करारी हार के बाद कांग्रेस में छिड़ेगी एक और जंग
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लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस में एक और जंग छिड़ने वाली है।
हार के बाद प्रदेश कांग्रेस में पार्टी को नया अध्यक्ष मिलना तय है। जिसके लिए नेताओं ने अपने समीकरण लगाने शुरू कर दिए हैं।
हालांकि हरीश रावत गुट इस कोशिश में है कि जो भी परिवर्तन हो पंचायत चुनाव के बाद हो। कांग्रेस में क्षेत्रीय और जातीय समीकरण बैठाने के लिए गढ़वाल के ब्राह्मण नेता को यह जिम्मेदारी मिल सकती है।
लेकिन इसी फार्मूले में अपने-अपने नेता को फिट करने को लेकर जंग छिड़नी तय है।
रावत सरकार को सूट कर रहे हैं आर्य
प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य ने एक व्यक्ति एक पद के सिद्घांत पर बीते साल नवम्बर में ही अपना इस्तीफा सौंप दिया था।
इस बीच प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन और फिर लोकसभा चुनाव आ गए लिहाजा उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है।
वहीं हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद यशपाल आर्य बतौर अध्यक्ष उन्हें सूट कर रहे हैं और सरकार-संगठन के बीच बेहतर तालमेल भी दिख रहा है।
यशपाल आर्य का कार्यकाल पहले ही समाप्त हो चुका था जिसे आलाकमान से बढ़ा दिया था। विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को जमीनी स्तर पर नए सिरे मजबूती देने की मांग भी पार्टी में शुरू हो गई है।
लंबे समय से इस कुर्सी पर है बहुगुणा की नजर
विजय बहुगुणा गुट लंबे समय से प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर किसी अपने को बैठाना चाहता है।
कांग्रेस के सभी विधायकों में सुबोध उनियाल ही एक मात्र ऐसे विधायक हैं जिन्हें कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं मिली है।
सुबोध उनियाल क्षेत्र और जातीय समीकरण में फिट बैठेते हैं लेकिन हरीश रावत का खेमा उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी ना देकर कोई अतिरिक्त पद देना चाहता है।
भविष्य में इस बात के भी संकेत मिल रहे हैं कि किसी अन्य मंत्री को अगर हटाया जाता है तो सुबोध को मंत्री बना दिया जाए।
सुबोध उनियाल के प्रदेश अध्यक्ष बनने पर तय है कि सरकार और संगठन एक बार फिर आमने-सामने होंगे। फिर विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारी को लेकर भी रार होगी।
कुर्सी की दौड़ में शामिल हैं ये
हरीश रावत खेमा लंबे समय से अपने वफादार किशोर उपाध्याय को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर देखना चाहता है।
निर्दलीय दिनेश धनै को मंत्री बना देने के बाद किशोर को एडजेस्ट करना मजबूरी हो गई है। इलाकाई राजनैतिक समीकरण में किशोर उपाध्याय और धनै प्रतिद्वंद्वी हैं।
धनै किशोर को हराकर ही विधानसभा पहुंचे हैं। धनै कांग्रेस भी शामिल को जाते हैं तो ऐसे में किशोर को कोई जिम्मेदारी हरहाल में दी जाएगी।
पहले इस दौड़ में विधायक नवप्रभात भी शामिल थे लेकिन उन्हें अतिरिक्त जिम्मेदारी मिल गई है। वहीं संगठन में लंबे समय से उपाध्यक्ष और महामंत्री पदों पर बैठे नेता चाह रहे हैं कि पार्टी विधायकों को तो अतिरिक्त जिम्मेदारी दे रही है।
ऐसे में संगठन के लिए काम करने वालों का प्रदेश अध्यक्ष के पद पर उनका नम्बर तो कभी नहीं आएगा।