रजत जयंती: उत्तराखंडियत के साथ धड़कते रहने के 25 वर्ष, देहरादून से यूं शुरू हुआ अमर उजाला का सफर...
मेरठ में पत्रकारिता के नए तेवरों का बाखूबी अहसास करा चुके अमर उजाला और श्री अतुल माहेश्वरी जी ने 1990 का दशक शुरू होने से पहले ही देहरादून में अपना कार्यालय खोलकर एक नई शुरूआत कर दी थी।
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विस्तार
आज से ठीक 25 साल पहले दैनिक अमर उजाला का देहरादून से प्रकाशन होना महज एक अखबार के सेवा क्षेत्र का विस्तार नहीं, बल्कि पत्रकारिता के जुड़े जनसरोकारों, संघर्षों और सच के लिए किसी भी हद से गुजर जाने के ज़ज्बे से जुड़ी दास्तान है।
सच की खातिर सत्ता से टकराने के हौसले और अपने पाठकों को हकीकत से रूबरू कराने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहने की जीवंत मिसालों ने इस दास्तान को पत्रकारिता के स्वर्णिम इतिहास का बाना पहना दिया है।
तब हिंदी पत्रकारिता का इतिहास नये ढंग से लिख रहे थे अतुल माहेश्वरी टीम का नेतृत्व करते हुए
अमर उजाला के आगरा और बरेली संस्करणों के बाद वर्ष 1986 में मेरठ संस्करण की शुरूआत हुई तो वहां से टैक्सियों से देहरादून और पहाड़ के उन जनपदों में अमर उजाला जल्द पहुंचने लगा था,
जहां पहले अक्सर अखबार शाम तक पहुंचा करते थे। उस दौर में देहरादून के लिए अमर उजाला एक नया अखबार था।
अगले कुछ सालों में अमर उजाला के तेवर, खबरों की विविधता और लुके छुपे सच को खोज निकालने का जुनून और हर किसी के दर्द की दवा बनने की ईमानदार कोशिशें लोगों को आकर्षित करने लगीं। सम्पादक के रूप में श्री अतुल माहेश्वरी अमर उजाला की टीम का नेतृत्व करते हुए हिंदी पत्रकारिता का इतिहास नये ढंग से लिख रहे थे।
कुछ भी अच्छा या नया करने वालों को सराहने और जहां तहां लगे समस्याओं के अम्बारों पर निशाना साधने, भ्रष्टाचार से सीधे टकराने और आम आदमी के हक से जुड़े आंदोलनों को जगह देने की उनकी नीतियां अमर उजाला में साफ नजर आती थीं।
अमर उजाला की पत्रकारिता: नवजात शिशु को जन्म के कुछ ही घंटों बाद लेबर रूम में चूहों ने कुतर कर मार डाला
यह वो दौर था, जब शाम ढलने के साथ ही पत्रकारों का उस दिन का काम भी बंद हो जाता था। लेकिन जल्द ही बहुत कुछ बदलने वाला था। स्थानीय अखबारों और दिल्ली से देहरादून आने वाले समाचार पत्रों की तुलना में तब देहरादून में अमर उजाला के पाठकों की संख्या बहुत कम थी।
मेरठ में पत्रकारिता के नए तेवरों का बाखूबी अहसास करा चुके अमर उजाला और श्री अतुल माहेश्वरी ने 1990 का दशक शुरू होने से पहले ही देहरादून में अपना कार्यालय खोलकर एक नई शुरूआत कर दी थी। दिसम्बर, 1989 में मुझे मेरठ से इस कार्यालय का प्रभारी बनाकर देहरादून भेजा गया।
फॉलोअप में नहीं बरती कोई रियायते
श्री अतुल माहेश्वरी की टीम में रहकर कई साल कार्य करते हुए मैं अच्छी तरह समझ चुका था कि आम जनता के दुख दर्दों के प्रति गजब की संवेदनशीलता रखने वाले अतुल जी न तो किसी के रौब में आते हैं और न कोई समझौता करते हैं। मेरठ के जिला महिला अस्पताल में जब एक नवजात शिशु को जन्म के कुछ ही घंटों बाद लेबर रूम में चूहों ने कुतर कर मार डाला था।
