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'राम कृष्ण यादव से बाबा रामदेव बनने की कहानी'
अमर उजाला, हरिद्वार
Updated Sat, 23 Nov 2013 11:12 PM IST
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भारत की बड़ी हस्तियों में शामिल और इन दिनों केंद्र और उत्तराखंड सरकार के आंखों की किरकिरी बने बाबा रामदेव ने महज 15 सालों में विशाल साम्राज्य खड़ा किया है।
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जाने-माने उद्यमियों से अधिक मशहूर
18 साल पहले गुरु शंकरदेव से संन्यास दीक्षा लेने वाले बाबा थोड़े से ही समय में देश के जाने-माने उद्यमियों से अधिक मशहूर हो गए हैं। बाबा का भविष्य अब लोकसभा के भावी चुनाव पर निर्भर करेगा।
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गुरुकुलों और हिमालय में जीवन का अधिकांश समय बीताकर रामदेव 1994 में कनखल कृपालु बाग आश्रम आए थे।
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बड़े अखाड़े के सतत् संपर्क में रहे बाबा ने 1995 में संन्यास की दीक्षा ली। उस समय बाबा ने सोचा तक नहीं था कि वे उद्योग जगत के शीर्ष व्यक्तियों में भी शामिल हो जाएंगे।
योग और प्राणायाम के माध्यम से आगे बढ़ी बाबा की यात्रा करीब 15 वर्ष पूर्व उद्योगों की दिशा में तब आगे बढ़ने लगी, जब उन्होंने कृपालु आश्रम में दिव्य योग औषधिशाला का नवीनीकरण किया।
50 से अधिक उद्योगों के स्वामी हैं बाबा
तब से आज तक बाबा 50 से अधिक उद्योगों के स्वामी बन चुके हैं। हालांकि, बाबा का कहना है कि उनके नाम पर एक भी यूनिट नहीं है।
स्वामी रामदेव ने वर्ष 2001 में आश्रम से निकलकर योग की पताका फहराने का सिलसिला शुरू किया। अपने कर्मक्षेत्र कनखल से सटे ज्वालापुर से बाबा की यात्रा क्या शुरू हुई फिर कोई भी पड़ाव अभी तक नहीं आया।
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दिल्ली की सत्ता से कालेधन के मामले में पंगा मोल लेकर बाबा देखते ही देखते भाजपा की झोली में आ गिरे। भाजपा के शीर्ष पुरुष बने नरेंद्र मोदी से उनकी बेहद नजदीकियां उनके उद्योगों के लिए भारी पड़ गई।
बाबा खुद बताते हैं कि केंद्र के हाथों में अब केवल एक हथकंडा शेष रह गया है। आम चुनाव आते-आते वे चरित्र-हनन की राजनीति का शिकार बन सकते हैं।
इसके लिए पूरे पतंजलि परिवार के साथ-साथ स्वाभिमान आंदोलन को भी सतर्क कर दिया गया है। बाबा के अनुसार किसी भी उत्पीड़न से घबराने का सवाल पैदा नहीं होता।
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