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हिंदी दिवस पर फिर उठे महान कथाकार के सुलगते सवाल
अमरनाथ / अमर उजाला, हल्द्वानी
Updated Mon, 14 Sep 2015 12:20 PM IST
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‘छाप तिलक सब छीनी रे, मोसे नयना लड़ाई के’- 12वीं सदी में हिंदी के सर्वोच्च शिल्पी अमीर खुसरो का यह सूफियाना कलाम उनके पीर निजामुद्दीन औलिया ही नहीं, बल्कि हिंदी पर भी बलिहारी होने की निशानी है।
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तब उन्होंने 29 बोलियों पर अध्ययन के बाद कहा था कि देश के भविष्य की भाषा हिंदी ही रहेगी। इसमें दो राय नहीं कि देश-विदेश में हिंदी का विस्तार हुआ है, पर देश की आजादी के 68 साल बाद भी 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाने को लेकर महान कथाकार शैलेश मटियानी के सवाल अब भी जिंदा है।
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अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना में 1931 में जन्मे साहित्यकार शैलेष मटियानी हिंदी के प्रति सरकारों और नौकरशाहों के रवैये से बेहद दुखी थे। इस मुद्दे पर वह लेखनी के जरिए सवालों की झड़ी लगाकर 14 साल पहले दुनिया से चले गए।
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उन्होंने 25 साल पहले लिखी अपनी पुस्तक ‘राष्ट्रभाषा का सवाल’ में यह प्रश्न उठाया था कि इस महादेश में 14 सितंबर को ही हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है? इसका जवाब हिंदी दिवस पर ही उन्हें इलाहाबाद में एक मंच पर हिंदी के विद्वान डॉ. प्रेमनारायण शुक्ला से मिला।
‘14 सितंबर 1949 को संविधान समिति द्वारा देश के संविधान में हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा और राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। इसलिए यह दिन एक महान राष्ट्रीय पर्व है।’
इस जवाब से असंतुष्ट मटियानी जी ने डॉ. शुक्ला से पूछा था कि तब हम इसे राष्ट्रभाषा या राजभाषा दिवस के रूप में क्यों नहीं मनाते हैं। उन्होंने तब 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाने को शर्मनाक पाखंड करार दिया था।
उनका मानना था कि संविधान में हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दिया गया है, लेकिन सरकार ने हिंदी को न तो कभी हिंदी की तरह माना और न ही राष्ट्रभाषा की तरह, बल्कि छाया भाषा के तौर पर मान्यता दी, जिस पर उन्हें सख्त ऐतराज था। वह हिंदी को देश भर में जन-जन की भाषा बनाने के हिमायती थे।
इस बात से चिंतित थे कि बिना राष्ट्रभाषा के राष्ट्र कैसे सशक्त होगा। यह बात दीगर है कि 12वीं सदी में हिंदी को सशक्त बनाने वाले अमीर खुसरो पठान थे, जबकि उनकी मां दौलत नाज हिंदू संस्कारों में पली-बढ़ी थीं।
शायद यही वजह उनके हिंदी प्रेम का था। 26 साल पहले लिखे एक लेख में मटियानी जी ने लिखा था कि महामना अमीर खुसरो के जन्म या निर्वाण के दिन को हिंदी के साथ जोड़ देना चाहिए, जिन्होंने ‘बहुत कठिन है डगर पनघट की’ गा-गाकर, हिंदी के भविष्य की डगर को आसान ही नहीं, बल्कि राष्ट्रव्यापी बना दिया।