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तब मेरठ मंडल के एक वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी के परिवार की महिला डॉक्टर से जुड़ा मामला होने और तमाम प्रभावशाली लोगों की सिफारिशें आने व दबाव पड़ने के बाद भी अतुल जी ने एक बार भी मेरी उस खबर और उसके फॉलोअप में कोई रियायते नहीं बरती। खबरों को लेकर किसी दबाव में न आने का उनका यह स्वभाव अमर उजाला में साफ महूसस होता था।
यह वही दौर था, जब अमर उजाला ने देहरादून और पहाडों की रात की खबरें भी सुबह पाठकों तक पहुंचानी शुरू कर दी थी। अक्टूबर, 1991 में उत्तरकाशी में विनाशकारी भूकम्प आने से पहले ही अमर उजाला आम आदमी के दुख-दर्द और खुशियों के ऐसे साथी के रूप में तेजी से पहचान बना रहा था, जो अच्छे को सराहता है, तो लापरवाही और बदनीयती देखकर गुस्सा करने से भी नहीं हिचकता।
अमर उजाला की विश्वसनीयता में हुआ और इजाफा
उत्तरकाशी के भूकम्प के बाद अमर उजाला ने सड़कों से मीलों दूर के गांवों की त्रासदी की तस्वीर जिस तरह जोखिम उठाकर दुनिया के सामने पेश की, उसका नतीजा यह निकला कि पूरा देश पीड़ितों की मदद के लिए उठ खड़ा हुआ। इसके साथ ही किसी भी कीमत पर और दुर्गम स्थानों से भी सच सामने लाने वाले अखबार के रूप में अमर उजाला की विश्वसनीयता में और इजाफा हुआ।
इन्हीं वर्षो में देश पाठकों ने पौड़ी जनपद की सीमा में स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर के हादसे के बाद भी अमर उजाला सच की खातिर सरकार से टकराते देखा था। मीलों तक के पैदल रास्ते पर कई फीट मलबा आ जाने के कारण अनगिनत लोगो उसमें दफन हो गए थे। सावन के सोमवार को हुए इस हादसे ने एक बार फिर साबित किया कि अमर उजाला की पत्रकारिता समझौते नहीं करती।
वर्ष 1994 में उत्तराखंड आंदोलन के दौरान आवाम की आवाज बनने और आंदोलन को कुचलने के सरकार के तमाम प्रयासों को बार-बार बेपर्दा करके श्री अतुल माहेश्वरी ने सरकार से सीधे टकराव ही ले लिया था। अमर उजाला के खिलाफ सत्ता का हल्ला बोल इसी का नतीजा था। लेकिन वे पत्रकारिता को आम आदमी के सरोकारों से जोड़ने और अखबार को घर से आने वाली अपने प्रियजनों की चिट्ठी जितना विश्वसनीय बनाने की नीति पर अडिग रहे। सत्ता के हल्ला बोल ने उन्हें जरा भी विचलित नहीं किया।
अखबार के रूप में हुआ अमर उजाला की विश्वसनीयता में और इजाफा
उत्तराखंड आंदोलन के दौरान 1994 में जब ताकतवर सत्ता का अमर उजाला के खिलाफ हल्ला बोल चल रह था और देहरादून में कर्फ्यू लगा था, तब एक ऐसा भी दौर आया जब अमर उजाला का वितरण बिल्कुल बंद कर दिया गया। उस दौर में भी अमर उजाला अपने पाठकों तक पहुंचा। अतुल जी ने शहर में 126 स्थानों पर खुद अमर उजाला पहुंचाने की ऐसी व्यवस्था की कि कर्फ्यू के दौरान पाठक सच जानने के लिए लुकते-छिपते खुद आकर वहां से अखबार ले जाने लगे।
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया...
