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Uttarakhand Election Results: शीर्ष नेताओं के लिए दिग्गजों की हार सबक से कम नहीं
Fri, 11 Mar 2022 06:19 AM IST
दुष्यंत शर्मा
डॉ. सुभाष गुप्ता, देहरादून
डॉ. सुभाष गुप्ता, देहरादून
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 11 Mar 2022 06:19 AM IST
सार
दोनों प्रमुख दलों के मुख्यमंत्री की कुर्सी के प्रमुख दावेदारों की शिकस्त महज एक चुनावी हार नहीं है, बल्कि ये शीर्ष नेताओं के लिए भी एक सबक जैसी है। इन नतीजों ने इस भ्रम को चकनाचूर कर दिया है कि मौजूदा मुख्यमंत्री या इस कुर्सी के प्रमुख दावेदारों की वजह से दूसरे उम्मीदवारों को चुनाव में कोई बड़ा फायदा उठा मिल पाता है।
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पुष्कर सिंह धामी
- फोटो : ANI
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विस्तार
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के नतीजे कई मायने में चौंकाने वाले हैं। दोनों प्रमुख दलों के मुख्यमंत्री की कुर्सी के प्रमुख दावेदारों की शिकस्त महज एक चुनावी हार नहीं है, बल्कि ये शीर्ष नेताओं के लिए भी एक सबक जैसी है। इन नतीजों ने इस भ्रम को चकनाचूर कर दिया है कि मौजूदा मुख्यमंत्री या इस कुर्सी के प्रमुख दावेदारों की वजह से दूसरे उम्मीदवारों को चुनाव में कोई बड़ा फायदा उठा मिल पाता है।
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सत्ता पर काबिज बीजेपी के युवा मुख्यमंत्री पुष्पेंद्र सिंह धामी को हालांकि कुछ कर गुजरने और जनता का दिल जीतने के लिए बहुत कम वक्त मिला, लेकिन यह समय इतना कम भी नहीं रहा कि वे अपनी सीट को सुरक्षित बना पाते। धामी की हार प्रदेश में जनता के दुख दर्द कम करने और विश्वास जीतने में ढुलमुल रवैया अपनाने से जोड़कर देखी जा सकती है।
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राज्य में उनकी ताजपोशी के बाद से बहुत से अधिकारियों के कामकाज पर अंगुलियां उठती रही हैं। एक मुख्य सचिव को बदलने के अलावा धामी ऐसा कुछ खास नहीं कर सके, जिससे आम जनता की परेशानियां कम हो सकें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भरपूर अवसर देने और पूरा विश्वास जताने के बाद की यह स्थिति शीर्ष नेतृत्व के लिए भी किसी बड़े सबक जैसी है।
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उत्तराखंड में एक के बाद एक तीन मुख्यमंत्री बदलकर शीर्ष नेतृत्व ने खुद यह मान लिया था कि उसने पहले सही नेता का चुनाव नहीं किया था। बयानों से इतर, अधिकांश सरकारी दफ्तरों के हाल जनता से ज्यादा दिन तक नहीं छिप पाते। आम जनता को सब्जबाग दिखाने वाले नेताओं को अफसरान किस तरह सब्जबाग दिखाकर हकीकत से दूर रखते हैं या अपने हित इसकी वजह बनते हैं, जनता के लिए यह समझना मुश्किल नहीं होता।
मुख्यमंत्री पद से हटाए गए त्रिवेंद्र सिंह रावत भले ही खुद चुनाव नहीं लड़े, लेकिन उनकी पसंद के उम्मीदवार की 28 हजार से ज्यादा वोटों से विजय ने उनके कार्यों और प्रभाव को कहीं न कहीं मान्यता दी है। पूर्व मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार और कांग्रेस के दिग्गज हरीश रावत का जादू भी भोथरा साबित हुआ। सूबे में पार्टी की सरकार बनाने का उनका सपना तो चकनाचूर हुआ ही। वे खुद भी बुरी तरह मात खा गये।