उत्तराखंड: स्नो लेपर्ड दिखेंगे तो बढ़ेगा रोजगार, लद्दाख में ट्रेनिंग लेंगे दारमा और उत्तरकाशी के ग्रामीण
हिम तेंदुओं के दीदार के साथ अब पहाड़ के गांवों में पर्यटन और रोजगार के नए रास्ते खोलने की तैयारी है। दारमा और उत्तरकाशी में साइटिंग शुरू करने से पहले ग्रामीणों को लद्दाख ले जाकर वहां के मॉडल और अनुभव से रूबरू कराया जाएगा।
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उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले हिम तेंदुओं (स्नो लेपर्ड) के संरक्षण के साथ पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उत्तराखंड में पहल की जा रही है। पर्यटन और वन विभाग उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ के दारमा क्षेत्र में स्नो लेपर्ड साइटिंग शुरू करने की तैयारी में हैं। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार और होम स्टे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।
स्नो लेपर्ड साइटिंग लद्दाख की तर्ज पर विकसित की जाएगी। लद्दाख के विशेषज्ञ पहले चरण में संबंधित क्षेत्रों के ग्रामीणों को जानकारी और प्रशिक्षण दे चुके हैं। अब दूसरे चरण में दारमा और उत्तरकाशी के ग्रामीणों को लद्दाख में एक्सपोजर विजिट के लिए भेजा जाएगा। दल में 12 ग्रामीण और पर्यटन विभाग के दो अधिकारी शामिल होंगे। वन विभाग के कर्मचारी भी इसमें जाएंगे।
पर्यटन सचिव धीराज गर्ब्याल के अनुसार, ग्रामीणों को लद्दाख में स्थानीय लोगों की ओर से की जा रही स्नो लेपर्ड साइटिंग की प्रक्रिया, पर्यटकों की सुरक्षा और जरूरी सावधानियों की जानकारी दी जाएगी। इसके बाद ग्रामीणों को कैमरे समेत अन्य तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।
सर्दियों में स्नो लेपर्ड साइटिंग से जुड़ा एक आयोजन भी कराया जाएगा, जिसमें पर्यटकों की संख्या निर्धारित रहेगी। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने से स्थानीय होम स्टे और अन्य पर्यटन गतिविधियों को लाभ मिलेगा।
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एक साथ सभी वास स्थलों में होगा आकलन
लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और उत्तराखंड में अब तक 718 हिम तेंदुओं का आकलन किया गया है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक बिलाल हबीब के अनुसार, अब हिम तेंदुओं का एक साथ सभी वास स्थलों में नियमित अंतराल पर आकलन किया जाएगा। इसमें हिम तेंदुओं की संख्या, वास स्थल, व्यवहार और शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या का अध्ययन होगा। इसके लिए कैमरा ट्रैप समेत विभिन्न तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे संरक्षण की योजनाओं को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। कार्य शुरू करने से पहले कार्यशाला आयोजित की जाएगी।