उत्तराखंड आंदोलन के दौर में कई तरह की परेशानियों के बावजूद अमर उजाला विश्वास की डोर को हर रोज और मजबूत बनाता चला गया। आंदोलन के दौरान रात तीन-चार बजे आमरण अनशनकारियों को जबरन उठाने की सरकार की रणनीति को भी अमर उजाला ने उस दौर में रात रात जागकर सचित्र प्रकाशित किया। दुष्यंत के शेर – लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया...जैसे अंदाज में अमर उजाला में लोगों का विश्वास बढ़ता गया और नये पाठकों के जुड़ने का सिलसिला तेजी से चलता रहा।
एक दौर ऐसा भी आया कि यहां जितनी तादाद में बहुत सारे अखबार मिलकर बिकते थे, उनसे अधिक अमर उजाला बिकने लगा। तब तक मेरठ से अमर उजाला यहां आता था। तब तक अमर उजाला की प्रसार संख्या इतनी बढ़ चुकी थी कि गाड़ियों में लादकर मेरठ से अखबार लाना भी कठिन हो रहा था।
कई तरह के दबावों के बावजूद नहीं कियाअमर उजाला ने किसी और की तरह सत्ता से समझौता
कुमाऊं मंडल में श्री राजुल माहेश्वरी जी के नेतृत्व में अखबार को पाठकों के भरोसे से जोड़ने की ऐसी ही नीति फलीभूत हो रही थी। वहां तब बरेली से अमर उजाला आता था। जनवरी, 1997 के पहले हफ्ते में श्री अतुल माहेश्वरी ने देहरादून आकर पटेल नगर के सहकारी औद्योगिक आस्थान में एक खंडहर जैसी बिल्डिंग को अमर उजाला का देहरादून से श्रीगणेश करने के लिए पसंद कर लिया।
उनकी ख्वाहिश थी कि देहरादून और पूरे गढ़वाल मंडल के लिए मेरठ के बजाय देहरादून से अखबार प्रकाशित किया जाए। इसके पीछे किसी नफे नुकसान का हिसाब किताब नहीं, बल्कि देर रात तक की खबरें सुबह सवेरे पाठकों तक पहुंचाने का उनका ज़ज्बा था।
कोई दूसरा बड़ा अखबार देहरादून से प्रकाशन शुरू करने का जोखिम उठाने को नहीं था तैयार
यही वजह थी कि उनके निर्देश पर देहरादून में अमर उजाला शुरू करने के लिए कई माह से स्थान तलाशे जा रहे थे। जगह पसंद आते ही अतुल जी ने फरवरी में अखबार शुरू करने की रणनीति बना ली। तब तक कोई दूसरा बड़ा अखबार देहरादून से प्रकाशन शुरू करने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं था।
आदरणीय अतुल जी हार्ड टास्क मास्टर होने के बावजूद सबसे प्रिय बॉस थे, जिन्हें सब भाई साहब कहते थे और उनके एक एक शब्द पर कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते थे। उनकी अगले महीने उस खंडहर से अमर उजाला शुरू करने की यह योजना जितनी लुभावनी लग रही थी, उतनी ही नामुकिन भी। इस भवन में पहले कोई फैक्ट्री थी, जो बहुत साल पहले बंद हो गई थी।
उसके बाद फैक्ट्री के कमरों और बीच के खुले स्थान पर उगे जंगली पेड़ दुमंजिले मकान जितने ऊंचे हो चुके थे। पूरा भवन जर्जर हालत में था। लेकिन वे तो अतुल जी थे। वे कहां हार मानने वाले थे। उसी
दिन भवन के दोनों स्वामियों के साथ किरायेदारी की शर्तें तय हुई और शाम तक एक चौकीदार बैठा दिया गया।
खुशियों और कामयाबी की बन गया एक ऐसी मिसाल
