताया कि पांडव काल द्वापर युग के समय का है। मंदिर परिसर में मौजूद सीसे के गोले वास्तव में महाबली भीम के कंचे (गिटिया) है, जिससे वह खेला करते थे। उन्होंने कहा कि आकार में यह कंचे बहुत छोटे नजर आते है, लेकिन इनका भार आकार से कई गुना है। छोटे गोले का वजन छह मन और बड़े का नौ मन है। उन्होंने बताया कि मंदिर में आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक कौतुहल वश इन गोलों के बारे पूछते हैं। कई श्रद्धालु और पर्यटक गोलों के वजन की बात पर विश्वास नहीं करते हैं। बताया कि ऐसे में श्रद्धालु और पर्यटक स्वयं गोलों को उठाकर अपनी ताकत की अजमाइश करते हैं।
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बताया कि महासू महाराज में आस्था रखने वाले भक्त अगर पूरी श्रद्धा से प्रयास करते हैं तो गोले को आराम से उठा लेते हैैं। जागड़ा पर्व पर आने वाले श्रद्धालु इन गोलों को कंधे पर उठाकर फेंकते हैं। जहां यह गोले गिरते हैं, वहां पर गड्ढा हो जाता है।