जनवरी के पहले हफ्ते में शुरु हुआ यह सफर 24 फरवरी तक खुशियों और कामयाबी की एक ऐसी मिसाल बन गया, जो असंभव को संभव में बदलने वाली तपस्या जैसी है। इसी दौर में बहुत से लोगों को पता चला कि अतुल जी एक बेखौफ सम्पादक और संवेदनशीन लीडर ही नहीं हैं, बल्कि एक गजब के आर्किटेक्ट भी हैं।
फर्श से लेकर दीवारों और छतों तक सब कुछ जर्जर हालत में था। लेकिन दिन रात एक करके अतुल जी ने फरवरी का तीसरा हफ्ता शुरू होते-होते खंडहर को एक अच्छे खासे भवन में बदल दिया। मौसम ने भी अपने तेवर दिखाये, लेकिन वे रुके नहीं। फरवरी के तीसरे हफ्ते में सीमेंट में खास धातु मिलाकर प्रिंटिंग प्रेस लगाने के लिए बुनियाद डाल दी गई। बुनियाद सूखने तक मशीनें भी आ पहुंची। कुछ दिन डमी छापी गई और 25 साल पहले आज ही के दिन देहरादून से अमर उजाला का पहला अंक प्रकाशित करने में अतुल जी कामयाब हो गए।
डॉ. सुभाष गुप्ता
46 केशव विहार
(लेखक अमर उजाला के इस सफर के साथी रहने के बाद अब पत्रकारिता के प्रोफेसर के रूप में
सेवारत हैं)
...जादू को पुराना नहीं पड़ने देते
अमर उजाला का 25 वर्षों का यह सफर जुल्मों और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने, लोगों के दुख दर्द सामने लाकर उन्हें दूर कराने की ईमानदार कोशिशों और अच्छे प्रयासों व पहल को सराहने की उसी परम्परा का विस्तार बन गया है। इस लम्बे सफर के दौरान अमर उजाला ने संस्कृति को सहेजने और विज्ञान के साथ ही लोक कलाओं को प्रोत्साहन देने व विकास की इबारत लिखने का सिलसिला लगातार जारी रखा है।
अमर उजाला के प्रबंध निदेशक श्री राजुल माहेश्वरी के सधे हुए नेतृत्व में पूरी टीम उन्हीं महान आदर्शों को आगे बढ़ाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। अमर उजाला का देहरादून से प्रकाशन शुरू होने के बाद के इन ढाई दशकों में राज्य के गठन और उसके बाद अपराधियों से जब्त हो चुकी शराब को मालखाने से बेचने का कारोबार चलाये जाने, सरकारी अस्पतालों के लिए नकली दवाओं की बड़े पैमाने पर खरीद, नारी निकेतन में संवासियों के शारीरिक शोषण जैसे तमाम खुलासे करने के साथ ही अमर उजाला ने अगस्त, 2012 की उत्तरकाशी की त्रासदी, जून, 2013 की केदारनाथ आपदा, फरवरी, 2021 की जोशीमठ की आपदा समेत हर भले बुरे वक्त में पूरी क्षमता से पहाड़ के साथ खड़ा रहा है।
हरिद्वार का महाकुंभ हो या नंदादेवी राजजात या फिर लोकतंत्र के पर्व के रूप में निष्पक्षता की परीक्षा लेने वाले चुनाव, अमर उजाला हर बार सबसे खरा साबित हुआ है। यही वो जादू है, जो पाठकों को सबसे ज्यादा पसंद आता है। बहुत अनुभवी और हर विषय को गहराई से जांचने परखने वाले सम्पादक और कठिन परिश्रम करने वाले पत्रकारों और अधिकारियों की टीम इस जादू को पुराना नहीं पड़ने देती।
- डॉ. सुभाष गुप्ता, देहरादून
(लेखक अमर उजाला के इस सफर के साथी रहने के बाद अब पत्रकारिता के प्रोफेसर के रूप में सेवारत हैं)